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दुनिया मेरे आगे: बाजार की चमक

युवा पीढ़ी के लिए मॉल में आना, घूमना, समय गुजारना एक नशा है। वे नहीं आते हैं तो उन्हें लगता है कि कुछ बहुत जरूरी छूट गया है। यह मॉल-संस्कृति है। पांच सितारा साज-सज्जा में बड़ी-बड़ी ब्रांडेड दुकानें हैं, अंतररष्ट्रीय शृंखला के कॉफी हाऊस हैं, रेस्तरां और सुपर स्टोर।

Author Published on: August 2, 2019 1:39 AM
रोजिनी नगर को वह चीन में शंघाई का ‘फेम मार्केट’ मानते हैं।

कमल कुमार

मेरे घर के पास सिर्फ चौराहा पार करने में पंद्रह-बीस मिनट लग जाते हैं। कारण और भी होंगे, लेकिन इसका मुख्य कारण है मॉल। मॉल में जाना अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग कारणों से जरूरी है। जो लोग दिल्ली के बाहर से आते हैं, उन्हें तो मॉल जाना ही है। फिर युवा पीढ़ी का तो वह ठिकाना है। अच्छे परिवारों की पढ़ी-लिखी पर गृहस्थ महिलाएं हैं। उन्हें भी जाना है। किटी पार्टी, खरीदारी, फिल्में देखना और समय गुजारना। मुझे निजी कारणों से मॉल जाना अच्छा नहीं लगता। पर बच्चों के साथ चली जाती हूं। वहां बैठ कर आते-जाते, घूमते-फिरते लोगों की भाव-भंगिमाएं देखती हूं।

जो वहां जाते हैं, वे खरीदारी भी करते हैं। थोड़ा आश्चर्य होता है। वहां की दुकानों में ब्रांडिंग के कारण सामानों की कीमतें काफी ज्यादा होती हैं। कुछ दिन पहले मॉल गई तो बेटी ने एक लंबी स्कर्ट पहन रखी थी। दो लड़कियों ने उसकी तरफ देखा, कुछ बातें कीं और रुक गर्इं। एक ने पूछा लिया- ‘आपने यह स्कर्ट ‘जारा’ से ली है? वहां तो छह हजार रुपए का है!’ बेटी ने हंसते हुए कहा- ‘नहीं, सरोजिनी नगर से ली है चार सौ रुपए में।’ उसने उन्हें दुकान का पता भी बताया था। दरअसल, बेटी को भी मॉल से खरीदारी में बहुत दिलचस्पी नहीं है। सरोजिनी नगर को वह चीन में शंघाई का ‘फेम मार्केट’ मानती है, जहां मशहूर ब्रांड के कपड़े भी सही कीमत पर उपलब्ध हैं।

खैर, मुझे वहां लोगों के चेहरे पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। पहली बार मॉल में आए लोगों के भाव हैरानी मिश्रित खुशी के होते हैं। खरीदारी या शॉपिंग करने वालों की एक अलग दुनिया है। बड़े-बड़े बैग लिए सामान खरीद कर जाते हुए लोगों के चेहरों पर उल्लास होता है। पर क्या वे जो सामान खरीदते हैं, उसकी जरूरत होती हैं उन्हें? आज यह सवाल ही नहीं रहा। वहां खरीदारी जरूरत के लिए नहीं की जाती। मुझे कई महिलाओं ने बताया कि कई बार तो याद भी नहीं रहता कि जो पिछली बार खरीदा था, वह क्या था। घर लाया जाता है, आलमारी में पड़ा रहता है और लाकर भूल भी जाते हैं। यह नई संस्कृति है। ‘बाई ऐंड थ्रो’ यानी खरीदो, पहनो और फेंको। पहले के ‘यूज एंड थ्रो’ यानी इस्तेमाल करो और फेंको के आगे की। आज की। एक बार इस पर एक बहस हुई थी जिसका निष्कर्ष था कि शॉपिंग एक बहुत बड़ा कैथारसिस होता है। इतना ही नहीं, अवसाद से भी मुक्त करता है। अवसाद में ‘शॉपिंग इज ए गुड रमैडी टु कम आऊट आॅफ इट!’ यह एक कोटेशन थी जो मैंने पढ़ी भी थी। आज जब घरों में एकल परिवारों में संवाद की स्थिति टूट रही है। साथ बैठने, खाने-पीने, खुशी मनाने के मौके कम होते जा रहे हैं तो सबकी अपनी अलग-अलग दुनिया बन गई है। इस दुनिया में अकेलापन है, अवसाद है, निराशा का अंधेरा है। इसका निराकरण सब अपनी तरह से करते हैं। इसलिए शॉपिंग करना, मॉल जाना उन्हें कुछ समय के लिए एक दूसरी जगमगाती दुनिया में ले आता है और फिर वे बार-बार यहां आना चाहते हैं। शायद अपने भीतर के अंधेरे से निपटने के लिए!

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखती हूं तो इनके चेहरे पर हीनभाव या श्रेष्ठभाव होते हैं। यहां आना, अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझना है। उससे मन में एक उत्साह जगता है। हीनभाव से मुक्त होने के लिए, अपने को कमतर न माने जाने के लिए, उन्हें भी वही करना होता है जो दूसरे सब कर रहे हैं और ‘ऊंचे’ दिख रहे हैं। मुझे वहां एक कप कॉफी के दो सौ रुपए देना भी विचित्र लगता है। मेरी एक मित्र ने कहा था कि तुम कंजूस हो। जबकि कंजूस वह होता है जो खुद को जरूरतों से वंचित रखता है। पर जो दूसरों के पीछे लगता है, वही करता है जो दूसरे कर रहे हैं, बिना जाने-समझे कि उसे खुद को क्या चाहिए और क्यों चाहिए, ऐसे लोग एक तरह से भ्रमित होते हैं।

युवा पीढ़ी के लिए मॉल में आना, घूमना, समय गुजारना एक नशा है। वे नहीं आते हैं तो उन्हें लगता है कि कुछ बहुत जरूरी छूट गया है। यह मॉल-संस्कृति है। पांच सितारा साज-सज्जा में बड़ी-बड़ी ब्रांडेड दुकानें हैं, अंतररष्ट्रीय शृंखला के कॉफी हाऊस हैं, रेस्तरां और सुपर स्टोर। गृहिणियां यहां सुपर स्टोर से घर की खरीददारी करती हैं। घूमती हैं, कॉफी पीती हैं और खुश होकर लौट आती हैं। सबके लिए कुछ न कुछ तो है ही। मैंने इधर-उधर घूम कर जाना था कि मॉल के बाहर भी कुछ रेस्तरां हैं जहां आसानी से बैठ कर सामान्य दाम पर चाय-नाश्ता किया जा सकता है। वहां भी भीड़ थी। उस भीड़ में मुझे छात्र-छात्राएं अधिक दीख रहे थे। वहां से थोड़ी दूर पर एक खुले बाजार में कपड़े, जूते-चप्पलें, घरेलू वस्तुएं और साज-सज्जा के लिए कॉस्मेटिक्स भी। वहां भी भीड़ थी।
किसी विशेष यानी कुछ मशहूर त्योहारों के दिन भी ऐसी भीड़ मौजूद होती है। आज के जीवन की यह नई शैली है। यहां अच्छे-बुरे का प्रश्न नहीं है। बदले समय में जीवन जीने का एक अपना तरीका है।

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