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दुनिया मेरे आगे: जैसे को तैसा नहीं

ऐसी बात नहीं है कि वाद-विवाद, मतभेद हमेशा ही विध्वंसकारी या घातक होते हैं।

Author Published on: December 4, 2019 2:48 AM
सामने वाले के जैसा सम व्यवहार करके हम खुद की प्रकृति को भी अनजाने में बदल रहे होते हैं।

कई साल बाद एक पुरानी दोस्त से मिली। वह कॉलेज के दिनों में अपने अच्छे स्वभाव, चुस्त-दुरुस्त स्वास्थ्य के कारण सबकी चहेती हुआ करती थी। आज जब उससे मिलने एक रेस्टोरेंट में जा रही थी तो यही सोच रही थी कि उससे मिल कर बीते दिनों को याद करके हम खूब ठहाके लगाएंगे और सकारात्मक ऊर्जा से भर उठेंगे। लेकिन वहां पहुंचने के बाद हुआ इससे बिल्कुल अलग। इतने वर्षों बाद वह पूरी तरह बदली हुई नजर आई। उसके चेहरे की चमक और देहयष्टि में तो अंतर आया ही था, स्वभाव भी एकदम भिन्न महसूस हुआ। रेस्टोरेंट के वेटर को ही छोटी-सी बात पर दो बार डांट चुकी थी। आखिर मैंने उससे पूछा- ‘तुम इतना बदल कैसे गर्इं, ऐसी तो नहीं थी कभी?’

इस पर उसने मेरी तरफ बहुत अचंभित भाव से देखते हुए कहा- ‘क्या कह रही हो? मैं तो वैसी ही हूं… शायद और परिपक्व हो गई हूं। पहले नासमझ थी। जीवन में आड़े-टेढ़े लोगों और उतार-चढ़ाव भरे रास्ते पर सीधा चलना भी आ गया और लोगों को सीधा करना भी आ गया है अब मुझे। हर हाल में पहले से बेहतर हूं।’ यह कह कर वह कुछ व्यथित-सी हो गई तो मैंने बात को बदल दिया। मैंने सोचा कि दूसरों से लड़ते-झगड़ते उसने खुद को ही शायद उलझा लिया है।

मुझे लगता है ‘जैसे को तैसा’ की कहावत को गलत तरह से समझने से हमें बचना चाहिए। यह सोचना कि किसी ने हमारा बुरा किया तो हम भी उसके साथ बुरा करेंगे, गलत है। उसकी प्रकृति से वह खुद ही अपने लिए दुख के बीज बो रहा है। सामने वाले के जैसा सम व्यवहार करके हम खुद की प्रकृति को भी अनजाने में बदल रहे होते हैं। इसके विपरीत असल में हमें वैसा व्यवहार करना चाहिए जैसा हम दूसरों से अपने लिए उम्मीद करते हैं। ऐसे में कम से कम हम एक आदर्श व्यवहार का उदाहरण तो अप्रत्यक्ष रूप से सामने वाले को दे ही रहे होते हैं, जो कहीं न कहीं उसके मन को जरूर स्पर्श करेगा। इसके अलावा, दूसरे को सबक सिखाने के चक्कर में अपनी ऊर्जा और समय गंवाने से अच्छा है, वह समय और ऊर्जा खुद को बेहतर बनाने में लगाई जाए।

मेरी दोस्त की तरह ही मनुष्य के व्यवहार में बदलाव होने के कई ऐसे उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं, जिनके चलते व्यक्ति का भविष्य पूरी तरह बदल सकता है। जब कभी कोई दिशाहीन हो जाता है तो उसे अच्छी सलाह, अच्छे वातावरण और अच्छी किताबों के जरिए सही मार्ग पर सफलतापूर्वक लाया जा सकता है। कई पुनर्वास केंद्र इस तरह के काम में संलग्न हैं जो अनेक परेशान लोगों में उमंग और नई उम्मीद जगाने का महत्त्वपूर्ण काम करते रहे हैं।

जब कभी हमारा सामना ऐसे लोगों और वातावरण से हो, जहां संवाद, आचरण और समझ का स्तर कमतर, संकुचित लगे, तब हमें उसी स्तर तक जाने से बचना चाहिए। बल्कि ऐसे में अपने विचारों की श्रेष्ठता, व्यावहारिक और विनम्र आचरण के आदर्श स्थापित कर उस दूषित, कटु वातावारण को बेहतर बनाने का प्रयास करना उचित कहा जा सकता है। जहां विचार अशुद्ध है और सत्य का अभाव होता है, अक्सर वहां संवाद आक्रामक और आवाज बुलंद होती है। वहीं जहां ज्ञान और विवेकशीलता होगी, वहां बड़े-बड़े मसले भी बहुत शांति और विनम्रता से हल हो जाते हैं।

ऐसी बात नहीं है कि वाद-विवाद, मतभेद हमेशा ही विध्वंसकारी या घातक होते हैं। विवेकपूर्ण बहसों, विमर्शों और विचारों के मंथन से ही आखिर में कुछ बेहतर निकल कर आता है। पर जब वाद-विवाद, स्वार्थ, गुस्से और अहंकार से दूषित हो जाए और हर व्यक्ति आत्मकेंद्रित हो जाए, नए नजरिये का स्वागत न हो, तो वह सिर्फ कलह कहा जाएगा। वह घातक है। वहां सब कुछ एकतरफा होता जाता है।

जहां किसी भी बात के समर्थन या पुष्टि के लिए वास्तविक और तर्कसंगत तथ्यों का उपयोग नहीं होता, वहां अक्सर एक हंगामा और एक-दूसरे पर दोषारोपण होता रहता है। भूत और भविष्य को लेकर आपसी खींचतान, छीछालेदारी से निरर्थक क्लेश पैदा होने लगता है। ऐसे में अपनी ठीक बात रखना भी व्यर्थ हो जाता है। उस समय खुद को मौन रखना या सही समय का इंतजार करना ही हितकर हो सकता है।

अक्सर देखा गया है कि ज्यादातर विवाद गलत शब्दों के चयन, बोलने के तरीके और हमारी भाव-भंगिमा से ही बढ़ जाते हैं। ऐसे में हमारा सचेत रहना तो जरूरी है ही, सकारात्मक सोच, सही आचरण और अन्य की मन:स्थिति को समझने का प्रयास काफी हद तक परिस्थिति को बेहतर कर सकता है। हमारा परिपक्व और विनम्र व्यवहार ही हमें उस कठिन रास्ते से पार लगा सकता है।
कहीं आग लगती है तो हम उस पर पानी डालते हैं और उससे खुद को बचाने का प्रयास भी करते हैं। यही रवैया हमें अपने जीवन में भी रखना शायद बहुत जरूरी है। हर मिजाज के लोग हमें हर रोज मिलते हैं। उनके स्वभाव को हमें अपने पर हावी नहीं होने देना चाहिए। ‘जैसे को तैसा’ व्यवहार के बजाय अपने सहज और विनम्र स्वभाव के साथ युक्तिसंगत और विवेकपूर्ण व्यवहार शायद एक उचित पहल होगी।

एकता कानूनगो बक्षी

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