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दुनिया मेरे आगे: उम्मीद के साथ

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हम सबसे पहले जिस विचार को हवा देते हैं, वह उसी तरह के सैकड़ों विचारों को हमारे दिमाग का रास्ता दिखा देगा। पहला विचार सकारात्मक या नकारात्मक कुछ भी हो सकता है।

Author June 26, 2019 1:16 AM
शिखर पर सब नहीं पहुंच सकते, क्योंकि वहां इतनी जगह ही नहीं है।

रजनीश जैन

आधुनिक जीवनशैली अपने साथ कुछ विकारों को भी साथ ले आई है। मनुष्य को कॅरियर और रिश्तों को बनाए रखने के लिए भारी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। उसकी सहनशीलता और धैर्य का पैमाना भौतिकता की तुलना में उस गति से नहीं बढ़ा है, जिस गति से बढ़ना चाहिए था। आमतौर पर हरेक मनुष्य की आकांक्षा होती है कि उसे उसी रूप में स्वीकार कर लिया जाए, जिस रूप में वह इस समय मौजूद है। लेकिन ज्यादातर मामलों में ऐसा होता नहीं है। हरेक व्यक्ति बेहतर की तलाश में है। फिर वह साथी की तलाश हो या उम्मीदवार की। जब चयन करने वाला अपने उपयुक्त व्यक्ति को नहीं पाता तो परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से अपनी असहमति व्यक्त कर देता है। यही वह बिंदु है जहां ‘अस्वीकृत’ व्यक्ति अपने अंदर कुछ दरकता हुआ महसूस करता है।

कुछ लोग इसे जीवन का नियम मानते हुए स्वीकार कर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन बहुत सारे इस इनकार को आसानी से नहीं पचा पाते। समय आगे बढ़ जाता है, मगर वे उसी लम्हे में फंस कर रह जाते हैं। यह एक ऐसी मनोवैज्ञानिक स्थिति होती है जब आप अपनी मनोव्यथा किसी को बता कर मन का बोझ हल्का नहीं कर सकते। मन में यही विचार बार-बार कौंधता है कि आप अपनी ‘पराजय’ को सार्वजनिक चर्चा बनाने का मौका दे रहे हैं। आपको लगता है कि अब से आप एक पराजित व्यक्ति मान लिए जाएंगे। आखिर वे कौन-सी परिस्थितियां रहीं और ऐसा क्यों हुआ होगा कि अपना दुख साझा करने को हमने अपने पराजित होने के रूप में देखना शुरू कर दिया होगा!

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हम सबसे पहले जिस विचार को हवा देते हैं, वह उसी तरह के सैकड़ों विचारों को हमारे दिमाग का रास्ता दिखा देगा। पहला विचार सकारात्मक या नकारात्मक कुछ भी हो सकता है। इस उलझन को समझने के लिए खुद के साथ प्रयोग किया जा सकता है। हम अपने दिमाग में यह बात लाएं कि हम कल सुबह पांच बजे उठेंगे। इसी क्षण के साथ हमारा दिमाग हमें सकारात्मक विचारों की शृंखला से भर देगा। हरेक नया विचार हमें सुबह जल्द उठने के फायदे से लेकर सुबह के सदुपयोग जैसे विचारों से भर देगा। इसके विपरीत हम सोचें कि मैं आज तक तो जल्दी नहीं उठा, अब जल्दी उठ कर क्या होगा? ऐसा सोचने के बाद हम पाएंगे कि हमारा दिमाग कितनी दृढ़ता से हमारे विचार के समर्थन में ठोस तर्कों की बौछार कर देगा। हम यह मानने को तैयार हो जाएंगे कि हमारा दिमाग सही राय दे रहा है। जबकि विचार-शृंखला की शुरुआत हमने ही की थी। हालांकि इस बात का हमें शायद अहसास भी नहीं होगा!

किसी व्यक्ति से अस्वीकृति या ‘रिजेक्शन’ के कुछ क्षणों या दिनों को ही गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। समय के इस दौर में उठाया गया कोई भी गलत कदम हमें गहरी निराशा के दलदल में धकेल सकता है। इसके संकेतों को समझने के लिए ‘अस्वीकृत’ व्यक्ति पर गहरी नजर रखना जरूरी है। सबसे पहली बात जो उसके स्वभाव में नजर आएगी वह यह कि सबसे पहले उसकी उन कामों में दिलचस्पी खत्म होने लगेगी, जिनमें वह पारंगत था। उसका व्यवहार लापरवाह हो जाएगा और रहन-सहन में चुस्ती-फुर्ती गायब हो जाएगी। इस मोड़ पर ही उसे मदद की सबसे ज्यादा जरूरत होगी। ऐसे समय में उसकी मदद उसके सबसे निकटस्थ साथी से आ सकती है। अक्सर परीक्षा परिणामों के बाद कुछ विद्यार्थी अपने को नहीं संभाल पाते हैं और अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं। आमतौर पर व्यक्ति अपने आप से इतनी अपेक्षा कर लेता है कि जो तर्कसंगत नहीं होती। जीवन के सामने सारी भौतिक और मानसिक आकांक्षाएं गौण हैं।

अथक प्रयासों के बाद भी कुछ हासिल न हो तो अपने को दोष न दें। व्यावहारिकता यह सिखाती है कि शिखर पर सब नहीं पहुंच सकते, क्योंकि वहां इतनी जगह ही नहीं है। निचले पायदान का व्यक्ति भी अपने काम को बेहतर करते हुए या तो शिखर पर पहुंच कर सकता है या फिर अपने पायदान को भी गौरवान्वित कर सकता है। यहां बरसों पहले दूरदर्शन पर प्रसारित विख्यात खलनायिका ललिता पंवार का साक्षात्कार याद आता है, जिसमें वे बता रही थीं कि आपको किसी भी काम के लिए रखा गया है तो आपका प्रदर्शन इस तरह का होना चाहिए कि लोग उसकी भी मिसाल दें कि यह काम फलां से बेहतर कोई दूसरा नहीं निकाल सकता। विदित हो कि ललिता पंवार द्वारा निभाए गए क्रूर सास के पात्र आज भी लोगों के जेहन में मौजूद हैं। विख्यात गायक रिकी मार्टिन ने क्या खूब कहा है- ‘अगर कोई आपको खारिज कर दे, तो निराश न हों। लोग अक्सर मूल्यवान चीजों को नकार देते हैं, क्योंकि वे उनका भार नहीं उठा सकते।’ यह बात सकारात्मक विचारों को अपनाने में मदद कर सकती है।

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