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दुनिया मेरे आगे: सुनहरे पिंजरे में कैद

मुंबई में मेरे सामने दो विरोधाभासी चित्र सुबह-सुबह खिंच जाते हैं। देखता हूं आकाश में मंडराते नीले कबूतरों को।

Author Published on: November 20, 2019 3:00 AM
उधर अप्सराओं के नृत्य से होड़ लेते इस खूबसूरत नजारे से बेखबर युवा सुबह-सुबह बैकपैक में लैपटॉप और टिफिन बांध कर निकल पड़ते हैं। (सांकेतिक तस्वीर)

वर्षों से इसी भ्रम में था कि रामझरोखे बैठ कर जग का मुजरा लेना बहुत सुख कर लगेगा। लगता था जग का मुजरा लेने के लिए फुर्सत ही फुर्सत हो, नून-तेल-लकड़ी की चिंता से मुक्त होकर इतनी ऊंचाई पर बैठना संभव हो, जहां से आकाश में उड़ते पंछी भी अपने से नीचे दिखें और उनके साथ उन्मुक्त उड़ान भरने के लिए मन स्वतंत्र हो तो क्या कहना! फिर तो उस बालगीत में कल्पित अभिलाषा पूरी हो जाएगी जो कहती है- ‘चिड़िया मुझे बना दे राम, छोटे पंख लगा दे राम, बागों में मैं जाऊंगा, मीठे फल मैं खाऊंगा, बस इतना-सा कर दे काम!’

लेकिन यथार्थ कल्पना से कितना भिन्न निकला! दो-चार मंजिले मकानों से घिरे हुए नोएडा के अपने घोंसले से निकल कर परिस्थितिवश मुंबई की एक गगनचुंबी अट्टालिका के बहुत ऊंचे माले पर बने एक फ्लैट में कैद हो जाना पड़ा। यहां कुछ समय के लिए बाहर निकलने पर कोई प्रतिबंध नहीं, लेकिन बाहर घूमने पर अंकुश लगाए रही मुंबई की बरसात, जो अक्तूबर में भी जाते-जाते बार-बार लौटती रही। अपने फ्लैट के ऊंचे झरोखे पर बैठे-बैठे सामने दुनिया को गुजरते देख कर उस शायर की याद आती रही जो दुनिया में हर चीज को आनी-जानी पाकर कह बैठा था ‘जो आके न जाए वो बुढ़ापा देखा; जो जाके न आए वो जवानी देखी।’ मुंबई में सुनहरे पिंजरे में कैद युवावस्था को मुरझाते देखा तो लगा शायद मुझे ही अब तक अन्य शहरों में इतनी फुर्सत से युवाओं के जीवन में झांकने का अवसर नहीं मिला था। शायद सभी महानगरों में जवानी इसी तरह से लगातार भागते-भागते एक दिन अचानक खुद को वापस न जाने वाले बुढ़ापे के शिकंजे में जकड़ा पाकर पछताती होगी कि रसभरी फुहार में भीग कर तृप्त होने के लिए रोज की आपाधापी से फुर्सत के दो चार क्षण क्यों नहीं छीन सकी।

मुंबई में मेरे सामने दो विरोधाभासी चित्र सुबह-सुबह खिंच जाते हैं। देखता हूं आकाश में मंडराते नीले कबूतरों को। चारे की तलाश में यहां से वहां मंडराने वाली कामकाजी उड़ानों के बीच भी वे छज्जों मुंडेरों पर बैठ कर मस्ती से गुटर-गूं गाने के लिए समय निकाल लेते हैं। बालकनियों और झरोखों में उनके अनाधिकार प्रवेश रोकने के लिए बुने गए लोहे के पतले जाल उनकी राह रोकते हैं तो वे छतों पर उतर पड़ते हैं। राख और नील के मिश्रित रंग वाले पंख फुला कर, गर्दन पर बनी गहरे हरे रंग की पट्टी चमकाते हुए, रक्ताभ आंखों से वे अपनी प्रेयसी को देखते हैं। फिर गुटर-गूं की धुन पर उनके नन्हें फिरोजी पंजे थिरकने लगते हैं।

उधर अप्सराओं के नृत्य से होड़ लेते इस खूबसूरत नजारे से बेखबर युवा सुबह-सुबह बैकपैक में लैपटॉप और टिफिन बांध कर निकल पड़ते हैं। सबसे पहले वे, जो छोटे पद और वेतन की मार से दूरस्थ कल्याण और पुणे तक में कम किराए के घरों में रहने को मजबूर हैं। मुंबई के दफ्तरों तक आने-जाने के लिए सुबह-शाम लोकल ट्रेन में दो-तीन घंटे बिताना जिनकी नियति है। उनसे अगली पायदान पर बैठे एमबीए जैसी डिग्रियों से लैस युवा निकटवर्ती सम्भ्रांत उपनगरों में रहने का लाभ उठा कर थोड़ी और देर से अपने घोंसलों से निकलते हैं। देर तक रुकने पर ओवरटाइम नहीं मिलने और सुबह समय से दफ्तर पहुंचने के बावजूद बहुत सारा समय उन मीटिंगों में नष्ट करके, जिसमें घंटों का विवरण ‘मिनटों’ में समा जाता है, उन्हें पूरी शाम दफ्तर में बितानी पड़ती है।

विशेष काम ज्यादा नहीं होने पर भी दफ्तर में देर तक बैठे रहने का एक ही औचित्य होता है कि सबसे बड़ा अफसर बैठा हुआ है। उससे पहले उठ जाने का अर्थ है अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना! उधर कई बार अफसर इस धोखे में देर तक दफ्तर में बैठा रहता है कि इससे मातहतों की नजर में उसकी इज्जत बढ़ेगी।
कुल मिला कर खरबूजे के चाकू पर गिरने या चाकू के खरबूजे पर गिरने के एक होने की स्थिति बनी रहती है। आखिरकार सब अपने घरों तक देर रात में पहुंचते हैं। अविवाहित कुछ देर टीवी के सामने बैठ लेते हैं। विवाहित दिन भर घर और बाहर के सम्मिलित बोझ से दबी पत्नी और (अगर हों तो) पिता के सान्निध्य को तरसते हुए बच्चे को नींद की गोद में या अधनींदे देख कर सप्ताहांत में उनके लिए समय जरूर निकालने का वादा खुद से करते हैं। और इस तरह थके हारे युवा परिवार का एक दिन और गुजर जाता है।

ऊंचे झरोखे से उनकी दिनचर्या देखते हुए मुझे वर्षा ऋतु में गाए जाने वाले एक करुण गीत में जीवन के अंत का बिंब याद आता है- ‘ए री सखी झूला झूलही न पाई, सैयां के आए कहार रे…’! फिर राम-झरोखे बैठ कर मुजरा देखने का मेरा शौक मद्धिम पड़ने लगता है। मन करता है कि अनवरत भागते इन यंत्रवत युवाओं के कान में उसी वर्षागीत की आरंभिक पंक्ति पहुंचा दूं- ‘निबुला तले डोला रख दे मुसाफिर, सावन की आई बहार रे..!’

अरुणेंद्र नाथ वर्मा

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