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दुनिया मेरे आगे: घर में बाजार

हमें याद होगा कि कभी वक्त था जब शादी-ब्याह या फिर तीज-त्योहारों पर नए कपड़े दिलाए जाते थे। जिन्हें हम बहुत जतन से रखते, धोते और सुखा कर अगली बार पहने के लिए रख दिया करते थे। मामा-मामी, बुआ के घर जाना होता तो जैसे खरीदी वैसे ही पहनी। हम नए कपड़े पहन कर जाते और आकर वैसे ही टीन या स्टील के बक्से में धर दिया करते थे।

प्रतीकात्मक तस्वीर।(सोशल मीडिया)

कभी सेल का मौसम साल में एक या दो बार आया करता था। राखी, दिवाली या फिर होली के आसपास। अब सेल का कोई मौसम न रहा। जब बाजार ने तय किया, तभी सेल का मौसम सिर चढ़ कर बोलने लगता है। कभी कोई कंपनी तो कभी दूसरी कंपनी में होड़ लगती है और सेल का मौसम शहर, महानगरों पर हावी हो जाते हैं। कभी महासेल तो कभी महामेघा सेल। सिर्फ नाम में अंतर देखे जा सकते हैं, प्रवृत्ति एक-सी होती है। कैसे ग्राहकों की जेब से पैसे निकलवाए जाएं। गोया ग्राहक तैयार बैठे होते हैं कि आएं और मेरी जेब काटें। जो सामान सामान्य दिनों में एक हजार रुपए की होती है, उस पर तीन से चार हजार की कीमत का पर्चा लगा कर पचास-पचीस या बीस फीसदी छूट के सेल के नाम पर वही सामान पंद्रह सौ रुपए में पिचका दिया जाता है। खरीदने वाला खुश कि तीन-चार हजार का सामान सेल में सस्ते में मिल गया। वह एक या दो नहीं, बल्कि तीन-चार पैंट या शर्ट खरीद लेता है। बिना इसकी जांच-परख किए कि उसे उन कपड़ों की जरूरत है भी या नहीं।

हमें याद होगा कि कभी वक्त था जब शादी-ब्याह या फिर तीज-त्योहारों पर नए कपड़े दिलाए जाते थे। जिन्हें हम बहुत जतन से रखते, धोते और सुखा कर अगली बार पहने के लिए रख दिया करते थे। मामा-मामी, बुआ के घर जाना होता तो जैसे खरीदी वैसे ही पहनी। हम नए कपड़े पहन कर जाते और आकर वैसे ही टीन या स्टील के बक्से में धर दिया करते थे। तब महसूस होता था कि नए कपड़ों की इज्जत क्या होती है। वे कपड़े फिर समय के साथ फटते थे। मुहल्ले वाले, यार-दोस्त मजाक भी उड़ाते थे कि अब तो नई कमीज खरीद लो भाई। मगर नई कमीज अगली होली या दिवाली में ही मिलती थी। वह भी कई बार कपड़े खरीदे जाते और दर्जी के पास नाप देकर हर दिन पूछने जाना कि कपड़े सील गए क्या! लाइन से टंगी हुई कमीज और पैंट में अपने कपड़े देखने का इंतजार होता था।

प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ का हामिद याद आता है। पूरे तीस दिन के रोजे के बाद गांव में हलचल है। किसी के पाजामे में नाड़ा नहीं है, कोई नई बुशर्ट पहने हुए है तो कोई अपने जूते को चमकाने में लगा है। वहीं कोई अपने जूते में तेल डाल कर गिला कर रहा है। तब लोगों को नए कपड़ों-जूते, चप्पलों का इंतजार होता था। किसी के पास भी एक या दो से ज्यादा जूते या अंगरक्खा नहीं होते थे। अब तो सेल-महासेल के मौसम में किसी के पास इतना भी वक्त नहीं है कि एक बार घर में अपनी आलमारी को खोल कर गिनती कर लें कि कितनी पैंट, शर्ट, टीशर्ट हैं जो पिछले साल भी पहनने की बारी नहीं आई थी। वे तमाम कपड़े अपनी बारी के इंतजार में सिमटे जा रहे हैं कि कभी तो उन्हें भी पहना जाएगा। मगर नई नई शर्ट-पैंट और आलमारी में ठूंस दी जाती है। वही हाल जूते-चप्पलों का है। एक नहीं, बल्कि कम से कम पांच-छह जूते-चप्पल तो आम बात है। एक चमड़े के, दौड़ने या टहलने के हल्के जूते, बिना फीते वाले जूते एक दूसरे पर चढ़े रहते हैं। लेकिन चूंकि किसी खास ब्रांड के जूते सेल में तीन या चार हजार में मिल रहे हैं तो बिना जरूरत के उसे खरीद कर जूतों की अलमारी में सजा देते हैं। सामानों का अति संग्रह कहीं न कहीं संसाधनों का गलत इस्तमाल भी है। चीजें सेल में मिल रही हैं, इस तर्क पर घरों को सामानों से भर दिया जाए, बिना यह सोचे कि इस चीज की जरूरत हमें है या नहीं!

सही है कि यह सुख समाज के सारे लोगों को उपलब्ध नहीं है। आज भी बड़ी तादाद में ऐसे लोग हैं, जो कपड़ों या दूसरी खरीदारी के उन्हीं दिनों को जी रहे हैं। अभाव के बीच जीने वालों के लिए आज भी दुनिया बहुत नहीं बदली है। लेकिन जो लोग खरीदारी की आदत के शिकार होते हैं, यहां उनकी बात है। उनसे कहना है कि जब मौका मिले तो कभी अपनी आलमारियों की सफाई कीजिए, मालूम चलेगा कि आप जिन्हें भी छांटते हैं कि इसे तो अब नहीं पहनता, किसी और को दे दें, तभी सामान बटोरू प्रवृत्ति सवार हो जाती है। आखिर एक आलमारी से काम क्यों नहीं चल सकता? पहले बहुत कम घरों में जूतों की अलमारी होती थी। लेकिन जब आठ-दस जोड़े जूते-चप्पल होंगे तो उसे सलीके से रखना भी होगा। अगर हमारे पास जरूरत से ज्यादा है तो वे दूसरे जरूरतमंदों के काम आ सकते हैं, यह बात हमारे दिमाग में नहीं आती। पुण्य कमाने के लिए दान करने में हमें सुख मिलता है, लेकिन अपने पास जरूरत से ज्यादा संसाधन आसपास के अभाव से जूझते लोगों के साथ बांटने के बारे में हम सोचते भी नहीं।

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