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दुनिया मेरे आगेः पता ही नहीं चला

हम बचपन से ही कई शब्दों का उच्चारण गलत कर रहे होते हैं। स्कूल में अध्यापक भी कहां गौर करते हैं। यह सोच कर कि विद्यार्थी के माता-पिता बुरा न मान जाएं, उन्हें टोकते भी नहीं। गलत उच्चारित किए जा रहे शब्द कब जीवन का हिस्सा हो जाते हैं, पता नहीं चलता और जब पता चलता है तो सही होने की अवस्था निकल चुकी होती है।

पिछले कई महीने से देश महामारी से जूझ रहा है, लेकिन फिर भी बहुत से लोगों को अभी तक पता नहीं चला कि क्या करना है।

संतोष उत्सुक

बातचीत के दौरान हमें अक्सर सुनने को मिलता है कि यह हो गया, वह हो गया, लेकिन हमें पता ही नहीं चला। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हम अपनी छोटी-छोटी लापरवाहियों को धीरे-धीरे बहुत गहरे पनपने देते हैं। हम जिस माहौल में पैदा होते, परवरिश पाते हैं, उसके अनुरूप विकसित हुई जीवनशैली का भी इसमें बड़ा हाथ होता है। पिछले कई महीने से देश महामारी से जूझ रहा है, लेकिन फिर भी बहुत से लोगों को अभी तक पता नहीं चला कि क्या करना है और क्या नहीं। पिछले दिनों घर पर थालियां बजाने के साथ-साथ सड़कों और गलियों में आ जाने और फिर दीप जलाने के साथ पटाखे फोड़ने की क्रियाएं स्पष्ट बताती हैं कि क्या कर रहे हैं, हमें पता नहीं चलता। सड़क पर गाड़ी चलाते हुए कई बार जरा-सी लापरवाही के कारण बहुत बड़ी दुर्घटना हो जाती है। हम कह रहे होते हैं कि पता नहीं चला। जब आराम से बैठ कर सोचते हैं, तो पता चलता है कि गलती कहां हुई। हमारे देश में ज्यादातर लोग गाड़ी चलाना ड्राइविंग संस्थानों में नहीं सीखते, बल्कि घर के दुपहिया या चौपहिया पर ही अभ्यास करते हैं। यहां सिखाने वाले को खुद सही यातायात नियमों का पता नहीं होता, इसलिए सीखने वाले को भी पता नहीं चलता कि कब उसने गलत तरीके से गाड़ी चलाना सीख लिया। प्रमाण मिलता है जब जीटी रोड पर ज्यादातर चालक गलत तरफ से टेकओवर कर रहे होते हैं।

हम बचपन से ही कई शब्दों का उच्चारण गलत कर रहे होते हैं। स्कूल में अध्यापक भी कहां गौर करते हैं। यह सोच कर कि विद्यार्थी के माता-पिता बुरा न मान जाएं, उन्हें टोकते भी नहीं। गलत उच्चारित किए जा रहे शब्द कब जीवन का हिस्सा हो जाते हैं, पता नहीं चलता और जब पता चलता है तो सही होने की अवस्था निकल चुकी होती है। बात पुरानी है, उन दिनों मोबाइल फोन नहीं होते थे। मेरे एक दोस्त की बेटी जब उच्च शिक्षा के लिए बड़े शहर गई, तो उन्होंने उसकी अंग्रेजी को सही करने के लिए एक अनूठा तरीका अपनाया। उन्होंने बेटी से कहा कि वह उन्हें नियमित अंतराल पर पत्र लिखा करे। बेटी उन्हें हर पंद्रह दिन पर एक पत्र लिखती थी और मेरे मित्र उसकी सभी गलतियां ठीक कर वह पत्र लौटाते थे। बेटी को अपनी गलतियां पता चलती थीं और वह कोशिश करती थी कि दुबारा न हों। मुझे याद है, जब मैं बीए के अंतिम वर्ष में था तो हमारे अंग्रेजी के अध्यापक लिखवाते समय ‘इज’ के हिज्जे भी बताते थे। समझाया करते थे, ‘आई एस’ लिखना बेटा, क्योंकि उन्हें पता था कि कुछ विद्यार्थी ‘इज’ के हिज्जे ‘ई एस’ लिखते थे। विद्यार्थी बरसों ट्यूशन पढ़ते हैं, लेकिन उन्हें अनेक विषयों के कितनी ही अवधारणाओं का पता नहीं चलता, क्योंकि पढ़ाने वालों को ही पता नहीं होता, इसलिए संजीदगी से सिखा भी नहीं पाते। व्यावसायिक अनुशासन की कमी लापरवाही में तब्दील हो जाती है और नुकसान जिंदगी को उठाना पड़ता है। बाजारी भागदौड़ में कब शिक्षा का ढांचा दिन पर दिन चरमराता गया, क्या सचमुच किसी को भी पता चला!

दुविधा मोबाइल को लेकर भी है, घर के सभी सदस्यों के पास अलग-अलग फोन हैं, उन्हें आपस में भी बात करने की फुर्सत नहीं है। छोटे-छोटे बच्चों को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल सबसे बढ़िया खिलौना माना जाता है। बहुत तेजी से जब बच्चे मोबाइल चलाना सीख जाते हैं, खेलते नहीं, खाना नहीं खाते, जागते रहते हैं, तो अभिभावक कहते सुने जाते हैं- पता ही नहीं चला हमारे चिंटू ने कब मोबाइल चलाना सीख लिया। लेकिन असल में यह सब हमारी ही लापरवाही होती है, जिसको हम पता न चलने का नाम देते हैं। दरअसल, हमें पता नहीं चलता कि कब हमने उसे सिखा दिया।

भोजन का मामला भी ऐसा है। हम बचपन से पढ़ते हैं कि व्यायाम करना चाहिए, ताकि मोटापा न आए, लेकिन खानपान में लापरवाही के कारण पता नहीं चलता कब हमारा शरीर मोटापे के कारण आपे से बाहर हो गया। कम उम्र में शरीर मोटा होकर बीमारियों का घर हो गया, कब मधुमेह और रक्तचाप बढ़ गया। पता तब चलता है जब डॉक्टर हमें खबरदार करता है। जिस मोटापे का हमें आते हुए पता नहीं चलता, उसका जाना मुश्किल हो जाता है और बहुत मेहनत, व्यायाम और पैसा खर्च करने के बाद चला जाए तो अच्छा-खासा पता चलता है। हमें पता चलते रहना जरूरी है कि क्या हो रहा है, जो हो रहा है उसके क्या दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। कहीं पता न चलने का गलत असर हम या हमारे परिवार और बच्चों के जीवन पर तो नहीं पड़ रहा। अगर पता लगना शुरू हो जाए तो हमारा जीवन, जो सृष्टि रचयिता ने केवल एक बार दिया है, काफी बेहतर हो सकता है। स्वानुशासन इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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