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दुनिया मेरे आगेः जिंदगी के रंग

हम इंसान कुदरत का ही एक हिस्सा हैं। इसलिए उसके रंगों से भला हम कैसे जुदा रह सकते हैं। फिर जो रंग कुदरत ने हमें दिए हैं, उनमें तो हमें रंगना ही है, लेकिन हमें रिश्तों के रंगों का भी उतना ही खयाल रखना है।

हम इंसान कुदरत का ही एक हिस्सा हैं। इसलिए उसके रंगों से भला हम कैसे जुदा रह सकते हैं।

विलास जोशी

हमारी जिंदगी कई रंगोें में रंगी हुई है। इसमें गुलाल की तरह रंगीन खुशियों भी होती हैं और पतझड़ के सूखे पत्तों की तरह गम भी। जिंदगी में ये दोनों रंग बहुत जरूरी हैं। जब तक हम दुख अनुभव नहीं करेंगे, तब तक खुशी क्या चीज होती है, इसका सही अंदाजा नहीं लगा पाएंगे। जिंदगी का भी यह एक अजीब रंग है कि जब हम सफलता के रंगों में रंगे होते हैं, तब तक न जाने क्यों हमारी जिंदगी अपने आप को संभाल नहीं पाती, लेकिन जब जीवन के प्रहसन का दृश्य बदलता है और मुश्किलें, दुविधा, दुख, तनाव और आपसी रिश्तों में कड़वाहट आने लगती है और हम असफलता की ओर बढ़ने लगते हैं, तब हमें मालूम होता है कि जिंदगी के कई ऐसे रंग हैं, जो पहले हमने कभी देखे ही नहीं थे। इसलिए हमें अपने रिश्तों को जिंदगी के नवरंगों में रंगने की अधिक जरूरत है।

हमलोग तीन सौ पैंसठ दिन में एक दिन होली के रंग में रंगते हैं, जबकि कुदरत हर रोज चारों प्रहर विभिन्न रंगों में रंगी होती है। कुदरत में अपरिमित रंगों के भंडार हैं। उसके पत्ते-पत्ते पर विविध रंग हैं। बस उसे देखने और अनुभव करने के लिए एक अलग दृष्टि की आवश्यकता है। सच यह है कि होली तन भीगने और मन को निर्मल बनाने का एक अप्रतिम त्योहार है। फागुन मास में जब नीम की पीली पत्तियां झरने लगती हैं तो यह दृश्य देखते ही बनता है।

होली खेलने की इच्छा सबके मन में होती है, लेकिन कुछ लोग इसे अपने मन में ही दबा कर रखते हैं। सच यह है कि होली के रंग कहते हैं कि होली खेलने की कोई उम्र नहीं होती। यह तो उल्लास का त्योहार है। जिनमें उमंग है, वे खेलें रंगों की होली। वैसे लोगों ने अब सोशल मीडिया पर भी होली खेलना शुरू कर दिया है। वे फेसबुक और वाट्सऐप द्वारा संदेशों और रंगों की होली खेलते हैं, लेकिन यह वास्तविक होली नहीं है। यह तो होली खेलने की एक प्रतिकृति या छाया मात्र है। कुदरत भी रंग बदलती रहती है। मौसम के बदलने के साथ वह भी अपने पुराने चोले को छोड़ कर नया वस्त्र धारण करती है। जब वसंत का मौसम पृथ्वी पर पदार्पण करता है तो हर शख्स में एक नया जोश अपने आप आने लगता है। मानो एक बीमार अपने आप बिस्तर से उठ कर अपनी सारी व्याधियों को वही छोड़ कर आनंद रस लेने कुदरत की शरण में जा रहा है।

किसी ने सही कहा है कि अगर आपको देखना है कि कुदरत नित नए दिन कैसे रंगों की होली खेलती है तो सूर्योदय के पहले उठिए और फिर उस अनंत आकाश की तरफ देखिए। सूर्योदय के पहले पूर्व दिशा की तरफ देखिए। आकाश का रंग तांबे के रंग की तरह नजर आएगा। फिर जैसे-जैसे सूर्य अनंत आकाश की यात्रा के लिए आगे निकलेगा, उसके कुछ पहले समूचा आकाश सुनहरे रंग की किरणों से सजा हुआ नजर आएगा।

आप एक-एक पेड़ को निहारिए। उन पर लगे फूलों के रंगों को देखिए। तब नजर आएगा कि हर एक पेड़ पर लगा फूल अलग-अलग रंग में सजा हुआ है। एक फूल का रंग दूसरे फूल के रंग से जुदा है। कुदरत की गोद में आया हुआ हर एक वृक्ष, उसकी हर एक शाखा, बेल, लताएं- सब विविध रंग लिए हुए है। धरा पर नजर पड़ते ही वह हरियाली की मखमली चादर ओढ़े नजर आती है।

जब कुदरत के इन विविध रंगों को देखते हैं, तब एक विचार मन में आ जाता है कि आखिर कुदरत को इतने रंगों में रंगने वाला वह अदृश्य चित्रकार कौन है! जो चित्रकार इतनी बड़ी कुदरत को इतने अनोखे रंगों में रंगे रखता है, वह कितना बड़ा होगा और खुद कितने रंगों से रंगा होगा! अगर हमें वास्तव में कुदरत के रंग देखने हैं तो एक दिन सुबह से शाम तक उस अनंत आकाश को निहारते रहें और फिर अनुभव करें कि सुबह, दोपहर और शाम को वह कैसे-कैसे रंग बदलता है। फिर एक बार जो कुदरत के होली के रंगों में रंगने का आदी हो जाए तो समझिए उसकी तो बारह मास होली ही है। लेकिन क्या हम होली के रंग बिखरने के लिए कुदरत के ही तौर-तरीके अपनाते हैं? शायद नहीं! हमारे त्योहार शायद यहीं नाकाम होते हैं।

हम इंसान कुदरत का ही एक हिस्सा हैं। इसलिए उसके रंगों से भला हम कैसे जुदा रह सकते हैं। फिर जो रंग कुदरत ने हमें दिए हैं, उनमें तो हमें रंगना ही है, लेकिन हमें रिश्तों के रंगों का भी उतना ही खयाल रखना है। सोशल मीडिया के इस दौर में कहने को तो हम उसके कारण करीब आए हैं, लेकिन आपस में एक दूसरे से मिल कर रिश्तों के रंगों में रंगने का मजा कुछ और ही है। यह हमें याद रखना होगा। नहीं तो जिंदगी के कई रंगों की कमी हमें हमेशा खलती रहेगी, जिसकी पूर्ति सिर्फ प्यार और स्नेह के रंगों से भी संभव है, जो हमारी जिंदगी के असल अमिट रंग हैं।

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