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दूनिया मेरे आगे: प्रेम की राह में

सोशल मीडिया और इंटरनेट ने जहां संवाद की गति को तीव्र किया है, वहीं चेहरे छिपाने की भी सुविधा दे दी है। इन माध्यमों का सहारा लेकर एक चेहरे के पर्दे में कई चेहरे छिपाए कुछ पुरुष आसानी से भोली-भाली लड़कियों तक पहुंच जाते हैं, प्रेम और शादी का झूठा वादा करते हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर। (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

प्रेम के संदेश पहले चिट्ठी-पत्री तक सीमित थे। फिर टेलीफोन आया। मगर मोबाइल और इंटरनेट के साथ सोशल मीडिया मानी जाने वाली वेबसाइटों के विस्तार ने इस जाल को बहुत बड़ा कर दिया। एक समय संवाद का जरिया और भरोसे का आधार रही चिट्ठियां आज अपने असर में कमजोर होती दिखती हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट ने जहां संवाद की गति को तीव्र किया है, वहीं चेहरे छिपाने की भी सुविधा दे दी है। इन माध्यमों का सहारा लेकर एक चेहरे के पर्दे में कई चेहरे छिपाए कुछ पुरुष आसानी से भोली-भाली लड़कियों तक पहुंच जाते हैं, प्रेम और शादी का झूठा वादा करते हैं। दूसरी ओर, भावनाओं में बह कर लड़की उस लड़के से मिलना शुरू कर देती है। फिर जैसे ही लड़के को लड़की से मतलब निकल जाता है, तब वह छोड़ कर चल देता है। उसके बाद लड़कियों के पास खुद को छले जाने के दुख के सिवा कुछ नहीं बचता। कई बार उनके भीतर इतनी भी हिम्मत नहीं बच पाती कि अपने हालात से लड़ सकें। हो सकता है कि सभी लड़के ऐसे ही नहीं होते हों, लेकिन आजकल प्रेम के नाम पर धोखाधड़ी के जितने मामले सामने आ रहे हैं, उसमें ज्यादा मुश्किल लड़कियों को झेलनी होती है। इसलिए इस मसले पर सोचने की जरूरत है कि प्रेम किया जाए, लेकिन इसके जाल में खुद को तबाह होने से भी बचाया जाए।

दरअसल, ज्यादातर युवा लड़कियां विवाह संस्था में भरोसा करती हैं और मां-पिता को नाराज भी नहीं करना चाहतीं। इसलिए आमतौर पर बिना शादी किए या शादी के भरोसे के बिना प्रेमी के साथ निजी संबंध बनाने को तैयार नहीं होतीं। लेकिन लड़के के विश्वास में आकर कई बार लड़की उससे हर स्तर पर जुड़ती है, जिसे सहमति से बनाए गए संबंध के रूप में देखा जाता है। मगर भावुक क्षणों में बनाए गए संबंध जब धोखे में तब्दील हो जाते हैं तो उस वक्त के लिए उसके पास कानूनी लड़ाई में मददगार तथ्य भी बहुत कमजोर हो जाते हैं। पिछले कुछ महीनों के दौरान मुझसे कई महिलाओं ने संपर्क किया। उन्होंने बताया कि किसी लड़के ने उन्हें प्रेम और विवाह के भरोसे के साथ उनसे शारीरिक संबंध बनाए और फिर मतलब निकलते ही उन्हें उनके हाल पर छोड़ कर निकल गए। मैं उनकी तकलीफ के बरक्स व्यवस्था का संजाल समझ सकती थी। लेकिन मैं बहुत कुछ करने की हालत में नहीं थी। ऐसे में उनकी लाचारी समझी जा सकती है। लेकिन लड़के को इस बात की कोई फिक्र शायद इसलिए भी नहीं होती है कि न केवल समाज उसके साथ होता है, बल्कि समूची व्यवस्था और तंत्र एक तरह से पुरुषों के हक में ही काम करते हैं।

अविवाहित लड़कियों के लिए इस तकलीफ से उबरना बहुत मुश्किल होता है। वे अत्यधिक तनाव में चली जाती हैं और कई बार आत्महत्या तक की कोशिश करती हैं। इन परिस्थितियों में कोई अच्छा सहयोगी मिल जाए, तभी उनके लिए आगे बढ़ना आसान हो पाता है। हालांकि अगर वह धोखेबाजी और त्रासद स्थिति में पहुंचाने वाले लड़के के खिलाफ कार्रवाई करना भी चाहती है, तो कानूनी प्रक्रिया की जटिलता और खर्च उसके कदम रोक देते हैं। फिर सबसे बड़ी बाधा सामाजिक रूप से उसकी ओर उठी अंगुली होती है जो अपराधी के बजाय उलटे उसी को कठघरे में खड़ा कर देती है। इन हालात को तकलीफ के साथ सहती कुछ लड़कियों ने साफतौर पर मुझे कहा कि अगर कानून में लड़कियों के नाम को सार्वजनिक न करने व्यवस्था हो और हर बार अदालतों में उनकी उपस्थिति अनिवार्य न हो तो वे धोखेबाज लड़कों के अपराध को अदालतों में साबित कर सकती हैं। लेकिन इस मसले पर कानून, आदर्श की हकीकत व्यवहार में क्या है और महिलाओं के लिए कितनी बाधक या सहयोगी साबित होती है, यह सभी जानते हैं। आमतौर पर इस तरह की मुश्किल में पड़ी महिलाओं के नजदीकी भी अपने पांव पीछे खींच लेते हैं।

कहने का आशय यह है कि आज समाज का स्वरूप जिस तरह तेजी से बदल रहा है, परंपरा और आधुनिकता के विरोधाभास जिस शक्ल में उभर कर सामने आ रहे हैं, उसमें लड़कियों को कोई भी कदम बढ़ाने से पहले हर पहलू पर विचार करने की जरूरत है। हर चमकती हुई चीज जरूरी नहीं कि अच्छी ही हो। अगर किसी को पश्चिमी सभ्यता की आधुनिकता पसंद है तो उसमें इतनी हिम्मत भी होनी चाहिए कि या तो अपने संबंधों में किसी तरह की बाधा स्वीकार नहीं करे या फिर अपने खिलाफ अपराध होने पर कानूनी लड़ाई के हर मोर्चे पर लड़ने की हिम्मत करे। प्रेम की राह बुरी नहीं है, लेकिन उस पर ज्यादा तेज गति से चलने से बचना चाहिए, ताकि संतुलन न बिगड़े और गिर कर चोट पहुंचाने से खुद को बचाया जा सके।

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