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दुनिया मेरे आगे: नेकी का चेहरा

बचपन में सुना था पिता से कि ‘नेकी कर दरिया में डाल’। इसमें ‘नेकी कर’’ तो समझ में आ गई, मगर ‘दरिया में डाल’, मेरी बाल सुलभ बुद्धि अनुभूत नहीं कर सकी थी।

Author Published on: December 12, 2019 3:11 AM
राजधानी रायपुर सहित हमारे छत्तीसगढ़ के अनेक शहरों में ‘नेकी की दीवार’ बना दी गई है, जहां लोग अपनी पुरानी चीजें छोड़ कर खुशी महसूस करते हैं।

हमारे शहर में एक ‘नेकी की दीवार’ है, जहां शहर के लोग अपने पुराने कपड़े, जूते, चप्पलें सहित ऐसी शय जो काम की नहीं रही, आकर छोड़ जाते हैं। नेकी की दीवार पर अपनी बेकाम हो चुकी चीजों को छोड़ कर हमें शांति की अनुभूति होती है। एक दफा घर पर मैंने भी शायद कुछ नेकी का काम किया था। मेरे और मेरी पत्नी के कुछ पुराने कपड़े, बच्चों की पुरानी उपयोग में नहीं आ रही चीजों को फेंकने की जगह कुछ लोगों को मैं बुला लाया और उन्हें अपनी पसंद की काम की चीजों को ले जाने का अनुरोध किया। पांच-छह पुरुष, महिलाओं ने सारी चीजें आपस में बांट ली। मुझे सुखद अनुभूति के साथ यह भी प्रतीत हुआ कि कहीं मुझसे कुछ गलत काम तो नहीं हो गया है!

क्या यह नेकी का काम है? शायद नहीं! मैंने अपनी बेकार की चीजों को अगर किसी को बांट दिया, तो यह नेकी का काम किस अर्थ में यह हुआ? यह तो आत्म-छलना, प्रवंचना से आगे कुछ भी नहीं है। मैं सोचता रहा। उद्विग्न होकर विचार करता रहा कि कहीं कुछ गलत हो रहा है। किसी ने कहा कि आपने बड़ा ही नेक काम किया, जरूरतमंदों को अपनी चीजें बांट दी। मगर मेरा जमीर यह स्वीकार करने तैयार नहीं हुआ कि इसमें मेरी कुछ नेकी का काम है।
ऐसी ही संकल्पना ‘नेकी की दीवार’ की अनुभूत होती है। राजधानी रायपुर सहित हमारे छत्तीसगढ़ के अनेक शहरों में ‘नेकी की दीवार’ बना दी गई है, जहां लोग अपनी पुरानी चीजें छोड़ कर खुशी महसूस करते हैं। कई जगहों पर काफी राशि खर्च कर बनाई गई ऐसी ‘नेकी की दीवारों’ की भव्यता देख कर आंखें चौंधिया जाती हैं। एक जगह तो पचास लाख का भवन है, तो तीस लाख की सजावट की गई है। अब यह ‘नेकी की दीवार’ है, जहां लोग आते हैं, अपने बेकार हो चुके सामान दे जाते हैं, जिन्हें नगर निगम बाद में जरूरतमंद लोगों या परिवारों के पास पहुंच कर छोड़ जाता है।

दरअसल, यह नेकी की दीवार की संकल्पना का भदेस स्वरूप है। हम हर अच्छी प्रेरणादायी घटना को बिगाड़ कर, उसकी बुनियादी सोच के साथ एक तरह से उसकी भावना की हत्या कर देते हैं। ‘नेकी की दीवार’ की भावना बेशक बेहद उदात्त है। एक श्रेष्ठ सोच और भावना का प्रतिफल है। मगर हम इसमें जब सरकार, नगर निगम, स्वयंसेवी संस्थाओं को जोड़ देते हैं तो यह अपनी मूल सोच को खो देता है। ‘नेकी की दीवार’ आम आदमी की पहल का नतीजा है। यह आम आदमी द्वारा क्रियान्वित हो तो बेहतर प्रतिसाद, उच्च भावना का प्रदर्शन माना जा सकता है। मगर सरकार, नगरीय निकाय इस काम को करने लगे तो यह अपना मूल स्वभाव छोड़ देता है। यह अनुभूति मुझे ‘नेकी की दीवार’ के आसपास कुछ समय व्यतीत करने के बाद शिद्दत से हुई।

मुझे लगा कि पचास लाख या एक करोड़ रुपए खर्च करके जब सरकार ‘नेकी की दीवार’ का संचालन करने लगे तो यह ‘नेकी की दीवार’ कहां रही! करोड़ों के खर्च की शोभा के साथ पुराने कपड़े या जरूरत के सामान बांटना। उसका तो मूल स्वभाव ही बदल गया! नेकी की दीवार का मूल है उत्स है सादगी और मनुष्य का श्रेष्ठतम भाव। अगर करोड़ों खर्च करके किए गए आयोजन के तहत पुराने और छोड़े गए कपड़े या सामान बांटे जाते हैं तो उसका कोई मतलब नहीं रहा। भले ही कल्याण कार्य या उदात्तता का प्रदर्शन हो जाए।

बचपन में सुना था पिता से कि ‘नेकी कर दरिया में डाल’। इसमें ‘नेकी कर’’ तो समझ में आ गई, मगर ‘दरिया में डाल’, मेरी बाल सुलभ बुद्धि अनुभूत नहीं कर सकी थी। लंबे समय तक यह कहावत मेरे मन-मस्तिष्क में उमड़ती-घुमड़ती रही और आखिरकार अब समझ में आया। लेकिन लगता है कि आज भी बहुतों को यह कहावत समझ में नहीं आई है और वे आत्मप्रवंचना में उलझे हुए हैं। भारी राशि खर्च कर किए गए इस आयोजन के पैसों से नए कपड़े खरीदे और बांटे जा सकते थे। लेकिन किसी दिखावे के आयोजन से लोगों का भला चाहे जिस सीमा में हो, लेकिन सच यह है कि बिचौलिए अफसर और नेताओं को मलाई खाने को मिल जाती है।

आखिर क्या वजह है कि भव्यता और शान के बीच खड़ी ‘नेकी की दीवार’ के पास जाने वाले गरीब लोग हिचकने लगते हैं, वहां रखी गई चीजें लेने में हीनभाव महसूस करने लगते हैं। जरूरत इस बात की है कि ‘नेकी की दीवार’ के आयोजन को उसकी मूल संकल्पना के साथ उतारा जाए! लोग मदद करना चाहते हैं तो उस मदद में एक गरिमा हो, उसके प्रति सम्मान हो, जिसकी मदद की जा रही है। जिन सामानों का उपयोग हमारे पास नहीं है, वे किसी और के उपयोग में आएं, तो अच्छा है। लेकिन अगर हम उस मदद में गरिमा को साथ में रखें तो ‘नेकी की दीवार’ अपनी वास्तविक भावना के साथ जमीन पर उतर सकेगी।

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