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दुनिया मेरे आगे: राह का कनेर

कोई जरूरी नहीं कि सबको व्यवस्थित जगह ही मिले। होना तो यह चाहिए कि जो जगह मिल गई है, कोई वहीं पर मगन हो ले।

सड़क के पौधे तो खिलखिलाते ही रहते हैं और हर मौसम में खुश रहना जानते हैं। (सांकेतिक तस्वीर)

हरियाली और रास्ता खींचते ही रहे हैं। खासकर तब जब बारिश के दिनों में कहीं जा रहे होते हैं। बारिश के साथ धरती खिल जाती है। धरती का खिल जाना, महकना और रंगों में डूब जाना ही एक तरह से बारिश में पृथ्वी का नहाना है। एक तरह से देखें तो पृथ्वी पर हर मौसम अपने रंग और जज्बे से अपनी ओर खींच ही लेता है, पर बारिश के दिन की बात ही अलग होती है। कोटा से जयपुर के रास्ते पर चलते-चलते सड़क, हरियाली और दूर-दूर तक पसरे खेत अपनी ओर बुलाते से लगते हैं। यहां जीवन जीने की हलचल अलग से दिखती है। जीवन के शांत और सौम्य परिवेश में ऐसा लगता है मानो बादलों से बातें करते हुए जा रहे हों। वे कब आकर बरस जाएंगे, कुछ कह नहीं सकते। बादलों की आवाजाही और धूपछाया के बीच हल्की फुहार और इन सबके साथ सड़क विभाजक यानी डिवाइडर पर खिली हरियाली जीवन का प्रतीक बन कर छाई हुई थी। इस हरियाली में जीवन खिला-खिला दिखता है।

डिवाइडर पर मन को भाने वाले पौधे कनेर, बोगनबेलिया, चंपा और ठिगने पौधे जो ज्यादा बढ़ते नहीं पर हरे-भरे बने रहते हैं, इनका हरा-भरा बने रहना राहगीरों को भाता है।
ये पौधे मन की चेतन अवस्था को प्रकट करते हैं। सड़क पर जीना आसान नहीं। यहां वही जी सकता है जो हर तरह के अभावों के बीच रहता आया हो। जीने की इच्छा इतनी प्रबल हो कि भूख-प्यास सब सह सके और इसके बाद खिलखिलाता रहे। सड़क के पौधे तो खिलखिलाते ही रहते हैं और हर मौसम में खुश रहना जानते हैं। इन्हें इस बात से मतलब नहीं कि कोई इनकी फोटो ले रहा है कि नहीं। फोटो संस्कृति से बहुत दूर ये मगन रहते हैं। कनेर को मगन भाव से देखता हूं तो यही लगता है कि ये शायद सड़क मार्ग के लिए ही बने हैं। सड़क पर धुआं हो या धुंध, ये सब सह लेते हैं, खिलखिलाते रहते हैं।

कोई जरूरी नहीं कि सबको व्यवस्थित जगह ही मिले। होना तो यह चाहिए कि जो जगह मिल गई है, कोई वहीं पर मगन हो ले। खिलखिलाना ही मनुष्यता का उत्सव है। इस उत्सव को बारिश में पूरी तरह से खिलने का अवसर मिलता है। जब बारिश से पत्तियां धुल जाती हैं और जीवंत हो जाती हैं तो लगता है कि हां, जीवन जी लिया। जीवन जीने का यही भाव कनेर की पत्तियों, फूल और हरियाली के साथ रास्ते को देख कर लगता है। राह के कनेर, बोगनवेलिया बरबस ही ध्यान खींच लेते हैं। कनेर हरे देह पर धारण किए रहते पीले-पीले फूल। ये मन में बस जाते हैं। इनकी जीवंत छवि, पीले फूल इस तरह सज जाते हैं कि पूछिए मत! मन खिल जाता है। वहीं आसपास पुराने पड़ चुके पीले जर्जर फूल भी पड़े रहते हैं। कनेर भौतिकता के अथाह सागर में अपनी निर्लिप्तता के लिए जाना जाता है। इसे चकाचौंध छूकर भी नहीं आई। याद आता है कि गांव में भी कनेर कुएं के पास खड़ा है। वर्षों से इसी तरह खिला पड़ा रहता है। कोई देखभाल नहीं, कोई देखे न देखे, कनेर खिला रहता।

कनेर में खिलने की एक स्वाभाविक वृत्ति है। मौसम की मार को सहते हुए भी खिल जाता है। जब लोगबाग इसके पास आते हैं तो फूल और फल (कोइना) देने के लिए तत्पर हो जाता है। लोगबाग पूजा भाव से फूल तोड़ते हैं तो बच्चे खेल भाव से। कनेर पर कोई फर्क नहीं पड़ता। इसे किसी संग साथ की जरूरत महसूस नहीं होती। भाव-अभाव, सबमें खिलना, बने रहना जानता है। कनेर एक प्रतीक है जीवन के इस भाव का कि जब आपको खिलना है, मगन रहना है तो किसी की परवाह न करें। यह मत सोचें कि कौन क्या सोचेगा, क्या कहेगा! अगर यह सोचेंगे तो कुछ कर ही नहीं सकते। कौन क्या सोचता है, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि आप क्या सोचते हैं, आपकी सोचने की प्रक्रिया क्या है, इस पर काम करें और अपनी गति को प्रारंभ करें।

यह मन की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसे दूसरों के आधार पर बनाना गलत होगा। यह तभी संभव होगा, जब आप किसी की भी परवाह किए बिना अपने मूल स्वभाव में जीते हैं। मूल स्वभाव में बने रहना और हर स्थिति के साथ जीना, साक्षात्कार करना और हर तरह की प्रतिकूलताओं को अपने भीतर जज्ब करने का भाव ही आपको बड़ा बनाता है। कनेर तो बस अपनी जगह पर बना रहता है। कोई आए तो ठीक, न आए तो ठीक। संसार में जीने से बढ़ कर कुछ नहीं है। राह के डिवाइडर पर तन कर बने रहने वाले ये फूल जीवट के प्रतीक भी कहे जा सकते हैं। यहां कोई देखने वाला है या नहीं है! यहां तो सख्त जान का पौधा और आदमी ही चल पाएगा।

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