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दुनिया मेरे आगे: मकड़जाल में जीवन

पिछले कुछ महीनों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह चिंता घनीभूत हुई है कि स्मार्टफोन का अतिशय प्रयोग जहां एक तरफ हमारी गर्दन, रीढ़ और स्नायु-तंत्र के लिए घातक है, वहीं कृत्रिम प्रतिभा पर बढ़ती जा रही निर्भरता हमारी वास्तविक प्रतिभा को कुंद करती है, विचार और मनन करने की हमारी प्रवृत्ति को समाप्त करती है।

Author August 24, 2018 3:05 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

नीरज कुमार पाठक

उस जमाने में जब दिल बहलाने के साधन बाहर तलाशने होते थे, हम बच्चे घर के भीतर और बाहर खेले जाने वाले कई खेल खेलते थे। बदले जमाने में स्मार्टफोन और इंटरनेट की जोड़ी ने इस तरह की बाध्यताओं को समाप्त कर दिया है। अधिकतर बच्चे और किशोर, प्रौढ़ भी खुद को स्मार्टफोन की शरण में डाल कर आनंदित-प्रमुदित होते रहते हैं। कई बार तो मेट्रो आदि में सफर करते यात्रियों को यांत्रिक तरीके से इयरफोन लगा कर फोन में नजरें टिकाए देख कर गलतफहमी हो जाती है कि कहीं हमारा राष्ट्रधर्म यही तो नहीं हो गया है!

पिछले कुछ महीनों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह चिंता घनीभूत हुई है कि स्मार्टफोन का अतिशय प्रयोग जहां एक तरफ हमारी गर्दन, रीढ़ और स्नायु-तंत्र के लिए घातक है, वहीं कृत्रिम प्रतिभा पर बढ़ती जा रही निर्भरता हमारी वास्तविक प्रतिभा को कुंद करती है, विचार और मनन करने की हमारी प्रवृत्ति को समाप्त करती है। यह मूलत: हमें सफल होने के लिए तो तैयार कर देती है, लेकिन असफलता को झेल कर फिर से उठ खड़ा होने की शक्ति हमसे छीन लेती है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसी तमाम घटनाएं घटीं हैं, जहां खुशहाल परिवारों ने भी तात्कालिक परेशानियों से तंग आकर आत्महत्या का रास्ता अपना लिया। शायद ये वे लोग रहे होंगे जो सफलता और समृद्धि की रौ में बह कर अपने कुटुंब, समाज और मित्रों से काफी दूर चले गए होंगे और जब आंसू की बूंदें गिराने के लिए इन्हें एक अदद कंधे की दरकार हुई तो वह उन्हें हासिल नहीं हो पाया होगा। बहरहाल, स्मार्टफोन की लत से अपने परिवार को मुक्त कराने के लिए हमने फिर से लूडो का सहारा ले लिया है। दस रुपए के इस साधारण से बोर्ड में अनूठी शक्तियां हैं।

दरकते रिश्तों पर मरहम लगाने का काम कोई इससे सीखे और बिला-वजह महाभारत ठान देने में भी इसका कोई सानी नहीं है। उत्साह और उत्तेजना के संतुलन को बरकरार रखते हुए हमने यह सुनिश्चित किया कि किसी भी कीमत पर खेल में व्यवधान नहीं आने देंगे। इसके लिए हमने खेल के कुछ नए नियम गढ़ लिए और कुछ पुराने नियमों को पुनर्परिभाषित कर दिया, ताकि खेल में आकर्षण और रोमांच बना रहे। अब तो सभी सदस्य शाम होने और लौट कर घर आने की बाट जोहते रहते हैं। अपने जीवन में मौजूद अवयवों, घटकों और परिस्थितियों को नए तरीके से सजा कर सामने लाने से एक तरफ जहां हम पुराने की बोरियत से मुक्त हो सकते हैं, वहीं जीवन के प्रति अनुराग और आकर्षण बनाए रख सकते हैं। यह अनुराग हममें रोज नई ऊर्जा का संचार करेगा- स्मार्टफोन के चार्जर की तरह। रोज सुबह प्राप्त होने वाली सूरज की नई किरणें हमारी धड़कनों का पावर बैंक हैं, नई प्रेरणा, नए आत्मविश्वास और नए संकल्प की जननी हैं। हमें अपनी आंखें खुली रखनी हैं और इन किरणों को अपने चेतन और अवचेतन तक पहुंचने देना है। इन दिनों देश में हो रही घटनाएं व्यथित करने वाली हैं। भूख से तीन बच्चियां काल-कवलित हो जाती हैं, गैरकानूनी तरीके से बनाए गए बहुमंजिले मकान अचानक धराशायी हो जाते हैं, सड़कें पहली बारिश में धंस जाती हैं, अनाथाश्रम के संरक्षक द्वारा ही अबोध बच्चियों का यौन शोषण चलता रहता है, भीड़ शंका के आधार पर कभी भी कहीं किसी को अपना शिकार बना लेती है और धर्मगुरुओं के किस्से नृशंसता और अमानवीयता के नए कीर्तिमान गढ़ते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि हमने खेल के नियमों को लागू करने की शक्ति खो दी है या फिर नियमों का एक ऐसा मकड़जाल तैयार कर दिया है, जिसने अपराधियों को तो अभयदान दे दिया है, लेकिन साधारण नागरिक उसमें उलझ कर छटपटाता रह जाता है।

स्वतंत्रता हासिल करने के सत्तर साल बाद भी अगर पुलिस से आम लोग डरते हों तो फिर शायद हमारी आजादी बेमानी है। मैं खुद को ‘भला आदमी’ समझता हूं क्योंकि मेरी सीमाएं सुपरिभाषित हैं। मैं क्रुद्ध और आहत होने के बावजूद किसी की पिटाई नहीं कर सकता, गाली नहीं दे सकता। हमारे परिवार-समाज से ही निकले लोग अपराधियों-नेताओं और पुलिस-ठेकेदारों और दबंगों से कुत्सित गठजोड़ कर हर प्रकार की अनुचित, अनैतिक गतिविधियों में संलिप्त होते हैं। अगर किसी गतिविधि की आंच सीधे हम तक नहीं पहुंचती है तो हम अपनी आंखें मूंदे रखते हैं। हमारी आह और प्रतिक्रिया तब निकलती हैं, जब हमें चोट लगती है। हमारी अनैतिक चुप्पी ने हमारे आसपास के अपराधियों का मनोबल काफी बढ़ा दिया है। इसीलिए सरेआम हर तरह की घटनाएं घट रही हैं। मेरा बचपन एक छोटे से शहर में बीता। हमने और हम जैसों ने हमेशा इस बात की परवाह की कि हमारे अभिभावक तक हमारी कोई शिकायत मोहल्ले-पड़ोस से न आ जाए। अपने आचरण, चाल-चलन, रंग-ढंग को लेकर सदैव साकांक्ष रहे। ‘लोग क्या कहेंगे’, यह हमारी चिंता के मूल में होता था। बाद में यह जान पाया कि इस तरह की सोच निजी प्रगति को अवरुद्ध करती है। लेकिन आज हमारा देश और समाज जिस मुकाम पर खड़ा है, उसे देख कर मुझे लगता है कि हमें उस सोच की जरूरत है।

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