नाम की पहचान

बिहार के सासाराम में रेड लाइट इलाके में देह व्यापार में धकेली गई सभी महिलाओं को अपने बच्चों के पिता का नाम रूपचंद रखना पड़ा था। इसके चलते लगभग सौ बच्चों के पिता का नाम स्कूल के रिकॉर्ड में एक ही था।

नई पीढ़ी के कई लोगों में कुछ बदलाव नजर आ रहे हैं।

अमित चमड़िया

‘नाम में क्या रखा है’! विलियम शेक्सपीयर अपने नाटक ‘रोमियो जूलियट’ के माध्यम से इस उपमा का मतलब समझाते हुए लिखते हैं कि नाम केवल एक शब्द है… यह किसी इंसान की व्याख्या नहीं करता है। गुलाब के फूल को कोई दूसरा नाम देने से उसकी खुशबू कम नहीं हो जाती है। किसी के आंतरिक गुण नाम से ज्यादा महत्त्व रखते हैं। शेक्सपीयर की यह व्याख्या आंतरिक गुणों के महत्त्व को समझाने के लिए है। यह व्याख्या अपने संदर्भों में सही हो सकती है। लेकिन हमारे समाज में नाम रखने को लेकर बड़ा खेल होता है। नाम में धर्म है, नाम में जाति है, नाम में लिंग है और नाम में क्षेत्र है। इसलिए गली-मोहल्ला, शहर, राज्य आदि जगहों और रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डा, संस्थानों, सरकारी योजनाओं, पुरस्कार आदि के नाम रखने और बाद में नाम बदलने के ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे।

फिल्मों में आने के बाद कई कलाकारों को भी अपने नाम बदलने पड़े हैं। नाम बदलने की राजनीति के पीछे जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्रवाद प्रमुख वजह रहे हैं। यों इस समाज में जो कारक जितना प्रभावशाली रहा है नाम बदलने में, उसकी उतनी बड़ी भूमिका रही है। भारतीय समाज में जो जाति और धर्म अपनी राजनीति में जितना प्रभुत्व रखते हैं, नाम रखे जाने में भी उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। कुछ समय पहले एक बडे रेलवे स्टेशन का नाम बदलने के पीछे का कारण धर्म ही था। भारतीय समाज में पिछड़ी समझी जाने वाली जातियों के लोगों के नाम समाज के उच्च जातियों के लोगों के नाम से प्रकृति में भिन्न होने के सैकड़ों उदाहरण मिलते हैं। संभव है कि यह थोपी हुई परंपरा नहीं हो, लेकिन अंतर और उसके सामाजिक संदर्भ खोजे जा सकते हैं। कई उदाहरणों से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि फलां नाम के व्यक्ति की जाति या फिर वर्ग क्या है! मैंने एक खबर में पढ़ा था कि बिहार के सासाराम में रेड लाइट इलाके में देह व्यापार में धकेली गई सभी महिलाओं को अपने बच्चों के पिता का नाम रूपचंद रखना पड़ा था। इसके चलते लगभग सौ बच्चों के पिता का नाम स्कूल के रिकॉर्ड में एक ही था। दरअसल, पास के मोहल्लों में रहने वाले समाज में उच्च कही जाने वाली एक खास जाति के लोगों की ओर से दूसरा और कोई नाम रखने की इजाजत नहीं थी, क्योंकि दूसरा और कोई नाम उनकी जाति के लोगों में होने की संभावना थी।

जब बच्चा पैदा होता है तो घर के लोग बड़े शौक से बच्चे का नाम रखते हैं। कई बार नाम ढूंढ़ने में कई महीने लग जाते हैं। यह जगजाहिर है कि नाम किसी बच्चे को एक पहचान देता है और बच्चा उसी पहचान के साथ बड़ा होता है। नाम बच्चों में ‘स्व’ की भावना पैदा करता है। बच्चों को भी अपने नाम से जुड़ने में समय लगता है। बिहार के रोहतास जिले के एक कस्बे में रहने वाले छह बहनों वाले एक परिवार में तीन बहनों के नाम शादी के बाद बदल दिए गए। दो बहनों के नाम तो सिर्फ इसलिए बदल दिए गए कि उनके पति को उनके पिता द्वारा रखे गए नाम पसंद नहीं थे। एक अन्य बहन के नाम बदलने के पीछे की वजह यह थी कि यह नाम पहले से ससुराल में रिश्ते में लगने वाले किसी बड़े व्यक्ति का था और उसका नाम सभी लोग नहीं पुकार सकते थे।

भारतीय समाज में आज भी यह चलन है कि घर की बहू अपने से बड़े-बुजुर्ग का नाम नहीं ले सकती है। दिलचस्प यह है कि जिस एक बहन का नाम बदला गया, वह अपने ससुराल का खर्च चलाने में आर्थिक रूप से मदद भी करती है। हमारे समाज में महिला के नाम शादी के बाद बदलने की कहानियां आम हैं और इसके पीछे सीधे-सीधे पुरुषवादी मानसिकता रही है। शादी के बाद पुरुषों के नाम बदलने का उदाहरण कहीं नहीं दिखाई देता है। पच्चीस वर्ष की उम्र पार कर जाने के बाद अगर किसी के ऊपर एक नए नाम को थोपा जाए तो क्या यह एक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक हमला नहीं होगा?

इस नए नाम से खुद को जोड़ने में कितना वक्त लगता होगा, इसका जवाब शायद वही बता सकता है, जिसके साथ यह ‘हादसा’ होता है। यों शादी के बाद महिलाओं द्वारा अपने नाम के साथ अपने पति के उपनाम यानी टाइटल को जोड़ना एक सामान्य-सी बात हो चली है। खुद को ‘आधुनिक’ समझने वाली महिला भी इस प्रचलन को आराम से अपनाती है। हालांकि कम ही सही, लेकिन नई पीढ़ी के कई लोगों में कुछ बदलाव नजर आ रहे हैं। अब महिलाएं जन्म आधारित उपनाम को भी बनाए रखती हैं और अपने पति के उपनाम को अंत में जोड़ लेती हैं। इस तरह की तमाम चीजें पुरुष सत्तात्मक समाज में आसानी से देखने को मिलती हैं। जाहिर है, यह मानस के पारंपरिक होने और इस पर विचार नहीं करने की वजह से है कि कैसे यह चलन पहचान और व्यक्तित्व को प्रभावित करता है।

 

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