ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: अवसाद के पांव

ऐसे तमाम लोग हैं जिनकी जिंदगी में ऐसे पल आते हैं, जब वे अवसाद में चले जाते हैं या आत्महत्या जैसे खयाल मन में आते हैं। ऐसे में ‘लोग क्या कहेंगे’ की बेमानी बाधा को किनारे करके अच्छे मनोचिकित्सक से जरूर परामर्श लेना चाहिए।

Author May 25, 2019 4:21 AM
अपनी अवस्था से निकलने की कोशिश करें।

अनीता मिश्रा

जब किसी संवेदनशील और भावुक व्यक्ति के जीवन में कोई दुख अकस्मात आघात करता है, तब विचलित हो जाना स्वाभाविक है। उस वेदना से उबरने के लिए वक्त पर कोशिश नहीं की जाए तो यह पहले अवसाद और फिर बीमारी में बदल जा सकती है। कुछ समय पहले मां का देहांत हुआ तो उसके बाद मेरे लिए खुद को संभालना मुश्किल हो रहा था। वजह मुख्य यह थी कि मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसे वक्त में क्या करना चाहिए। वात्सल्य के कोमल अहसास के साथ मां की मित्रता की चुहलबाजी से भी वंचित हो गई थी, इसलिए दुख ज्यादा था। मगर शुरू से मुझे दुख के सार्वजनिक प्रदर्शन से परहेज रहा। मैं एकदम खामोश हो गई थी। इसका असर मेरी सेहत पर पड़ रहा था। ऐसे में मेरी एक मित्र ने सलाह दी कि मुझे मनोचिकित्सक से मिलना चाहिए। शायद इससे कुछ फर्क पड़े। चर्चा करने पर मेरे करीबी लोगों और रिश्तेदारों को अजीब लगा कि इसमें मनोचिकित्सक क्या करेगा। कई लोगों को लगा कि शायद दुख का असरमेरे दिमाग पर पड़ गया है, इसलिए मैं मनोचिकित्सक से इलाज के लिए जा रही हूं।

हमारे समाज में अक्सर मनोचिकित्सक से मिलने का यही अर्थ लगाया जाता है कि इसका दिमाग चल गया। यानी पागल हो गया। यह बात कम लोग समझ पाते हैं कि काउंसलिंग या सलाह-मशविरे के लिए भी ऐसे डॉक्टर के पास जाया जाता है। मुझे याद है, मेरी एक मित्र जब किसी समस्या के बाद मनोचिकित्सक से मिली थीं तो उसके दफ्तर की खासी समझदार सहकर्मी ने उसे समझाया था कि यह बात किसी को नहीं बताना, वरना लोग पता नहीं क्या सोचेंगे। मुझे भी काफी हैरानी हुई कि इस मामूली बात पर लोग क्या और क्यों सोचेंगे!

खैर, लोग क्या सोचते हैं, इसकी परवाह किए बिना मैं अपनी समस्या के लिए डॉक्टर से मिलने गई। उन्होंने मेरी सारी बातें सुनीं। सबसे पहले उन्होंने मेरी इस बात का खंडन किया कि दुख का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह गरिमापूर्ण नहीं लगता है। या फिर कोई निजी वेदना हो तो उसे अपने अंदर छिपा कर रखना चाहिए। अगर हम कहीं भी कुछ भी दमन करेंगे तो वह किसी न किसी रूप में निकलेगा। यहां तक कि कोई गंभीर बीमारी भी हो सकती है। इसलिए ज्यादा सोचने के बजाय जो करीबी लगे, उसके पास बैठ कर खूब रो लेना चाहिए। कोई न भी हो तो किसी न किसी तरीके से मन का गुबार निकाल लेना जरूरी है। मन में जो भी हो, उसे अपने करीबी मित्रों से साझा करना चाहिए। अगर कोई दुख है तो दुखी दिखने में या उससे विचलित होने में कोई हर्ज नहीं है। हमें बहुत मजबूत दिखना है या मजबूत दिखने का अभिनय करना है, यह एक बेवजह का आग्रह है।

मनोचिकित्सक की इन बातों का मैंने खयाल रखा और मुझे उनसे फिर मिलने की नौबत नहीं आई। मैंने महसूस किया कि दुख का सामना करने को लेकर मेरे सिद्धांत और मेरी सोच एकदम गलत थी। वे तकलीफ को कम करने के बजाय और बढ़ा रहे थे। ऊपर से मैं सामान्य थी, लेकिन अंदर से मैं बीमार हो रही थी। दुनिया से कट गई थी। लेकिन डॉक्टर के पास जाने की वजह से मैं कुछ दिनों बाद उबर कर ठीक होने लगी। सेहत और मन तेजी से सामान्य होने लगा। अब मुझे लगता है कि अगर मैं मनोचिकित्सक से मिलने में झिझकती या यह सोचती कि ‘लोग क्या सोचेंगे’ तो संभव है लंबे अरसे तक परेशान रहती। अगर अवसाद हावी हो जाता तो उससे निकलना ज्यादा मुश्किल होता।ॉ

ऐसे तमाम लोग हैं जिनकी जिंदगी में ऐसे पल आते हैं, जब वे अवसाद में चले जाते हैं या आत्महत्या जैसे खयाल मन में आते हैं। ऐसे में ‘लोग क्या कहेंगे’ की बेमानी बाधा को किनारे करके अच्छे मनोचिकित्सक से जरूर परामर्श लेना चाहिए। वक्त पर डॉक्टर के जरिए समस्या का सही विश्लेषण हो जाए, सलाह और जरूरी दवाइयां मिल जाएं तो जल्दी ही सब कुछ ठीक होने की गुंजाइश बनती है। कोई बुरी खबर मिलने या जीवन में अचानक किसी बदलाव से भी भावनात्मक चोट पहुंचती है और असंतुलन की स्थिति में हमारा पूरा व्यवहार बदल जा सकता है। इसका असर हमारे रिश्तों के साथ-साथ हमारे कामकाज पर भी पड़ता है। ऐसे में बीमार पड़ने या खुद से लड़ते रहने से बेहतर है कि हम किसी अच्छे काउंसलर या मनोचिकित्सक की सहायता से अपनी उस अवस्था से निकलने की कोशिश करें।

पश्चिमी देशों में लोग मामूली बातों के लिए भी काउंसलर के पास जाते हैं। हमारे यहां अनेक वजहों से तनाव और अवसाद से पीड़ित लोग बढ़ रहे हैं, लेकिन वे डॉक्टर के पास जाने से हिचकते हैं। इस विषय पर जागरूकता पैदा करने की जरूरत है, ताकि लोग संकोच छोड़ कर इसे दूसरी साधारण बीमारियों की तरह ही महज बीमारी समझें और सही समय पर डॉक्टर की मदद लें। मन में अवसाद को घर बनाने देने का मतलब अपने व्यक्तित्व को खो देना है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X