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दुनिया मेरे आगे: लुप्त होती मासूमियत

पहले अभिभावक बच्चों को स्कूल में भर्ती कराने के बाद बेफिक्र हो जाते थे। स्कूल में शिक्षण के साथ-साथ नैतिक शिक्षा का पाठ भी पढ़ाया जाता था। मुझे याद है कि स्कूल की दीवारों पर बड़े-बड़े महात्माओं और नेताओं के कहे हुए वचन या उपदेश पोस्टर के माध्यम से दर्शनीय होते थे। उन पोस्टरों को लगाने का उद्देश्य नैतिक शिक्षा देना होता था।

Author March 12, 2018 02:33 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतिकात्मक तौर पर किया गया है।

हेमंत कुमार पारीक

काफी पहले एक खबर आई थी कि किशोरवय के एक विदेशी छात्र ने स्कूल में अपने चार-पांच सहपाठियों पर गोली चला दी। उस वक्त ऐसा नहीं लगता था कि ऐसी घटनाएं हमारे देश में भी घट सकती हैं। तब सुन कर आश्चर्य हुआ था। ऐसी घटना की वजह बताई गई थी कि वहां हर किसी को हथियार रखने की छूट है, इसलिए ऐसा हुआ होगा। वह घटना पुरानी है, इसलिए भूल चुका था। लेकिन कुछ समय पहले हमारे देश के एक हिस्से में स्कूल के प्रिंसिपल पर एक किशोरवय के लड़के ने गोली दागी तो वह घटना याद आ गई। आजकल स्कूलों में ऐसी घटनाएं एक के बाद एक सामने आने लगी हैं। एक मासूम स्कूली छात्र की एक अन्य छात्र द्वारा चाकू से हत्या! एक किशोर ने अपनी मां-बहन की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी कि उसे पढ़ाई के लिए टोका जाता था। फिर किसी छात्र ने पहली कक्षा में पढ़ रहे छात्र की हत्या की कोशिश सिर्फ इसलिए की कि स्कूल में अवकाश हो जाए और परीक्षाएं स्थगित हो जाएं। ऐसा लगता है कि किशोर उम्र के बच्चों के मानस समय के पहले ‘वयस्क’ हो रहे हैं। उनकी सोच में चाकू और तमंचे आने लगे हैं। लगता है उन्हें हिंसक बनाने वाला कोई और नहीं है, बल्कि यह परिवेश है, जिसमें वे जी रहे हैं। आए दिन प्रभावित करने वाली वे घटनाएं हैं, जिनमें हत्या, लूटपाट और बलात्कार शामिल हैं।

दरअसल, बच्चे कच्ची मिट्टी के उस लोंदे समान होते हैं जिन्हें किसी भी शक्ल में गढ़ा जा सकता है। यह निर्भर होता है उस चाक पर और चाक चलाने वाले के हाथों पर। स्कूलों में नैतिक शिक्षा भी दी जाती रही है। लेकिन अब वे शिक्षक भी बच्चों के पालकों से घबराने लगे हैं। पहले अभिभावक बच्चों को स्कूल में भर्ती कराने के बाद बेफिक्र हो जाते थे। स्कूल में शिक्षण के साथ-साथ नैतिक शिक्षा का पाठ भी पढ़ाया जाता था। मुझे याद है कि स्कूल की दीवारों पर बड़े-बड़े महात्माओं और नेताओं के कहे हुए वचन या उपदेश पोस्टर के माध्यम से दर्शनीय होते थे। उन पोस्टरों को लगाने का उद्देश्य नैतिक शिक्षा देना होता था। कई सालों से मैं आकाशवाणी जाता हूं। अंदर घुसते ही सामने एक बोर्ड दिखता है, जिस पर प्रतिदिन कोई न कोई शिक्षात्मक वाक्य लिखा होता है। शीर्षक होता है- ‘आज का विचार!’ इस संदर्भ में एक घटना मुझे आज भी याद है कि किस तरह एक शिक्षक ने एक छात्र के जीवन का रुख बदल दिया था। वह छात्र कभी जान से मारने की धमकी देता तो कभी मारपीट पर उतर आता था। मौका देख कर कभी किसी के बैग से किताबें, पेन और पेंसिल पर हाथ साफ करता तो कभी किसी का टिफिन बॉक्स ले उड़ता। शिकायतें पहुंचतीं, पर गवाह और साक्ष्य के अभाव में उसे कोई पकड़ नहीं पाता था। उसी दरम्यान स्कूल में बाहर से कोई हस्तशिल्पी आया था बच्चों को शिल्प सिखाने। उसके पास विभिन्न प्रकार के सांचे थे। साचों में मोम डाल कर वह कला का प्रदर्शन करने लगा। बहुत-से खिलौने बनाए। सभी बच्चे मनोयोग से देखते रहे और ऐसा रचनात्मक काम करने की सोच में पड़े दिखे।

खिलौने तैयार करने के बाद वह सारे खिलौने स्कूल को भेंट में देकर चला गया। हम सभी के बीच वह उद्दंड लड़का भी था। वे खिलौने उसे भी अच्छे लग रहे थे। उसने अपने एक साथी से कहा- ‘अरे इन्हें बनाने की क्या जरूरत? हम तो इन्हें यों ही हासिल कर लेंगे। अच्छा बता तुझे क्या चाहिए?’ उसके साथी ने एक मोम की पुतली की तरफ इशारा किया। वह बोला- ‘ठीक है, भोजनावकाश के बाद मिलना।’ मध्यांतर में सभी शिक्षक और विद्यार्थी भोजन करने चले जाते थे। इसी समय प्रधानाध्यापक का कमरा भी खाली रहता था। उसी कमरे में वे सारे खिलौने रखे गए थे। मौका ताड़ वह उनके कमरे में घुसा और उसने एक खिलौना उठा लिया। बाहर निकला और शिक्षक के हाथों पकड़ा गया। शिक्षक ने उसे डांटा और सारी कक्षाओं में घुमाया। वजह साफ थी कि और भी विद्यार्थी सबक लें कि चोरी करने से लज्जित होना पड़ता है। लेकिन इसके साथ ही शिक्षक ने उस छात्र से अलग से बहुत प्यार से बात की और उसे समझाया भी। आज वही बालक सहृदय स्वच्छ छवि वाला प्रशासनिक अधिकारी माना जाता है। कहने का आशय यह है कि स्कूल न सिर्फ पढ़ाई-लिखाई के लिए होता है, बल्कि वहां नैतिक शिक्षा भी दी जाती है। गुरु माता-पिता के समान होता है। बच्चों को सही राह पर चलने की शिक्षा भी देता है। आज जो हिंसक वातावरण स्कूलों में दिखाई दे रहा है, शायद बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क को समझने वाले एक आदर्श शिक्षक की अनुपस्थिति को भी रेखांकित करता है। कारण यह भी है कि हमने शिक्षक को एक मशीन समझ लिया है, जबकि बच्चों के व्यक्तित्व और चरित्र निर्माण में उसकी अहम भूमिका होती है।

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