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दुनिया मेरे आगे: वंचना की मार

दिल्ली के एक पॉश माने जाने वाले इलाके के चौराहे पर अक्सर मैं कुछ छोटी लड़कियों को देखता हूं, जिनके हाथों में गुलाब के फूल और गुब्बारे होते हैं। वे चौराहे पर लालबत्ती होते ही वहां रुकने वाली कारों और ऑटो में बैठी सवारियों से फूल बेचती हैं।

Author June 29, 2019 12:21 AM
गरीब बच्चे लाल बत्ती पर गाड़ियों के रुकते तरह तरह के सामान बेचते नजर आ जाते हैं।

सैयद परवेज

दिल्ली के एक पॉश माने जाने वाले इलाके के चौराहे पर अक्सर मैं कुछ छोटी लड़कियों को देखता हूं, जिनके हाथों में गुलाब के फूल और गुब्बारे होते हैं। वे चौराहे पर लालबत्ती होते ही वहां रुकने वाली कारों और ऑटो में बैठी सवारियों से फूल बेचती हैं। कहती हैं- ‘बाबूजी ले लीजिए, केवल दस रुपए का ही है।’ मैंने भी एक-दो बार उनसे फूल लिए हैं। अब सोचता हूं कि इन फूलों का करूंगा क्या, इसलिए वैसे ही पैसे दे दूं।’ खैर, लोदी रोड में ही शिरडी वाले सांई बाबा का मंदिर है। इस क्षेत्र में कई बड़े संस्थान और कई मंदिर हैं। शिरडी सांई मंदिर के पास जो फूल बेचे जाते हैं, वहां पर भी चमकीले कागज में लपेटा गया एक गुलाब का फूल दस रुपए का नहीं मिलता।

जब कभी मुझे उधर जाना होता है तब यह सब देखता हूं। उन लड़कियों के साथ एक-दो और महिलाएं होती हैं, जो पहनावे से हरियाणवी या राजस्थानी दिखती हैं। उन सभी के कपड़े मैले और फटेहाल होते हैं। वे सभी चौराहे के बीचोंबीच ही गुलाब के फूल को चमकीले कागज में लपेटती रहती हैं। इनके साथ में कुछ पुरुष, छोटे बच्चे भी होते हैं। उनमें से एक शख्स चलने में असमर्थ थे। उनकी कमर धनुष की तरह झुकी हुई थी। ज्यादातर समय वे जमीन पर लेटे रहते हैं। उनके साथ एक औरत, एक शिशु और दो-तीन पांच-सात वर्ष तक के बच्चे दिखते हैं। वे बच्चे और महिला भी चौराहे पर रुकने वाली सवारियों को गुब्बारा बेचते हैं। उनमें से कुछ बच्चे भीख भी मांगते हैं। सोचता हूं कि क्या इनका जीवन बस इतना ही है!

कुछ समय पहले उसी जगह मैंने देखा कि एक तीन-चार वर्ष का बच्चा धूप में ही फुटपाथ पर पड़ा हुआ था। पास ही छाया में एक अधेड़ उम्र की महिला और कुछ अन्य बच्चे थे। वे सभी गुलाब के फूल को पैक कर रहे थे। मैंने उस बच्चे को धूप में पड़े देख कर कहा- ‘यह किसका बच्चा है?’ उन सभी ने कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद मैं आगे बढ़ गया। लेकिन मन नहीं मान रहा था, इसलिए फिर पीछे मुड़ कर देखा। इस बच्चे को यों ही छोड़ कर मैं कैसे आगे बढ़ जाऊं! मैंने दोबारा उनसे कहा- ‘उठाते क्यों नहीं हो बच्चे को।’ उनमें से कोई नहीं हिला। इसके बाद मैंने जरा ऊंची आवाज में बच्चे को उठाने के लिए कहा तब उनके बीच से एक व्यक्ति आया और बच्चे को गोद में उठा लिया।

ऊपर से दिखने में यह संवेदनहीनता का मसला लगता है। लेकिन मेरे खयाल से यहां भी मुख्य प्रश्न है वंचित वर्ग की भूख और इस सामाजिक व्यवस्था का ढांचा। दरअसल, वंचित वर्ग भूख के अलावा इस सामाजिक व्यवस्था से भी लड़ता है। चौराहे पर भी यही प्रश्न है। प्रेमचंद की कहानी ‘कफन’ में में घीसू और माधव होते हैं। इसमें यही दिखाया गया है कि घीसू और माधव के भीतर भूख की अति ने उनकी संवेदनशीलता को या तो बुरी तरह प्रभावित किया था या फिर अभाव की दुनिया के संघर्ष में उनके भीतर सोचने-समझने की सहजता बाधित हुई थी।

दरअसल, स्वाभिमान या आत्मसम्मान से बड़ी चीज तब भूख हो जाती है, जब व्यक्ति के सामने जीवन और भूख से मौत में से किसी एक को चुनने की मजबूरी पैदा हो जाती है। भूख को मिटाना व्यक्ति की पहली जरूरत बन जाती है। कई बार इस क्रम में हुए अवांछित व्यवहारों को समाज स्वीकार नहीं करता है, लेकिन सच यह है कि व्यक्ति की इस स्थिति में सामाजिक व्यवस्था का बहुत बड़ा योगदान होता है।

‘कफन’ में मौजूद अभाव की तस्वीर का दौर आज भी दिल्ली जैसे शहरों के चौक-चौराहों पर दिख जाता है तो यह हमारे सोचने का वक्त है कि आजादी के इतने सालों बाद हमने क्या हासिल किया है। जब एक भूखा आदमी माया-मोह के बंधन से मुक्ति पाने की बात कह दे तब यह हमें बड़ा असहज लगता है। ऐसा क्यों है? क्या इसलिए कि वह भूख और अभाव के बीच जीता है? यही बात कोई ऐसा व्यक्ति बोले जिसकी आत्मा तृप्त हो और भूख उसके लिए कभी समस्या रही ही नहीं हो, तब हमें यह अहसज क्यों नहीं लगता? घर-परिवार छोड़ कर संन्यास की ओर निकल गया व्यक्ति अगर माया-मोह से मुक्त होने की बात करता है तब भी हमें स्वाभाविक लगता है।

क्या यह हमारी दृष्टि का विरोधाभास नहीं है? फुटपाथ पर फूल बेच कर गुजारा करने वाले परिवार के बच्चे या धूप में लिटा कर रखा गया बच्चा, उनके मैले-कुचैले कपड़े- सब उनके लिए एक स्वाभाविक स्थिति है। वजह साफ है कि वे सभी साधनों से वंचित हैं। उस दो वक्त की रोटी की पहुंच से दूर हैं, जिसे जुटाने में सुबह से शाम हो जाती है। दूसरी ओर, हमारी व्यवस्था देश की कुल कमाई का तीन-चौथाई हिस्सा सिर्फ एक प्रतिशत लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए काम कर रही है।

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