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दुनिया मेरे आगे: अकेलेपन की पगडंडी

अकेला जीवन अनुभूतियों से भरा होता है। अनुभूतियां मानव से बहुत कुछ करा लेती हैं। कविता, कहानी, उपन्यास या संस्मरण लिखवाती हैं। संगीत से जुड़ने के लिए उत्प्रेरित करती हैं। अकेले जीवन के अंतर्मन से बार-बार गूंजने वाला एक संगीत गुंथा रहता है।

व्यक्ति में एक व्यक्तिगत विश्वास होता है।

विकेश कुमार बडोला

हरेक व्यक्ति अपने सामान्य जीवन के अलावा भी एक दैनिक परिकल्पित जीवन से जुड़ा रहता है। ऐसा जीवन अकेला होता है। एक प्रकार से यह व्यक्तिगत व्यथाओं का संसार है। व्यक्ति के मन में उमड़ती-घुमड़ती ये व्यथाएं दैनिक जीवन की उन समस्याओं की भावनात्मक टूटन हैं, जिनसे मुक्ति के लिए न व्यक्ति का प्रयास सफल होता है और न ही उसे किसी की सहायता मिलती है। घनिष्ठ मित्र अगर ऐसी समस्याओं से परिचित होते भी हैं, तो कई बार उनका भी अपना व्यक्तिगत पक्ष सुखद नहीं होता। उनके सामने भी अपनी और दूसरे मित्रों की समस्याओं में से सबसे बड़ी समस्या चुन कर उसके लिए जी-तोड़ शारीरिक-मानसिक और आर्थिक-सामाजिक संघर्ष करने की विवशता होती है। इसी कारण से व्यक्ति-व्यक्ति से मिल कर बने जनसमूह में परस्पर सहायता, सहभाव, सद्भाव और समभाव की भावना जम नहीं पाती। सच यह है कि अपनी-अपनी मुसीबतों के भ्रमजाल में फंस कर सभी रोबोट बने हुए हैं। अपने अधिकारी के आदेश पर मशीन की तरह चलने के लिए विवश हैं।

दरअसल, अकेला जीवन अनुभूतियों से भरा होता है। अनुभूतियां मानव से बहुत कुछ करा लेती हैं। कविता, कहानी, उपन्यास या संस्मरण लिखवाती हैं। संगीत से जुड़ने के लिए उत्प्रेरित करती हैं। अकेले जीवन के अंतर्मन से बार-बार गूंजने वाला एक संगीत गुंथा रहता है। संगीत की यह धुन अनचाहे ही अकेले जीवन में लहराने लगती है। अकेला जीवन किसी से इस धुन के बारे में वह सब कुछ नहीं बता पता, वैसा कुछ परिभाषित नहीं कर सकता, जो अनुभव के स्तर पर वह प्राप्त करता है। कहीं कोई भी इच्छित संगीतमय आवाज गूंजती है तो बहुत सुहाने तरीके से, अंतर्मन से गुंथा हुआ संगीत ही याद आता है, उसका प्रसन्न आभास होता है। जीवन की यह घड़ी शांतिदायक होती है।

सतही तौर पर देखने से अलग कुछ गहरे समझा जाए तो व्यक्ति की एक नितांत व्यक्तिगत रुचि होती है। वह आने वाले कल को इसी रुचि के अनुरूप देखना चाहता है। व्यक्ति में एक व्यक्तिगत विश्वास होता है। इसमें पूरी दुनिया सिमटी रहती है। वह खुद और उसका परिवार, संबंधी और मित्र- सभी उसके लिए जीवन का बड़ा सहारा होते हैं। आधे से अधिक जीवन किसी की सहायता के बिना गुजार चुका व्यक्ति भी रिश्तों के सहारे की आस से हमेशा बंधा रहता है। अपने अकेले जीवन में उसकी यह आकांक्षा सदैव बनी रहती है। गुजरते जीवन में अधिकतर लोगों को धूर्त बता चुकी अकेले जीवन की नजरें फिर भी हमेशा आशावान रहती हैं कि कभी न कभी उसे कोई तो समदृष्ट मिलेगा।

व्यक्ति दिखने में तो धरती-आकाश के नजरिए से बहुत छोटा है, पर उसके मन की भावनाओं का विस्तार दुनिया के विस्तार से भी ज्यादा होता है। व्यक्ति यदि दूसरे व्यक्ति को साधारण दृष्टि से देखता है तो दूसरे व्यक्ति का व्यक्तित्व नगण्य हो जाता है, लेकिन दृष्टिकोण में सकारात्मक बदलाव आते ही दूसरा व्यक्ति विशिष्ट बन जाता है। दूसरे के जीवन को उसी नजरिए से देखने की अंतर्दृष्टि मिल जाती है, जैसे दूसरा व्यक्ति खुद अपने जीवन को देखता है। यह दृष्टिकोण मानवीय समाज में तेजी से बढ़ना चाहिए। इसी से मानव आपस में चमत्कार की हद तक प्यार करने लगेंगे।

अपनी नजर में एक परिपक्व आदमी बहुत मूल्यवान होता है। यही नजर अगर उसे देखने वाले अन्य व्यक्तियों में भी आ जाए तो मानवीय जीवन आनंद से भर जाए। व्यक्ति शारीरिक रूप से सीमित है, पर भावनाओं के स्तर पर वह बहुत बड़ा है। किसी एक भी दिन एक अकेला आदमी दुनिया में नहीं रहता। यह बात बहुत छोटी है, पर आदमी के नहीं रहने पर बहुत कुछ ढह जाता है। उसकी कल्पनाएं, इच्छाएं, आकांक्षाएं सब मर जाती हैं। संसार को देखने की उसकी सौंदर्यपरक दृष्टि का दुखांत हो जाता है। अपनी नजर में संसार को गले लगा कर जीने वाला व्यक्ति जब अचानक मृत्यु में स्थिर होता है तो उसके बाद का जीवित मानवीय जीवन-समूह उसे भूल अपने काम-धंधों में लग जाता है। जीवन में मौजूद लोगों को मरे हुए की जीवन-स्मृतियों में विचरण का मौका भी बड़ी काफी मेहनत और लगन से मिल पाता है।

शेष बचे हुए मानवीय जीवन की व्यस्तता की स्थिति ऐसी है कि उसके एक परिवार का पिता अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल के गेट तक छोड़ने जाता है। स्कूल की विसंगतियों,नासमझी के डर से पिता अपने बच्चे की सुरक्षा की मांग करता है। सच यह है कि अधिकार की वेदना से मन अंदर तक हिल जाता है। अन्य समस्याओं की मानसिक उलझन उसे अपने बच्चे के साथ भावनात्मक रूप से निरंतर नहीं जोड़े रखती। वह समस्याओं से घिर जाने के बाद अपने बच्चे के लिए मोहित अपने मन को अलविदा कहता है। इस तरह से फिर से एक अकेला जीवन अकेलेपन की कैद में चला जाता है।

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