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दुनिया मेरे आगे: कहने का कौशल

प्राथमिक कक्षाओं में शामिल विभिन्न कहानियों के हवाले से यह समझने की कोशिश की जा रही थी कि एक बाल कहानी में किन मुख्य तत्त्वों को शामिल किया जाना चाहिए। कहानी है तो उसमें कोई पात्र होगा।

Author Updated: September 9, 2019 6:00 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

कौशलेंद्र प्रपन्न

कहानी पढ़ना और पढ़ाना दो भिन्न कौशल है। जो कथाकार है, संभव है वह कहानी शिक्षण की बारीकियों को शिक्षकों तक संप्रेषित न कर पाए। यह भी हो सकता है कि कहानी विधि को पढ़ाने वाला शिक्षण में तो बेहतर हो, लेकिन उसने कहानियां न लिखी हों। यह भी संयोग हो सकता है कि जो कहानी लिखते भी बेहतरीन हों और कक्षा में शिक्षकों को कहानी पढ़ाने के कौशल में भी प्रवीण हों। कक्षा में जब तीस-चालीस शिक्षक हों तो ‘बाल कहानियां कैसे पढ़ाई जाएं’ विषय पर सिद्धांत रूप में और कहानी के तत्त्वों पर पूरे दिन बातें की जा सकती हैं। लेकिन एक चुनौती यह है कि इसे सुन कर प्रतिभागी सोने न लगें।

ऐसा ही एक तजुर्बा पिछले दिनों हुआ। प्राथमिक कक्षा के लगभग तीस शिक्षक कक्ष में उपस्थित थे। भाषा, भाषा शिक्षण आदि पर चर्चा हो चुकी थी। कहानी पर सीधे बातें करने की बजाय मैंने उन्हें एक दरी पर गोलाकार बैठाया। उन्हें कहा गया कि कोई ऐसी कहानी सुनाएं, जो बच्चों को सुनाई जा सके। सबने कोशिश की कि बेहतर कहानी सुनाई जा सके। कहानी सुनाने के बाद वहां मौजूद दूसरों से पूछा जाता कि क्या आपको कहानी अच्छी लगी? अगर हां तो क्यों और नहीं तो क्यों? इन सवालों पर बोलने वाले खुल कर बोलते- ‘इसमें मजा नहीं आया… कहानी में संवाद नहीं था… रुचि नहीं पैदा हो रही है… कहानी में हाव-भाव नहीं था… बच्चों के परिवेश के अनुकूल नहीं थी आदि।’ फिर उन्हें मैंने एक कहानी सुनाई। कहानी क्या थी, बस इस पृथ्वी के निर्माण की बातें थीं। चांद था, धरती थी और कुछ संवाद थे। संवाद के साथ बोलने की शैली थी।

सवाल फिर भी उठे। सवालों में यह भी शामिल था कि यह कहानी क्यों अच्छी लगी या क्या यह खराब लगी! इसका जवाब प्रतिभागियों ने दिय कि कहानी में जान डाल दी गई थी। भाव-भंगिमा, शब्दों के उतार-चढ़ाव, हाव-भाव सब कुछ थे। लेकिन हम शिक्षक हैं, कलाकार नहीं, इसलिए हमें यह शैली नहीं आती। इस पर मैंने कहा कि माना कि आप कलाकार या अभिनेता नहीं हैं, लेकिन अभ्यास करने से इस कौशल को सीख सकते हैं। कुछ लोग सहमत हुए तो कुछ ने सहमति में सिर हिला दिया। लेकिन सच यही है कि कलाकार भी अभ्यास के माध्यम से अपनी कला और दक्षता को मांजता है। अगर शिक्षक कहानी कहने की कला को सीखना और मांजना चाहता है तो अभ्यास वह रास्ता है, जिसके जरिए वह कहानी कहने और कहानी शिक्षण में प्रवेश कर सकता है।
सवाल है कि कहानी से अपेक्षा क्या है? बच्चों को कहानी क्यों सुनाई जाए? कहानी सुनाने और कहानी लिखने के प्रति बच्चों को कैसे प्रेरित करें? इस पर हम संवाद के जरिए आगे बढ़ते रहे।

प्राथमिक कक्षाओं में शामिल विभिन्न कहानियों के हवाले से यह समझने की कोशिश की जा रही थी कि एक बाल कहानी में किन मुख्य तत्त्वों को शामिल किया जाना चाहिए। कहानी है तो उसमें कोई पात्र होगा। जैसे ईदगाह में दादी, हामिद, बाजार में दुकानदार हैं आदि। जब पात्र होंगे तो वे कुछ बोलेंगे भी। कहन है तो हर पात्र अपनी प्रकृति के अनुरूप ही बोलेगा, वैसे ही बर्ताव करेगा। इसलिए कहानी में संवाद होना जरूरी है। संवाद को कहने की शैली भी महत्त्वपूर्ण है। किस अंदाज में कहना है, यह कहने वाले पर निर्भर करता है कि कहानी के पात्र के साथ न्याय कर पा रहा है या नहीं। कहानी के पात्र आकाश से नहीं आएंगे, बल्कि इसी समाज और परिवेश से आएंगे। ठीक वैसे ही जैसे हमारे आसपास भिन्न तरह के परिवेशीय पात्र होते हैं। हर पात्र अपने साथ परिवेश लाता है।

कहानी कब की है, कहां की है, कौन-कौन इस कहानी में शामिल है। कहानी के पात्रों के परिवेश के मुताबिक संवाद और संवाद की अदायगी की शैली बदल जाती है। कहानी में पात्र आ गए। पात्रों के साथ संवाद भी आया। संवाद के साथ परिवेश भी कहानी में आ गई। परिवेश के अनुसार भाषा और शब्दों का चुनाव भी आ चुका। अब कहानी को कहने के लिए जिन कौशलों की आवश्यकता पड़ती है, वह है कहने की शैली। इसलिए हमने कहानी की शैलियां बताने के बजाय प्रतिभागियों में कहानी के खंडों को बांट दिया, जिसमें संवाद भी थे। उन कहानियों को पढ़ना और बोलना था। कैसे भाव के साथ बोलें और पढ़ें, इसकी समझ मजबूत करनी थी। इसलिए कहानी का वाचन और पठन कराया गया। इसमें शब्दों की प्रकृति को समझना बहुत जरूरी है। मसलन, ‘दूर कहीं गांव में’। इसमें ‘दूर’ का उच्चारण। ‘झूला लगा था’। ‘झूला’ शब्द में वर्तनी के स्पष्ट उच्चारण पर जोर देना प्रमुख था। यानी जब शिक्षक कहानी का पाठ करे तो उस वक्त शब्दों की ध्वनि का खयाल रखे। साथ ही शब्दों की प्रकृति, यानी कोमल कठोर को उसी भाव-भंगिमा के साथ बोलना जरूरी है। यह अभ्यास से संभव हो पाता है। कहानी को कहने का कौशल उसे और भी दिलचस्प बना देता है।

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