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दुनिया मेरे आगे: बोझ बढ़ाती आबादी

किसी देश की आबादी अगर वहां की ताकत है तो उस आबादी का सदुपयोग न होना उस देश की बर्बादी भी होती है। आजादी के समय भारत की आबादी लगभग पैंतीस करोड़ थी।

Author Updated: August 28, 2019 5:20 AM
संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट बताती है कि 2010 से लेकर 2019 के बीच भारत की आबादी 1.2 फीसद की सालाना दर से बढ़ी है। जबकि इस दौरान चीन की जनसंख्या वृद्धि दर 0.5 फीसद ही रही।

संगीता कुमारी

हम जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को बढ़ा तो नहीं सकते लेकिन रोजाना उनका उपयोग करके घटा अवश्य सकते हैं। यही हम कर भी रहे हैं। अपनी आबादी बढ़ाते-बढ़ाते हम कब जंगलों को शहर बना बैठे, हमें खबर ही नहीं। जंगली जानवरों का इंसानी आबादी में आकर तहलका मचा देना अब आम बात हो गई है। उनके घरों में हम घुस गए हैं तो वे अपनी पुश्तैनी जमीन देखने कभी-कभार आ ही जाते हैं। जानवरों की संख्या की बात की जाए तो उनकी आबादी उतनी नहीं बढ़ रही है जितनी घरेलू जानवरों में कुत्तों की आबादी बढ़ रही है।

घरों से निकली नित की दो रोटी और बचा हुआ भोजन भी उनके लिए अब कम लग रहा है। अक्सर अपनी रसोई की खिड़की से देखती हंू कि पक्षियों के लिए डाला गया खाना दीवार पर चढ़ कर कुत्ते खा जाते हैं। तब मैं देख कर भी अनजान बन कर कुत्तों के लिए और खाना डाल आती हूं। कुत्तों की बढ़ती आबादी के कारण उनका आपस में संघर्ष देख कर उन पर तरस भी आता है। दूसरी तरफ उनके भय से मेरा बाहर न निकलने का मर्म भी मुझे सताता है। फिर मैं ममतामयी बन पक्षियों के लिए दुबारा खाना डालने जाती हूं और थोड़ी देर पक्षियों के आने तक ठहर जाती हूं। उस समय मेरे भीतर एक जज बैठा दिखता है जो पक्षियों व कुत्तों के साथ न्याय करने का प्रयास कर रहा होता है। यह सिलसिला लगभग हर दिन का है।

कभी-कभी मेरे भीतर सामाजिक चिंतन भी समा जाता है। सोचने लगती हूं कि देश कहां से कहां विकास कर गया और हम इन पक्षियों, जानवरों और भूख से मरते गरीबों की सोच में डूबे रहते हैं। ऐसा तो नहीं है कि सरकार गरीबी उन्मूलन के लिए करोड़ों-अरबों खर्च करती नहीं! मगर वह सब शायद सही तरीके से गरीबों की सुविधाओं के लिए पहुंचता नहीं होगा! आबादी का बढ़ना भी बहुत बड़ी बाधा है। अब जब मैं स्वयं जानवरों की बढ़ती आबादी से हैरान हूं तो देश की बढ़ती आबादी से सरकार भी परेशान तो रहती होगी!

कितनी सरलता से हम हर साल अपनी जनसंख्या में करोड़ों का आंकड़ा जोड़ते जा रहे हैं। मगर हमें यह भी सोचना चाहिए कि उस बढ़ती आबादी के लिए सुविधाएं कितनी उपलब्ध करा रहे हैं। नए शिशुओं के स्वागत की तैयारी में कहीं हम कोई कमी तो नहीं कर रहे हैं! देश के भविष्य को बेहतर बनाना है तो सरकार को आने वाली नई पीढ़ी के लिए पहले पौष्टिक भोजन, शुद्ध जल, सस्ती और असली दवाओं और जीवनदायी अस्पतालों जैसी बुनियादी जरूरतों के बारे में सोचना होगा।

धरती का विस्तार किया नहीं जा सकता है। समुद्र को बढ़ने से रोका नहीं जा सकता है। जितनी भूमि है उतने में ही हमें रहना भी है। अनाज उगा कर सबका पेट भरना है। लौकिक सुख-सुविधाओं के लिए प्रकृति का संतुलित दोहन भी करना है। आज से चालीस-पचास साल पहले हमारे पूर्वजों ने सोचा भी नहीं होगा कि जल जैसी प्राकृतिक सुविधा को हम कभी खरीदकर पीएंगे! वह भी हमारे भारत जैसे देश में जहां स्वच्छ जल गंगा हिमालय से स्वयं हमें जीवन देने के लिए अवतरित होती है।

इस प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए पेड़-पौधे, पक्षी, जानवर, जीव-जंतु, कीट-पतंगे आदि सभी की आवश्यकता है। इसलिए सभी का संतुलन बना रहे, यह भी ध्यान रखना होगा। कुत्ते सामाजिक जानवर हैं, इसलिए उनकी भी आबादी मनुष्यों के साथ-साथ बढ़ती जा रही है। हम अपनी सुविधाओं व जीवन जीने के लिए जंगल में प्रवेश करते जा रहे हैं। मनुष्यता के नाम पर जंगली बन जंगली जीवों की दुनिया को खतरे में डाल रहे हैं। अभी भी समय है कि सचेत होकर अपनी मनुष्यता को बचाते हुए हमें स्वयं को जानवर बनने से रोक लेना चाहिए। बढ़ती आबादी के लिए या तो पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं या फिर इन पर नियंत्रण के उपाय हों।

किसी देश की आबादी अगर वहां की ताकत है तो उस आबादी का सदुपयोग न होना उस देश की बर्बादी भी होती है। आजादी के समय भारत की आबादी लगभग पैंतीस करोड़ थी। अब बहत्तर वर्षों में बढ़ कर लगभग एक सौ पैंतीस करोड़ हो गई है। जनसंख्या वृद्धि किसी भी देश की ताकत तब मानी जाती है जब उसका संसाधन के रूप में देश के विकास में उपयोग हो। लेकिन मनुष्य उचित मानव संसाधन तो नहीं बन रहा है, मगर अपनी जीविका के लिए प्रकृति के संसाधनों का भरपूर दोहन अवश्य कर रहा है। अब तो हमें सचेत हो जाना चाहिए और जनसंख्या को नियंत्रित करते हुए प्रकृति के अनावश्यक दोहन से बचना चाहिए।

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