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दुनिया मेरे आगे: कहां गए किस्से

सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी विख्यात कविता ‘झांसी की रानी’ में भी इन हरबोलों का जिक्र किया है- ‘बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी...!’

Author Published on: November 13, 2019 2:36 AM
आज इंसान वैयक्तिकतावाद का शिकार हो रहा है।

हमारा मन आजकल उदास हो गया है। हमारा मतलब हम सबका। हम, जो आज के समय में जी रहे हैं और एक अंधी दौड़ में भागे जा रहे हैं। इस दौड़ में हमारा मन बहुत पीछे छूट गया है। हम इसे झूठे लालच देकर बहलाने की कोशिश करते हैं। मसलन, सप्ताहांत पर पार्टी करना, दोस्तों के साथ कहीं घूमने निकल जाना, तरह-तरह की चीजें खाना-पीना और एक शोर भरे माहौल में डूब जाना। लेकिन हमारा मन इस सबसे शायद कोई आराम नहीं पाता। वह एक अवसाद में डूबता-उतराता रहता है। यही कारण है कि इन दिनों मानसिक बीमारियां बेतहाशा बढ़ती ही जा रही हैं। हमारे देश में ऐसी स्थिति पहले कभी नहीं थी। अगर हम इसके कारणों पर नजर डालें तो पाएंगे कि लोगों के बीच से ऐसी जगहें आज खत्म हो गई हैं, जहां वे एक-दूसरे से सीधे-सीधे संवाद कर पाते थे।

आज इंसान वैयक्तिकतावाद का शिकार हो रहा है। वह धीरे-धीरे इतना ज्यादा ‘आत्मनिर्भर’ हो गया है कि उसे दूसरे मनुष्य की जरूरत ही नहीं पड़ती। घर और बाहर के न जाने कितने काम आजकल घर बैठे इंटरनेट और अलग-अलग ऐप के जरिए हो जाते हैं, जबकि पहले हम घर से बाहर निकलने और न जाने कितने लोगों से मिलने-जुलने और बातचीत करने के लिए मजबूर थे। इस बहाने आते-जाते हम न जाने कितने लोगों के घर चले जाते थे और चाय के स्वाद के साथ सबसे मन भर बातें भी हो जाती थीं।

आज हमें किसी के घर बिना बताए जाने में भी डर-सा लगता है। घर-परिवार भी समय के साथ-साथ सिमटते जा रहे हैं। आंगन और छतें अब शहरी जीवन से गायब हो रही हैं और इनकी जगह बालकनी लेती जा रही है, जहां आदमी अकेला-सा बैठा दिखाई देता है। घरों से बुजुर्ग और करीबी रिश्तेदार गायब होते जा रहे हैं। अब हम अपने पति या पत्नी और बच्चों के साथ ही रहने लगे हैं। रही-सही कसर इंटरनेट और स्मार्टफोन आदि ने पूरी कर दी है। इन सबके कारण एक इंसान दूसरे इंसान के स्पर्श से दूर होता जा रहा है। अब हम बहुत कम लोगों से दिल खोल कर बातें करते हैं, बहुत कम लोगों को देख कर मुस्कुराते हैं, बहुत कम लोगों को गले लगाते हैं, बहुत कम लोगों की मदद करते हैं और बहुत कम लोगों से ही मदद मांग पाने की हिम्मत जुटा पाते हैं।

हमारी पिछली पीढ़ी के बचपन के दिनों में ऐसा नहीं था। वह एक ऐसा दौर था, जो लगभग पूरी तरह से गैजेट्स और इंटरनेट की दुनिया से दूर था। उसके पास मनोरंजन का जो सबसे सीधा तरीका था, वह था सीधे-सीधे एक दूसरे से मिलना-जुलना और बातचीत करना। इंसान इंसान से कहता था और उससे सुनता था। इंसान और इंसान के बीच की यह समानुभूति उसके दुख-दर्द और तकलीफ के अहसास को काफी कम कर देती थी। पहले सबके पास कहने-सुनने के लिए कितनी कहानियां हुआ करती थीं। अपनी कहानियां, आज लोकगाथाओं के रूप में जानी जाने वाली लोक में प्रचलित कहानियां। लोग इन्हें एक-दूसरे के साथ बैठ कर सुनते थे।

कहने-सुनने की यह परंपरा हमारे खून में समाई थी। हमने इन्हें एक कला की तरह विकसित कर लिया था। देश के अलग-अलग हिस्सों में कहानियां अलग-अलग तरह से सुनी-सुनाई जाती थीं। कहीं इन्हें ‘दास्तान-गो’ के नाम से जाना जाता था तो कहीं ‘हरबोलों’ से तो कहीं ‘कावड़ बचना’ के नाम से। इंसान जब इंसान के साथ बैठ कर इंसानों की कहानियां सुनता था तो वह इंसानों से इतना अधिक जुड़ाव महसूस करता था कि एक दूसरे से अपना हर सुख-दुख आसानी से जोड़ पाता था। ‘यूट्यूब’ और ‘फेसबुक’ जैसे माध्यम इसकी जगह ले पाने में नाकाम रहे हैं, अन्यथा ऐसा क्यों होता कि जिन लोगों की फेसबुक मित्रता सूची में हजारों नाम थे, वे भी मानसिक अवसाद की चपेट में आकर मारे गए।

ये अच्छी बात है कि कुछ संवेदनश्ील और समझदार लोग सांस्कृतिक वापसी के बारे में गंभीरता से सोच रहे हैं। पिछले कुछ सालों में दास्तानगोई को फिर से बढ़ावा दिया जा रहा है जो कहानी कहने की एक सुंदर शैली है। सामने बैठ कर किसी के मुंह से कहानी सुनने का जो आनंद है उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ के इलाकों में हरबोले घूम-घूम कर अपनी कथाएं कहा करते थे, जिसे सुनने के लिए गांवों और कस्बों में भारी भीड़ इकट्ठी होती थी।

सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी विख्यात कविता ‘झांसी की रानी’ में भी इन हरबोलों का जिक्र किया है- ‘बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी…!’ राजस्थान में भी कहानी कहने की एक सुंदर शैली है- ‘कावड़ बचना’। इस शैली की विशेषता है कि कहानी सुनाने वाले लकड़ी का एक डिब्बा लेकर चलते थे, जिसमें कई परतों में किस्से कहानियों के चित्र बने होते थे। वे एक-एक चित्र दिखाते हुए कहानी सुनाते थे, जिन्हें पूरा गांव इकट्ठा होकर देखता है। हमारे जनसमाज में इन कहानी कहने वालों कि हमेशा से बड़ी इज्जत होती थी। शायद तब हमारा समाज इंसान और इंसान की कहानियों- दोनों की जरूरत गहराई से समझता था।

घनश्याम कुमार देवांश

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