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दुनिया मेरे आगे: अंकों का मायाजाल

यह खबर ज्यादातर लोगों को याद होगी कि एक युवती पर पढ़ाई का बहुत बोझ डाला गया और उसकी रुचि के अनुसार विषय नहीं दिलाए गए थे तो उस युवती ने अपनी जिंदगी को ही समाप्त कर लिया था।

Author July 10, 2019 1:33 AM
दिल्ली में एक बच्चे को दसवीं की परीक्षा में साठ फीसद अंक मिले थे।

बृजमोहन आचार्य

पिछले कुछ सालों के दौरान राज्यों के शिक्षा बोर्ड और केंद्रीय शिक्षा बोर्ड के सालाना परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इस बात पर होती है कि सबसे ज्यादा नंबर कितने आए, किसके आए। कहीं खुशी तो कहीं गम देखने को मिलता है। हालांकि आज के इस दौर में सभी माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा उच्च अंक लाए ताकि आगामी कक्षाओं में प्रवेश के लिए दिक्कत का सामना नहीं करना पड़े। इसके लिए अभिभावक उन्हें शुरू से ही शिक्षा की दुकानों में यानी ऊंची फीस लूटने वाले कोचिंग संस्थानों में प्रवेश दिला कर निश्चिंत हो जाते हैं कि जब उनके बच्चे का परिणाम आएगा और उच्च अंक लाएगा तो समाज और परिवार में उनका नाम होगा। इसके बाद वे इस बात से बेफ्रिक हो जाते हैं कि कोचिंग संस्थान और वहां का वातावरण कैसा है और पढ़ाने वाले शिक्षकों की योग्यता क्या है। बस उच्च अंकों को लेकर यह बताने में कोई कमी नहीं रखी जाती है कि बच्चों ने कितने फीसद अंक लेकर परीक्षा उत्तीर्ण की है।

जिन बच्चों के अच्छे अंक आए, उनके अभिभावकों ने उन्हें शाबासी भी दी और समाज या परिवार में बच्चे के अंकों को लेकर चर्चा भी की। लेकिन जो बच्चे मेहनत करने के बाद भी उच्च अंक हासिल नहीं कर सके, उनके अभिभावकों ने कोचिंग संस्थाओं को कम और अपने बच्चे को ज्यादा कोसना शुरू कर दिया। जबकि बच्चों की सीमा के साथ-साथ उन्हें पढ़ाने वालों की कमजोरी भी इसकी वजह हो सकती है। इसलिए अंक कम आने पर बच्चे को डांटना और किसी के सामने बुरा-भला कहना बेमानी है।

देश की राजधानी दिल्ली में एक बच्चे को दसवीं की परीक्षा में साठ फीसद अंक मिले थे। ये अंक आज के इस युग में कम माने जाते हैं, क्योंकि हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा होने के कारण पनचानबे प्रतिशत अंक ही सही माने जाते हैं। लेकिन उस बच्चे की मां ने इन अंकों को भी अच्छा माना। उन्होंने अपने बच्चे का हौसला बढ़ाते हुए लिखा कि ‘मुझे साठ प्रतिशत अंक आने पर भी अपने बच्चे पर गर्व है, क्योंकि बच्चे ने अपनी मेहनत और संघर्ष में कोई कमी नहीं रखी; मैंने उसके संघर्ष को भी करीब से देखा है।’

लेकिन आज के इस दौर में उच्च अंक हासिल करने के लिए माता-पिता न जाने बच्चे पर कितना बोझ डाल देते हैं और उसे अलग-अलग विषयों के ट्यूशन के लिए घर से बाहर रखते हैं। ऐसे में वह इतना थक जाता है कि अपने स्तर पर पढ़ाई के लिए उसके पास समय ही नहीं बच पाता है। साथ ही उसे प्रश्न-पत्रों के अलावा परीक्षा का व्यावहारिक ज्ञान भी नहीं हो पाता है। उसका बचपन ट्यूशन, कोचिंग संस्थानों की पाठ्यक्रम पूरा कराने के नाम पर लूट और घर से बाहर रहने के चक्कर में ही गुम हो जाता है। इसके बाद भी अगर अच्छे अंक बच्चे के नहीं आते हैं तो कई बार कुछ बच्चे गलत कदम उठा लेते हैं। ये सभी कारण माता-पिता को नजर नहीं आते हैं।

सही है कि सभी माता-पिता चाहते हैं कि उनका चांद आसमान में चमके और उसकी रोशनी से फिजां रोशन हो, लेकिन इस चांद को बादलों के भार से इतना भी नहीं ढक देना चाहिए, जिससे उसकी चांदनी ही छिप जाए। साठ प्रतिशत अंक हासिल करने वाले बच्चे की मां ने अपने बच्चे के संघर्ष को देखा था। उसने समाज में यह संदेश दिया कि कोई भी बच्चा उच्च अंक लाने के लिए संघर्ष में कमी नहीं रखता है। आज हर माता-पिता को उस मां के संदेश को अंगीकार कर अपने बच्चे की मेहनत और संघर्ष को करीब से देखना होगा। तभी वह बच्चा बिना तनाव के पढ़ाई कर सकेगा। अन्यथा वह अंकों के मायाजाल में उलझ कर अपना सब कुछ लुटा देगा, उसका बचपन समाप्त हो जाएगा और किताब और ट्यूशन की दुनिया में उलझ कर बाहरी दुनिया से उसका मोहभंग हो जाएगा।

यह खबर ज्यादातर लोगों को याद होगी कि एक युवती पर पढ़ाई का बहुत बोझ डाला गया और उसकी रुचि के अनुसार विषय नहीं दिलाए गए थे तो उस युवती ने अपनी जिंदगी को ही समाप्त कर लिया था। उसने अपने अभिभावकों के नाम यह संदेश भी लिख दिया था कि उसकी छोटी बहन पर पढ़ाई का इतना दबाव नहीं डालें कि उसका बचपन कहीं गुम हो जाए। इसलिए अभिभावकों को भी यह सोचना होगा कि बच्चे पर पढ़ाई का अनावश्यक दबाव नहीं डाला जाए। बच्चा बोझ से इतना न दब जाए कि आगे बढ़ भी नहीं सके। लेकिन भागमभाग की जिंदगी में अभिभावकों के पास समय का अभाव है और वे बच्चे को स्कूल से कोचिंग और कोचिंग से ट्यूशन के लिए भेजते रहते हैं, जिससे बच्चा अपने परिवार के साथ तो बैठ कर कुछ सीख ही नहीं पाता है। उसके सिर पर पढ़ाई का बोझ डाल कर उच्च अंक लाने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। इसी दबाव के नतीजे में कुछ बच्चे ऐसा कदम उठा लेते हैं जिसका दुख माता-पिता को जीवन भर उठाना पड़ता है।

 

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