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दुनिया मेरे आगे: गिद्धों का खत्म होना

गिद्धों के साथ ही उल्लू, गुलाबी माथे वाली बत्तख और सारस भी अब बहुत कम दिखते हैं। मछलियों की प्रजातियां भी कम हो रही हैं। गिद्धों का कम हो जाना हजारों साल पुरानी परंपरा को बदल रहा है।

Author Updated: September 6, 2019 2:39 AM

संजीव राय

गिद्धों के गायब होने की खबर ने पारसी समाज की एक परंपरा को बदलने के लिए बाध्य किया है। हमारे जीवन में जैसे-जैसे नई चीजें आती हैं, कुछ पुरानी चीजें गायब हो जाती हैं। शहरीकरण और औद्योगीकरण की तेज रफ्तार और तकनीकी विकास की दौड़ में हमारे बीच से गौरैया, महोखा, नीलकंठ, कोयल जैसे कई पक्षी अब गाहे-बगाहे ही दिखते हैं। यही हाल तितलियों और भौंरों का भी है। शहरों में रहने वाले अधिकतर बच्चों को तितली अब फोटो में ही दिखती है। अब खबर यह आ रही है कि शहरों में गिद्ध, चील और कौवे भी कम होते जा रहे हैं। हिरण की हंगुल और संगाई प्रजातियां भी विलुप्त होने के कगार पर हैं।

गिद्ध, चील और कौवों की घटती संख्या से कुछ नई समस्याएं पैदा हो रही हैं। पारसी समुदाय में अपने मृत परिजनों के शव को एक प्लेटफार्म नुमा खुली जगह पर रखने की परंपरा रही है। मुंबई में उस प्लेटफार्म को ‘शांति टॉवर’ कहा जाता है। यहां वर्षों से, शव रख दिए जाते थे और गिद्ध, चील और कौवे उनका भक्षण कर जाते थे। पारसी समाज में शवों को जलाने या जमीन में दफनाने का प्रचलन नहीं रहा है। उनका मानना है कि शव को जलाने अथवा जमीन में दफन करने से प्रकृति में प्रदूषण बढ़ता है, इसीलिए पारसी लोग मृतक के शरीर को गिद्ध, चील और कौवे के खाने के लिए खुले में छोड़ देते हैं। लेकिन पारसी समुदाय के कुछ सदस्य अब शवों को खुले में गिद्धों के लिए छोड़ने के बजाय उन्हें जलाने लगे हैं।

बढ़ते प्रदूषण, बीमारी और बीमार लोग और पशुओं के उपयोग में आने वाली कुछ हानिकारक दवाओं का असर शवों के रास्ते गिद्ध, चील और कौवों पर भी पड़ा और उनकी मौत का कारण बनने लगा। इससे इनकी संख्या में भारी गिरावट आने लगी। बंजर-खाली जमीन के अलावा बागों और जंगलों का कटते जाना भी पक्षियों के खात्मे का एक प्रमुख कारण है। एक दशक में गिद्धों की संख्या में नब्बे फीसद से अधिक की कमी आ चुकी है। पक्षियों की संख्या में आई इस गिरावट ने पारसी समाज को बाध्य किया कि वह अपने परंपरागत तरीके को त्याग कर कुछ दूसरे विकल्प तलाशे। पारसी समाज ने सोलर कंसेंट्रेटर की मदद से शवों को कई दिनों तक गरम रखने के प्रयास किए हैं जिससे कौवे आदि भी शवों का भक्षण कर सकें। परंतु गिद्धों के मुकाबले कौवे जयादा समय लेते हैं और बारिश के मौसम में यह सौर उपाय प्रभावी नहीं रह जाता है। ऐसी स्थिति में अब पारसी समाज के कुछ लोग शवों को जलाने की भी वकालत कर रहे हैं। पारसी समाज के लोगों की संख्या देश में एक लाख से भी कम रह गई है। मूलत: व्यापार से जुड़े इस समुदाय के बारे में ऐसा कहा जाता है कि किसी पारसी व्यक्ति की आमदनी अगर पचास हजार रुपए महीने से कम होती है तभी समुदाय उसे गरीब मानता है!

सरकार और दूसरी सामाजिक संस्थाओं के प्रयास से पर्यावरण संरक्षण, गिद्धों के बचाव और संख्या वृद्धि के कुछ प्रयास किए जा रहे हैं। मुंबई के धारावी में कूड़ेदान के ऊपर दो दशक पहले ‘नेचर पार्क’ बनाया गया था। इसमें औषधि के गुण वाले पौधों के साथ विविध प्रकार के पेड़-पौधे लगाए गए। इसका परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे पक्षियों और तितलियों की अनेक प्रजातियां नेचर पार्क में दिखने लगीं। अब आसपास के लोग सुबह-शाम पार्क में टहलने आते हैं और साथ ही स्कूली बच्चे भी अपने शैक्षिक भ्रमण के क्रम में यहां आते हैं और नए अनुभव लेकर जाते हैं।

गिद्धों के साथ ही उल्लू, गुलाबी माथे वाली बत्तख और सारस भी अब बहुत कम दिखते हैं। मछलियों की प्रजातियां भी कम हो रही हैं। गिद्धों का कम हो जाना हजारों साल पुरानी परंपरा को बदल रहा है। चारा-दाना, संरक्षण देकर पक्षियों की मदद की जा सकती है। लेकिन अभी भी हर साल पंद्रह अगस्त के आसपास दिल्ली में भी पतंगबाजी के दौरान मांझे से हुई किसी व्यक्ति की मौत और बड़ी संख्या में पक्षियों के घायल होने की खबर आती है। हम अभी भी पक्षियों को लेकर संवेदनशील नहीं हैं। आक्रामकता हमारे व्यवहार का सामान्य लक्षण बनती जा रही है। हमारा अंधाधुंध शहरीकरण, बागों, नदी-नालों, तालाब-जोहड़ों का खत्म होना दरअसल मानवता के लिए विनाश का रास्ता है। ध्यान से देखिए तो आप के बचपन में आसपास घूमने वाली गौरैया, बनमुर्गी, कोयल, नीलकंठ, महोखा जैसे पक्षी अब विलुप्त होने की कगार पर हैं। तितली के पीछे-पीछे दौड़ना तो आज के बच्चे जानते होंगे, इसमें संदेह है!

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