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दुनिया मेरे आगे: कथा नए स्कूल की

खुशी की बात यह थी कि बच्चों के चेहरे पर अद्भुत मुस्कुराहट थी। खिले-खिले ऊर्जा से भरे हुए। मानो घर के रोजाना के कामों से मुक्ति उन्हें स्कूल में रह कर ही मिलती हो।

Author Updated: August 29, 2019 4:49 AM
स्कूल की प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रेमपाल शर्मा

हाल में बुलंदशहर के अपने गांव के रास्ते में दोस्त ने बताया कि यहां खुर्जा और बुलंदशहर के बीच अल्पसंख्यकों के लिए कुछ नए स्कूल खुले हैं। योजना तो पिछली सरकार की थी लेकिन बन कर अब तैयार हुए हैं। देखने की उत्सुकता हुई और गाड़ी उधर मोड़ दी। जीटी रोड के मुख्य सड़क मार्ग से गांव की पतली-पतली गलियों के बीच लगभग एक किलोमीटर का रास्ता पार करके हम स्कूल पहुंचे। ऐसी भव्य इमारत! चमाचम! बीस कमरे, सुंदर-सा प्रवेश द्वार, खेल का मैदान, नए लगे पेड़। मन ऊर्जा से भर गया।

लेकिन उत्साह ठंडा होने में भी देर नहीं लगी। स्कूल छठी से लेकर बारहवीं तक का है लेकिन अभी सिर्फ दो कक्षाएं ही चलती हैं- नवीं और दसवीं की। पिछले वर्ष सिर्फ नवीं कक्षा ही चल रही थी। क्यों? यहां तो चारों तरफ बच्चों के लिए स्कूल है ही नहीं और इतनी अच्छे स्कूल में दाखिला क्यों नहीं? क्योंकि सरकार ने दो साल में अभी सिर्फ एक शिक्षक दिया है। उसे शिक्षक मानो, प्रिंसिपल मान लो या क्लर्क, वही सभी कुछ है। स्कूल की अकेली शिक्षिका अचानक हमारे पहुंचने से अचकचा गई। फर्श पर एक साथ दो कक्षाओं के बीच में उनकी कुर्सी थी। एक तरफ नवीं क्लास के बच्चे तो दूसरी तरफ दसवीं के। काश हार्वर्ड, कैंब्रिज के शिक्षाविद हमसे भी कुछ सीख पाते कि कैसे अकेले शिक्षक के बूते भारत में पूरा स्कूल चलाया जाता है।

जब ठीक-ठाक कक्षाएं हैं तो फर्श पर क्यों बैठे हैं? यह पूछने पर शिक्षिका ने व्यावहारिक बात बताई- ‘मैं बीच में बैठ कर दोनों क्लासों को तो भी संभाल लेती हूं।’ हमने पूछा- क्या सभी विषय पढ़ा लेती हैं? तो वे बोलीं-‘क्या करें, मैं हूं अर्थशास्त्र की लेकिन बारी-बारी से सभी विषय पढ़ाने ही पड़ते हैं।’ आप और शिक्षकों की मांग क्यों नहीं करते लिखित में? क्या डीएम और उच्च शिक्षा अधिकारियों को बताया? ऐसे प्रश्नों पर वे हकलाने लगीं कि कहीं कोई आफत न खड़ी हो जाए।

लब्बोलुआब यह कि बार-बार कहने के बावजूद न शिक्षक नियुक्त हुए ,न क्लर्क और इसीलिए जो बच्चे दाखिला लेना भी चाहते हैं मसलन छठी, सातवीं क्लास में, वे भी नहीं आ पाते। इस बारे में गांव के प्रधान को भी सारी हकीकत पता है लेकिन वे दिल्ली रहते हैं यानी कि उनकी पत्नी गांव की प्रधान बनी हैं और पूरे परिवार के साथ में दिल्ली में रहती हैं। प्रधानी के दायित्व गांव में उनके छोटे भाई संभालते हैं, यानी कि भारतीय लोकतंत्र में खड़ाऊ प्रधानी। साल में असली प्रधान पत्नी तो मुश्किल से ही आती है, उनके पति कभी-कभी आते हैं जैसे पिछले बार एक सरकारी कार्यक्रम में पेड़ लगाने और फिर चुनाव के दौरान आए थे।

खुशी की बात यह थी कि बच्चों के चेहरे पर अद्भुत मुस्कुराहट थी। खिले-खिले ऊर्जा से भरे हुए। मानो घर के रोजाना के कामों से मुक्ति उन्हें स्कूल में रह कर ही मिलती हो। जुलाई के महीने में जरूर संख्या कुछ कम रहती है क्योंकि उन दिनों ये सब बच्चे खेतों में धान की रोपाई करने जैसे कामों में लगे रहते हैं। शिक्षिका समझदार लगती थीं क्योंकि उन्होंने कहा, इनके लिए पेट भरना ज्यादा जरूरी है बजाय स्कूल के और इसीलिए हम इसे नजरअंदाज कर देते हैं। वाकई लड़कियों की कॉपी में लेख को देख कर लगता था, काश इनके पंखों को और उड़ने का मौका मिलता!
कुछ लड़कियां अपने मां-बाप के साथ घर पर सिलाई और कढ़ाई-बुनाई का काम भी संभालती हैं। जाहिर है, बच्चे तो पढ़ना चाहते हैं लेकिन सरकार और समाज की ऐसी नीयत, व्यवस्था और विवशता के चलते दुनिया की सबसे नौजवान आबादी अभी भी सबसे निरक्षर आबादी है। काश, कभी डीएम या शिक्षा अधिकारी भी मुख्य शहर से सिर्फ तीन किलोमीटर पर स्थित इस स्कूल का दौरा कर पाते! शायद उन्हें अपने आला अफसरों और नेताओं की खुशामद से ही फुर्सत नहीं मिलती! काश प्रधान गांव में ही रहता और दिल्ली से लोकतंत्र नहीं चलाता! और यह भी कि यह स्कूल मुक्त सड़क के किनारे होता जहां बच्चों के आने-जाने की सुविधा रहती।

पता लगा कि स्कूल बनवाने के लिए तो सरकार चार करोड़ रुपए तक देती है लेकिन जमीन ग्राम सभा जिसकी कीमत दस लाख से अधिक नहीं होगी। और ग्राम सभा वहीं जमीन देती है जो किसी बियाबान में उसके अधिकार में है। इसीलिए न स्कूल जाने के रास्ते सही होते हैं, न आबादी और जरूरत के हिसाब से बनाए जाते हैं। और न फिर उनकी खैर खबर ली जाती है। चार करोड़ का ठेका तो तुरंत पूरा हो गया, अल्पसंख्यकों के लिए किए जाने वाले कामों की भी खानापूर्ति हो गई, सही शिक्षा का सपना न जाने कब पूरा होगा।

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