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दुनिया मेरे आगे: निज भाषा की डोर

अठारहवीं सदी के लगभग अंत में अंग्रेज पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को बंधुआ मजदूर के रूप में काम दिलाने का लालच देकर समुद्री रास्तों से सूरीनाम ले गए थे। काम क्या था, बंजर जमीन को खोद कर खेती लायक बनाना। वे मुख्य रूप से भोजपुरी भाषी लोग थे।

Author March 22, 2018 4:33 AM
सूरीनाम में भारतीय मूल के लोगों ने अपनी भाषा से खुद को जोड़े रखा है।(फोटो सोर्स- इंस्टाग्राम)

मिथिलेश श्रीवास्तव

सूरीनाम की राजधानी पारामाराबु पहुंच कर समझ में आया कि लोग कैसे मजबूरी में अपनी मातृभाषा की अंदरूनी ताकत को समझ पाते हैं और अपनी भाषा से अपना संबंध बनाए रखने में अपनी भलाई समझते हैं। सूरीनाम में भारतीय मूल के लोगों की कोई मजबूरी नहीं है कि वे अपने पूर्वजों की भाषा से जुड़े रहें। लेकिन वे जुड़े हुए हैं। भारतीयों के सूरीनाम जाने का इतिहास संक्षिप्त में जान लेने से भाषा से उनके जुड़ाव की कहानी समझने में आसानी होगी। अठारहवीं सदी के लगभग अंत में अंग्रेज पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को बंधुआ मजदूर के रूप में काम दिलाने का लालच देकर समुद्री रास्तों से सूरीनाम ले गए थे। काम क्या था, बंजर जमीन को खोद कर खेती लायक बनाना। वे मुख्य रूप से भोजपुरी भाषी लोग थे, निरीह, मेहनतकश और दूसरों पर भरोसा करने वाले, जिन्हें यह पता ही नहीं था कि उन्हें ले जाने वाले अंग्रेज उनके साथ धोखा कर रहे हैं। जब पता चला, तब वे लाचार हो चुके थे। अनेक लोग रास्ते में ही भूख और बीमारी से मर गए थे। फिर सूरीनाम की धरती पर कुछ लोगों की मौत हो गई। जो बचे रह गए, उनकी संतानों की पीढ़ियां आज भी सूरीनाम में हैं। वे भाषा के साथ अपनी पूरी लोक संस्कृति लेकर गए थे। अपने दुख-दर्द, अपनों की याद आने और यातनाओं को सहने के बाद की पीड़ा को भुलाने के लिए वे अपनी गायकी का सहारा लेते, उनकी भाषा उन्हें सहारा देती। कहते हैं, सामूहिक गायन में बड़ा बल है। सूरीनाम में भारतीय मूल के लोगों ने अपनी भाषा से खुद को जोड़े रखा है क्योंकि उनकी यह भाषा उन्हें अपने पूर्वजों के संघर्षों को भुलाने नहीं देती, संघर्ष और आफत के समय में लड़ने का साहस देती है। हालांकि यह भी सच है कि उनकी भोजपुरी एक सौ तीस साल पुरानी है, जब वे यहां से गए थे। वही माधुर्य, वही लयात्मकता, वही संगीत। उनकी आज की भोजपुरी उत्तर भारत के शहरों में सुनाई नहीं देगी। शायद हिंदी क्षेत्र के दूरदराज इलाकों में बोली जाती होगी।

2003 में मैं विश्व हिंदी सम्मलेन में कविता-पाठ करने सूरीनाम गया था। भारतीय मूल के सूरीनामवासियों ने एक शाम हमारे सम्मान में भोज का आयोजन किया था। नीचे जमीन पर एक पांत में हम लोगों को खाने के लिए बैठाया गया। एक महिला एक परात में घर में बना एक व्यंजन बांट रही थी। उसने मुझसे कहा- ‘एगो कलौंजी लीं..।’ यानी एक कलौंजी लीजिए। कलौंजी करैले का बना हुआ व्यंजन होता है। आज कलौंजी के स्वाद से ज्यादा वहां बोले गए ‘एगो कलौंजी लीं’ का संगीत कानों में गूंजता है। वहीं एक और रात्रि-भोज आयोजित था। जिस होटल में ठहरा था, वहां से आयोजन वाली जगह जाने और लौटने के लिए टैक्सी मिली थी। मैंने टैक्सी से उतर कर ड्राइवर से अंग्रेजी में पूछा कि खाने के बाद लौटने के लिए मैं तुम्हें कहां खोजूं! उसके जवाब से मैं शर्मिंदा हो गया। भारतीय मूल के सूरीनामी नौजवान ने भोजपुरी में कहा-‘हम एही जा अगोरब।’ यानी हम यहीं इंतजार करेंगे। इसकी लय और संगीत लिखने में नहीं सुनाई पड़ेंगे, लेकिन वह आज भी मेरे कानों में गूंजता है।

मातृभाषा की ताकत उसकी कहानियों, लोरियों, लोकोक्तियों, लोक-मुहावरों और लोक-गीतों में देखी जा सकती है। मातृभाषा हमें दरअसल इंसानियत का पाठ ही नहीं पढ़ाती है, बल्कि आधुनिक संदर्भों में बात करें तो कह सकते हैं कि हमें ‘स्मार्ट’ बनना भी सिखाती है। मातृभाषा में ही हम संबंधों की महक, गमक और ऊष्मा को पहचान सकते हैं। मातृभाषा मां और बच्चे के बीच पुल का काम करती है। बल्कि सारे विविध संबंधों को आपस में गूंथ कर रखती है। मातृभाषा में जो इतने सारे दृश्य, पेड़-पौधे, जीव-जंतु, संबंध-स्वरूप, लोक-देवता मिलते हैं, मुख्यधारा की किसी भाषा में नहीं मिलते हैं। हर चीज का स्वतंत्र अस्तित्व है, अपना नाम है। पर्यायवाची शब्दों का भी अपना अस्तित्व होता है, इसलिए मातृभाषा का शब्दकोश भी विपुल है। लेकिन इनका स्थान दोयम दर्जे का कर दिया जाता है तो शब्दकोश भी सिकुड़ने लगता है, क्योंकि शब्द चलन से बाहर होने लगते हैं। उत्तर भारत की भाषाओं के साथ लगभग ऐसा ही सलूक किया गया है। राजभाषा हिंदी और दूसरी भाषाओं के साथ भी ऐसा हुआ है।

कथित आधुनिकता के चलते हमने हिंदी तो अपनाई, लेकिन अपनी मातृभाषाओं से उसे अलग करके। लोरियों की लयात्मकता को त्यागते गए और बोलियों की मिठास अपनी भाषा में शामिल करने से परहेज करते रहे। बोलियों को अपने व्यवहार में बचाए रखने की कोशिश हमें करते रहना होगा, क्योंकि यही कोशिश महानगरों, नगरों, स्मार्ट शहरों और ग्रामीण इलाकों से हमारा सकारात्मक संबंध बनाए रखने में सहयोग करेगी। यह मातृभाषा ही वह कारक है जो समुद्र पार सालों पहले जा बसे उत्तर भारतीयों से हमारा नाता जोड़ने में मददगार हो रही है। शायद शहरों के अकेलेपन से बचने के लिए हमें यहां भी अपनी मातृभाषा का सहारा लेना पड़ेगा।

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