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दुनिया मेरे आगे: दरकते रिश्ते

कभी रिश्ते हमारी पहचान हुआ करते थे, आज कई बार एक बोझ की तरह लगने लगते हैं। हर कोई अपनी धुन में मस्त अपने से ही मतलब रखे हुए है। यही वजह है कि आपसी रिश्तों में मिठास अब नाममात्र की रह गई है। अजीब-सा लगता है, अखबारों में अपनी ही बेटी-बहू के साथ बलात्कार की खबरों को पढ़कर।

Author March 7, 2018 3:49 AM
सांकेतिक फोटो

अंशुमाली रस्तोगी

पिछले कुछ समय से कई सवाल दिमाग में घूम रहे हैं। क्या समाज खुद से हार चुका है? क्या समाज के सुधरने की उम्मीद खत्म हो चुकी है? ऐसे सवालों के जवाब या तो हमारे पास होते नहीं या फिर हम खुद को इनसे बचाने की कोशिश में लगे रहते हैं। लेकिन कब तक? कभी न कभी तो हमें इनसे रूबरू होना ही पड़ेगा। जिन बेतरतीब रास्तों पर आज का समाज चल पड़ा है, उसमें अस्थिरता के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं देता। हर रोज खबरों में किसी न किसी रिश्ते के टूटने का जिक्र रहता है। रिश्ते ऐसे ही नहीं, बल्कि बहुत बुरी तरह से टूट कर बिखर रहे हैं। कभी रिश्ते हमारी पहचान हुआ करते थे, आज कई बार एक बोझ की तरह लगने लगते हैं। हर कोई अपनी धुन में मस्त अपने से ही मतलब रखे हुए है। यही वजह है कि आपसी रिश्तों में मिठास अब नाममात्र की रह गई है। अजीब-सा लगता है, अखबारों में अपनी ही बेटी-बहू के साथ बलात्कार की खबरों को पढ़कर। रुपए-पैसे-जमीन के लिए अपने ही भाई-बंधु का कत्ल कर देना। प्रेम-प्रसंगों पर होने वाली घटनाओं की तो जाने ही दीजिए। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता है जब किसी प्रेमी-युगल की आत्महत्या या झूठी इज्जत के नाम पर हत्या की खबरें अखबारों में न आती हों।

समझा जा सकता है कि जिस समाज में प्रेम करना ही गुनाह बना दिया गया हो, उसमें रिश्तों की डोर को बांधे या साधे रखना कितना कठिन है। पिछले दिनों एक पिता ने अपनी चार बेटियों को चलती ट्रेन से फेंक दिया। यह घटना ऐसे ही दरकते रिश्तों की बानगी थी। कैसे कोई बाप इतना क्रूर हो सकता है कि अपनी ही बेटियों को फेंक दे और कैसे कोई बच्चा अपनी मां के प्रति इतना लापरवाह हो सकता है कि जब उनकी लाश उनके फ्लैट से निकाली जाए तो पता ये लगे कि उन्हें मरे हुए तो महीनों बीत चुके हैं। इतना ही नहीं, हाल ही मेरे शहर में एक बेटी को आत्महत्या इसलिए करनी पड़ी कि उसका पिता उसे खाने को कुछ नहीं देता था। ऐसी तमाम घटनाएं आम खबरों में होती हैं। कभी-कभी तो जान कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बड़ा सवाल यह है कि इन सबके लिए किसे दोषी ठहराएं, किसे जाने दें! हमारा सामाजिक ताना-बाना इतनी बुरी तरह से क्षत-विक्षत हो चुका है कि किसी से कुछ कहते या पूछते हुए भी डर-सा लगता है कि कहीं वह बुरा न मान जाए। सहनशीलता का निरंतर छीजते जाना भी बड़ी वजह है। जबकि पढ़ा और सुना यही गया है कि पढ़ा-लिखा प्रगतिशील समाज अधिक जागरूक होता है आपसी रिश्तों की महत्ता को समझ और निभा पाने में। मगर सच यह है कि जो जितना प्रगतिशील ऊपर से दिख-जान पड़ता है, वह उतना ही अंदर से खोखला होता है। अपवादों को छोड़ दें तो हमारे समाज की एक बड़ी हकीकत यही है।

दरअसल, आधुनिकता से हमने कुछ नहीं सीखा। सिर्फ उसका लबादा भर ओढ़ रखा है। आधुनिक समाज इतना दकियानूसी नहीं हो सकता जो अपने ही रिश्तों का बलात्कार करने को उतावला हो बैठे! वह इतना भी बंद-दिमाग नहीं होता कि वाट्सऐप कर अपनी बीवी को छोड़ दे। अपने मां-बाप से इतना दूर चला जाए कि जब लौटे तो उनकी लाश घर के किसी कोने में दबी-पड़ी मिले। ये कृत्रिम सामाजिक आधुनिकता शहरों को विकसित तो कर रही है पर हमें अपने ही रिश्तों से काट भी रही है। शायद इस अहसास को हम समझ कर भी समझने की कोशिश नहीं करना चाहते। कभी-कभी इस बात पर यकीन कर लेने का मन करता है कि समाज की मानसिकता को समझ पाना बेहद कठिन है। पलभर में समाज किस करवट अलट-पलट जाएगा, कोई नहीं जानता। ये जितना संवेदनहीन है, उतना ही संवेदनशील भी। जितना अव्यावहारिक है, उतना ही व्यावहारिक भी। यों समाजशास्त्री समाज को लेकर चाहे जितनी भी परिभाषाएं क्यों न गढ़ लें, पर इसकी चाल है निराली। समाज और हमारे बीच लगातार टूटते रिश्ते शायद ही किसी की चिंता का सबब बनते हों। ‘सब चलता है’ की धुन में सब कुछ को बिसरा देने पर उतारू हैं सभी। सोचिए कि जब रिश्ते ही नहीं ठहर पाएंगे हमारे बीच तो अपना कहने को यहां रह क्या जाएगा! इतना औपचारिक होना भी ठीक नहीं कि खुद से बिछड़ने का गम न रहे। यह दुनिया तेजी से भाग रही है, लेकिन अपने पीछे कितना कुछ छोड़ती भी जा रही है, इसका अहसास नहीं किसी को। वक्त की कमी के बहाने ने हर रिश्ते को खुद से दूर कर दिया है। जो पास है भी उसकी कोई कद्र नहीं। कुछ और कहा नहीं जा सकता, मगर आने वाली पीढ़ी को हम विरासत में टूटे रिश्तों के खिलौने सौंप कर जाएंगे उनका मन बहलाने के लिए! तब तक सामाजिक रिश्ते जाने कैसी शक्ल अख्तियार कर चुके होंगे!

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