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दुनिया मेरे आगे: हिंदी का जीवन

Hindi Diwas 2018: हिंदी की विपन्नावस्था को लेकर रोना रोया जा रहा है, लेकिन उसे रोजगार और पेट की भाषा बनाने पर कोई तवज्जो नहीं है। न सरकार की मंशा है और न जनाकांक्षा। चिकित्सा और विज्ञान या फिर प्रौद्योगिकी की भाषा इतनी दुर्बोध अनूदित की जाती है कि विद्यार्थी अंग्रेजी में पढ़ना ही बेहतर समझता है। भाषायी अशुद्धि के उदाहरणों से पाठ्यक्रम की किताबें भरी दिख जाती हैं।

Author September 14, 2018 11:48 AM
प्रतीकात्मक चित्र

अतुल चतुर्वेदी: हर साल हिंदी दिवस के आते ही इससे जुड़े आयोजन जोर-शोर से शुरू हो जाते हैं। कहीं एक पखवाड़ा तो कहीं एक सप्ताह तो कहीं रस्म अदायगी का एक अदद दिन। सब बजट के मुताबिक। हिंदी के नामी-गिरामी लोग कार्यक्रमों के लिए अपनी तैयारी में लग जाते हैं। उन्हें अपने आसपास बच्चों की हिंदी की कॉपी जांच लेने की फुर्सत नहीं है, जिसमें वे दिवस को ‘दीवस’ और श्रीमती को ‘श्रिमति’ लिख देते हैं। घर के सयाने होते बच्चे पिताजी की आलमारी में रखी किसी हिंदी पुस्तक को हाथ नहीं लगाते। वे अंग्रेजी के लोकप्रिय लेखकों के प्रशंसक हैं। हिंदी से उनका वास्ता सिर्फ फिल्मी गीतों तक का है। बदलते परिदृश्य को लेकर कुछ लोग निराश हैं तो कुछ उत्साहित। हिंदी और अंग्रेजी मिश्रित भाषा को आम मान लिया जा रहा है और इस तरह हिंदी को हाशिये पर डालने का अभियान चल रहा है। भाषा की पंचमेल खिचड़ी कबीर ने दी थी जो सर्वग्राह्य और बोधगम्य थी, लेकिन ये ‘हिंग्लिश’ की छौंक समझ से परे है। मीडिया में ‘खबरें फटाफट’ अब ‘न्यूज इन ब्रीफ’ हो गई हैं और ‘नगर परिक्रमा’ है ‘सिटी हलचल’।

हिंदी की विपन्नावस्था को लेकर रोना रोया जा रहा है, लेकिन उसे रोजगार और पेट की भाषा बनाने पर कोई तवज्जो नहीं है। न सरकार की मंशा है और न जनाकांक्षा। चिकित्सा और विज्ञान या फिर प्रौद्योगिकी की भाषा इतनी दुर्बोध अनूदित की जाती है कि विद्यार्थी अंग्रेजी में पढ़ना ही बेहतर समझता है। भाषायी अशुद्धि के उदाहरणों से पाठ्यक्रम की किताबें भरी दिख जाती हैं। राज्य सरकारों के नवीनतम परिवर्तित पाठ्यक्रम में व्युत्क्रमानुपात, विवर्तन और परासरण दाब, परमाणु संरचना, प्रतिरोध जैसे भारी-भरकम शब्दों के साथ अंग्रेजी के अनुवाद भी नहीं दिए गए हैं। नतीजतन, ये विद्यार्थी दूसरी राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में जाकर पिछड़ जाते हैं।अपनी भाषा जहां अपना गौरव देती है, वहीं स्वाभिमान और संस्कार भी सिखाती है। कई मुहावरे, कई लोकोक्तियां और देशज शब्द आज हाशिये पर हैं। नई पीढ़ी को चौका-बासन, देहरी, सिल-बट्टा, रंगरेज आदि शब्दों का पता तक नहीं है। हिंदी को त्यागने के चक्कर में हमने उसकी बोलियों को भी प्रयोग में लेना छोड़ दिया है, जो उसकी प्राण वायु हैं। त्रिभाषा फार्मूला आज हाशिये पर है। कुछ शुद्धतावादी संस्कृतनिष्ठ हिंदी के समर्थक हैं तो कुछ प्रेमचंद की हिंदी के हामी। गांधीजी की सहज बोधगम्य और प्रचलित हिंदुस्तानी को लेकर साहित्यकारों में भी मतभेद हैं। पठन-पाठन की आदत उत्तर भारतीय समाज में वैसे ही कम थी, लेकिन संचार माध्यमों और मोबाइल क्रांति के विस्फोट के बाद अब पढ़ना-लिखना लगभग छूट-सा गया है। बड़े से बड़े लेखकों की किताबों के एक संस्करण से ज्यादा बिक नहीं पाते। जबकि अंग्रेजी के नए लेखकों की किताबें हजारों की संख्या में बिकती हैं। समाज का सत्य जानना हो तो हमें भाषा की खिड़की से ही झांकना होगा। भारतीय भोजन दाल, रोटी, पूरी, करी, बिरयानी आज इंग्लैंड से लेकर मारीशस, सिंगापुर और अमेरिका तक में लोकप्रिय हैं। लिहाजा ‘बेब्सटर’ की नवीनतम डिक्शनरी में उनमें से कई शब्दों को समाहित किया गया है।

भाषा संस्कृति की वाहक होती है। किसी विदेशी भाषा के माध्यम से हम कैसे अपने समाज के सुख-दुख को कुशलता से समझ और व्यक्त कर सकते हैं? लेकिन हिंदी की अस्मिता के साथ खिलवाड़ जो कुछ टीवी चैनल और अखबार कर रहे हैं, यह ठीक नहीं है। एक भ्रष्ट भाषा ईमानदार और समर्पित नागरिकों का निर्माण नहीं कर सकती। बाजारवाद की चाह में और विदेशी उत्पादों के विज्ञापनों के मोह में यह अंधी प्रतिस्पर्द्धा घातक सिद्ध होगी। दरअसल, इस संदर्भ में हमारे नीति-नियंताओं का ढुलमुल रवैया इसके लिए उत्तरदायी है।
उच्च शिक्षा और प्रबंधन आदि तकनीक के क्षेत्रों में मौलिक हिंदी लेखन को प्रोत्साहन की कोई ठोस योजना नहीं है। मानक शब्दावली के शब्द भी दुरूह हैं। विज्ञान संबंधी लेखकों का भारी अभाव है।

कभी महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इस दिशा में कुछ पुस्तकें लिख कर कोशिश की थी। आज अपने दादा-दादी और नाना-नानी को अपनी मातृभाषा में चिट्ठी लिखने की ताकत और कूव्वत कितने बच्चों में बची है। चिट्ठियां वैसे ही हाशिये पर हैं, जिसके कारण न जाने कितने भावी लेखकों के भविष्य पर विराम लग गया है। असल तथ्य यह है कि हमें अपनी भाषा की गरिमा और महत्त्व को पहचानना होगा। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दोष देकर हम अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते। हिंदी की ताकत हैं उसकी बोलियां और उपभाषाएं। हमें उनको पुनर्जीवित करना होगा। उनके प्रचार-प्रसार पर ध्यान देना होगा। जब भारतीय भाषाएं बचेंगी तभी हिंदी बचेगी। वरना हिंदी दिवस एक रस्मी आयोजन भर रह जाएगा, जहां साहित्यकार अपने गाल बजाएंगे और सरकारी विभाग हिंदी प्रेम का मौसमी दिखावा कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेंगे। न भाषा का भला होगा, न उसके प्रयोक्ताओं का। इसके लिए हमें स्वार्थी निजी दृष्टिकोण से नहीं, देशहित में व्यापक रूप से सोचना होगा।

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