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दुनिया मेरे आगे: सामूहिकता का संदेश

यह परंपरा कब से चली आ रही है, इसका पता नहीं। सगुण भक्ति से लेकर निर्गुनिया संत, सभी की आराधना का प्रमुख माध्यम कीर्तन रहा है। गुरबानी के पाठ से लेकर बौद्ध धर्म के सामूहिक ‘ओं मणि पद्में हूं’ का पाठ इसी का एक रूप रहा है।

Author June 25, 2019 1:27 AM
कीर्तन का आयोजन करवाने के कई कारण हो सकते हैं।

निशा नाग

गली-कूचों और मुहल्लों वाले शहरों में मंदिरों की अच्छी-खासी तादाद देखी जाती है और अब नई बसी सोसाइटियों में भी एक न एक मंदिर जरूर होता है। वहां से अक्सर किसी खास त्योहार या मंगलवार, शनिवार या नवरात्र के मौके पर ताल-बेताल ढोलकी के साथ चम्मच की खट-खट की ऊंची आवाज के साथ गाए जाने वाले भजनों की पुकार कानों में पड़ती रहती है। उसे सुन कर अक्सर कुछ लोग मुंह बिचका कर और युवा गृहिणियां इसकी खाली बैठी औरतों का शगल कह कर खिल्ली उड़ाती हैं। पर सच यह है कि इस तरह की कीर्तन मंडली दरअसल चौपाल और किटी-पार्टी की तरह ही सामुदायिक मिलन का एक अवसर है। खासतौर पर उन महिलाओं के लिए, जो कुछ सुकून में हैं, जिन्होंने घर-परिवार की जिम्मेदारियों को निभा लिया है और शायद अब उनकी जरूरत घर में उतनी नहीं रही या सारी जिंदगी खटने के बाद अब वे अपने ढंग से जिंदगी का सुख लेना चाहती हैं। ठीक उसी तरह, जैसे लोक गीतों में लोक का हृदय बोलता है। कीर्तन मंडली के भजनों में प्रौढ़ महिला हृदय का अच्छा-खासा ‘कैथार्सिस’ होता है। इन कीर्तनों का समय भी अवसर के मुताबिक ही रखा जाता है। यानी इसमें हिस्सा लेने वालों के कामकाज और सुविधा को ध्यान में रख कर ही वक्त तय किया जाता है।

कीर्तन का आयोजन करवाने के कई कारण हो सकते हैं। मसलन, मन्नत पूरी होने या नौकरी लगने की दलील पर या फिर जन्मदिन या घर पर होने वाली किसी शादी से पहले भी लोग कीर्तन कराते हैं। कीर्तनों में कुछ भजन देवी-देवताओं की स्तुति के होते हैं तो कुछ अवसर के मुताबिक बना लिए जाते हैं। कुछ गंभीर किस्म के भजन होते हैं तो कुछ चुहल भरे भी। जैसे ‘चले आना ऊंची अटारी मेरे बांके बिहारी’। फिल्मी तर्जों के साथ-साथ कुछ परंपरागत तो कुछ स्वरचित लयों पर ये भजन गाए जाते हैं। सुर सही होने की परवाह किसी को नहीं होती। जैसे मन करता है, उसी अंदाज में गाए जाते हैं, जिन्हें देख कर अब्दुल रहमान के ‘संदेश रासक’ का वह कथन याद आ जाता है- ‘कोयल यदि मधुर स्वर में गाती है तो क्या कौवे न करकराएं, राजदरबार नें नर्तकी शास्त्रीय नृत्य करती है तो क्या ग्राम्य युवती न नाचे’!

यह परंपरा कब से चली आ रही है, इसका पता नहीं। सगुण भक्ति से लेकर निर्गुनिया संत, सभी की आराधना का प्रमुख माध्यम कीर्तन रहा है। गुरबानी के पाठ से लेकर बौद्ध धर्म के सामूहिक ‘ओं मणि पद्में हूं’ का पाठ इसी का एक रूप रहा है। एक अलग अंदाज और संदर्भ के साथ नात और कव्वाली तथा मुहर्रमों की मजलिस को भी देखा जा सकता है। हालांकि उसका संदर्भ बिल्कुल अलग हो जाता है, पर महिलाओं के इस तरह के खुलेपन के साथ चुहलबाजी और मन के रंजन का भाव इन्हीं साप्ताहिक कीर्तनों में रहता है।

इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों द्वारा डेढ़ सौ साल पहले जिन गिरमिटिया मजदूरों को मारिशस-ट्रिनिडाड या फिजी भेजा गया था, वहां सोना कमाने के लालच में गए अमानवीय स्थितियों में जीते मजदूरों को जीने का संबल कीर्तन से ही मिलता था। कीर्तन के इस संदर्भ में महादेवी वर्मा का लिखा एक संस्मरण ‘ठकुरी बाबा’ याद आ रहा है, जहां वे कल्पवास करने गंगा किनारे जाती हैं और असमय रात को बारिश आ जाने से ग्रामीणों का एक दल उनकी कुटिया में घुस जाता है। तब महादेवी के आतिथ्य से प्रभावित होकर वह वहीं टिक जाता है। वह ग्रामीण दल जिस रूप में कीर्तन और सत्संग करता है, उसका निश्छल रूप महादेवी को भीतर तक छू लेता है। वे लिखती हैं- ‘कबीर, सूर, तुलसी जैसे महान कवियों से लेकर अज्ञातनामा ग्रामीण तुक्कड़ों तक के पद उन्हें स्मरण थे। एक जो कड़ी गाता था, उसे सबका समवेत स्वर दोहरा देता था।’ महादेवी कवि सम्मेलनों को दंगल (जहां सब लोग एक दूसरे को नीचा दिखाना चाहते हैं) तो ग्रामीण दल के कीर्तन को हिंडोला कहती हैं, जिसमें ‘ऊंचाई-निचाई का स्पर्श भी एक आत्म विस्मृति में विश्राम देता है’।

आजकल इस सत्संगनुमा कीर्तन में अच्छा-खासा ग्लैमर भी शामिल हो गया है, जहां लुभावने चेहरों वाली तथाकथित संत महिलाएं विशेष भाव-भंगिमा के साथ कभी-कभी फिल्मी गानों की तर्ज पर भजन गाती हुई दिखती हैं। व्यावसायिकता भी इनका हिस्सा हो गई है। जागरण करवाने और घरों में कीर्तन करवाने वाली व्यवसायिक मंडलियां भी हैं जो अच्छा-खासा पैसा लेकर यह काम करती हैं, लेकिन महिलाओं द्वारा किए जाने वाले इस कीर्तन का अंदाज ही निराला है, जहां गली-मुहल्ले की बातचीत, चुहलबाजी और थोड़ी-बहुत आपसी राजनीति और नाराजगी भी शामिल रहती है। जैसे अगर किसी महिला की किसी अन्य महिला से कोई नाराजगी है तो यह तय है कि वह उसके द्वारा गाए जाने भजन में वह अपना स्वर नहीं मिलाएगी! पर सच तो यह है कि ये कीर्तन वाचिक परंपरा में समुदाय को रससिक्त करने और सामूहिकता में जीने का संदेश देते हैं।

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