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दुनिया मेरे आगे: आप किस फेर में हैं

आज किसी न किसी फेर में पड़ना फैशन में है। बल्कि कुछ लोगों को पता भी नहीं चलता कि वे कब फेर में पड़ गए। फेर में पड़ने के बाद वे उसे सही ठहराने लगते हैं। लोग अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार फेर में पड़े हुए हैं।

Author Published on: November 1, 2019 2:29 AM
माता-पिता को असहाय छोड़ कर मंदिरों में भजन-कीर्तन का शोर बढ़ता जा रहा है।

राकेश सोहम

कुछ दिन पहले दिमाग में एक सवाल आया कि क्या मैं किसी फेर में हूं। काफी सोचने के बाद मुझे लगा कि मैं किसी फेर में नहीं हूं। मुझे यह अच्छा लगता है और खुद पर गर्व होता है। फिर सोचता हूं कि मैं किसी फेर में क्यों नहीं हूं। यह सोचते हुए बड़ी ऊहापोह में रहा! महाभारत में अर्जुन अपने ही रिश्तेदारों की सेना का संहार करने के लिए खड़े थे। बड़ी चिंता में थे कि अपनों का संहार कैसे कर सकते हैं! तब कृष्ण ने कहा कि ‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या’। इसका अर्थ है कि यह दिखने वाला जगत सत्य नहीं है, केवल ब्रह्म ही सत्य है। इसलिए अर्जुन तुम इस जगत के फेर में मत पड़ो। यह सब छलावा है। लेकिन इस घोर कलयुग में प्राचीन परंपराएं और मान्यताएं लगातार टूट रही हैं। जन्म देने वाले माता-पिता को असहाय छोड़ कर मंदिरों में भजन-कीर्तन का शोर बढ़ता जा रहा है। लोग मानवता भूल कर पत्थरों को पूजने के फेर में पड़े हुए हैं!

ऐसा लगता है कि फेर में पड़ने की प्रथा अति प्राचीन है। दरअसल, फेर में पड़ने से बचना आसान नहीं है। सामने घटती घटनाओं और मौजूद वस्तुओं की लालसा ऐसी ही होती है। हालांकि फेर में पड़ने के तमाम खतरे भी हैं। परंपरा में मौजूद ग्रंथों और आख्यानों में तमाम उदाहरण मौजूद हैं कि कोई राजपाट के फेर में पड़ा तो कोई धन के तो कोई यौवन के। लेकिन इसके बदले उन्हें दुख मिले। बहरहाल, अगर मैं ताल ठोंक कर कहूं कि मैं किसी फेर में नहीं हूं तो उन लोगों का क्या, जो फेर में पड़े हुए हैं और सुख भी उठा रहे हैं। आज बड़े से लेकर छुटभैया तक हर नेता कुर्सी के फेर में है। वे ऊपर से भले कहें कि हम जनता की सेवा करना चाहते हैं, हमें केवल गरीब जनता की चिंता है। लेकिन अंदर से बस मकसद एक है वोट, कुर्सी और उसके फायदे। वे बस इसी फेर में पड़े हुए हैं। मुझे याद आता है मेरा एक मित्र अच्छी नौकरी में आया था। अधिकारी के पद पर। लेकिन पद की कुर्सी के बजाय राजनीति की कुर्सी के फेर में पड़ गया। नौकरी छोड़ कर चुनावी मैदान में कूद गया, फिर चारों खाने चित। बाद में बहुत दिनों तक पार्टियों के पोस्टर बनाने और चिपकाने का काम करता रहा।

आज किसी न किसी फेर में पड़ना फैशन में है। बल्कि कुछ लोगों को पता भी नहीं चलता कि वे कब फेर में पड़ गए। फेर में पड़ने के बाद वे उसे सही ठहराने लगते हैं। लोग अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार फेर में पड़े हुए हैं। छोटा व्यक्ति छोटे फेर में और बड़ा व्यक्ति बड़े के फेर में है। गांव के सीधे-सादे लोग भी अपनी ईमानदारी, सहजता और संवेदनशीलता को छोड़ कर नकारात्मक राजनीति के फेर में पड़ रहे हैं। अपने में सिमट रहे हैं। इधर डॉक्टर धन के फेर में शहरों में अटके हुए हैं, उधर गांव-कस्बों के लोग नीम हकीम के फेर में पड़े हुए हैं। जब गांव में मर्ज बिगड़ता है, तब वे जादू-टोने के फेर में पड़ जाते हैं और अंत में बचा-खुचा धन और जीवन लेकर शहर का रुख करते हैं। शहर के बड़े-बड़े अस्पतालों के फेर में उनकी जमीनें बिक जाती हैं। आजकल शहर में यह खबर आम हो गई लगती है। आए दिन ऐसी खबरें बदले नामों के साथ बार-बार पढ़ने में आती हैं, लेकिन जनता है कि चेतती नहीं है। सोने से लकदक महिलाएं सोने को दुगना करने के फेर में पड़ जाती हैं। कोई चालाक बाबा आता है और सोने को दुगना करने के लालच देकर सारा ठग कर ले जाता है।

कुल मिला कर फेर में पड़ने के जलवे ऐसे ही हैं। व्यवसायी पैसा बनाने, तथाकथित नेता और ठेकेदार विकास के बहाने जनता को लूट लेने के फेर में है। माना कि हजार खतरे हैं फेर में पड़ने के, लेकिन लोगों को पता है कि इसमें फायदे भी काफी हैं। अब यह अलग बात है कि कोई ईमानदारी का फायदा उठाना चाहता है या बेईमानी का। मकसद है प्रसिद्धि पाना, वह चाहे जैसे मिले। प्रसिद्धि है तो पैसा है। पैसा है तो सम्मान है और सम्मान में सब ढक जाता है। इन सबके बीच दिवाली का त्योहार भी गुजरा। बाजार लुभावने आकर्षणों से अट गए। ऐसे में उपभोक्ता उन आकर्षणों के फेर में पड़ने के लिए तैयार किए जाते रहे। लेकिन लोगों को यह समझने की जरूरत है कि हर व्यक्ति राजनीति की दुनिया का कलाकार नहीं हो सकता। अपनी हैसियत और बजट के अनुसार खरीदारी तर्कसंगत होगा। बेहतर हो कि किसी व्यक्ति या प्रस्ताव के फेर में पड़ने के बजाय अपना भरोसा अर्जित किया जाए और उसके फेर में पड़ा जाए। अपने भरोसे चार कदम चलना भी दूसरों के फेर में पड़ कर चालीस कदम चलने से ज्यादा अच्छा है।

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