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दुनिया मेरे आगेः ये रास्ते हैं प्यार के

बुद्ध, प्लेटो, बर्टेंड रसेल, सार्त्र, सिमोन द बोउवा जैसे कई शताब्दियों और पीढ़ियों पर अपने प्रभाव छोड़ने वाले विचारकों ने रोमांटिक प्रेम के आधुनिक आदर्शों को कैसे आकार दिया और कैसे इसकी मौलिक खामियों को आदर्श के अनुरूप दुरुस्त करने का मार्ग सुझाया है, इसकी समझ हरेक काल में प्रासंगिक है।

प्रेम के आरंभ में किसी प्रयोजन का होना- प्रेम न होना ही माना जाएगा।

रजनीश जैन

फिल्मों में दर्शाए गए प्रेम का विस्तार गली-मोहल्ले के युवाओं या रेस्तरां के सुनसान कोनों में बैठे जोड़ों पर भली-भांति प्रतिबिंबित होता देखा जा सकता है। दरअसल, मस्तिष्क में चल रही हलचल एड्रेनिल रसायन से प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है, जिसका परिणाम अक्सर विपरीत सेक्स के आकर्षण पर जाकर खत्म होता है। हम इसे प्यार होना कहते हैं! मनोवैज्ञानिक एल्ड्रिन रिच ने लिखा है- ‘प्रेम एक सम्माननीय संबंध है, जिसमें दो लोग अधिकारपूर्वक प्रेम शब्द का उपयोग करते हैं। प्रेम दरअसल, एक प्रक्रिया है जो बहुत कोमल, थोड़ा अधिकार, थोड़ा भयग्रस्त होते हुए उस सत्य से दोनों प्रेमियों का परिचय कराती है, जिसमें वे होशमंद एक-दूसरे को एक नहीं, अनेक बार याद दिलाते हैं कि वे उससे कितना प्रेम करते हैं। इस प्रक्रिया में वे रोमांच के साथ एक-दूसरे को खो देने की भयग्रंथि से भी ग्रसित रहते हैं। अक्सर कोई भी प्रेम में पड़ते समय एक कल्पना का सहारा लेता है कि वह अनजान बाहरी व्यक्ति उसके अंदर के खालीपन को भर देगा। हालांकि उसकी इस स्वनिर्मित आश्वस्ति के पीछे कोई ठोस आधार नहीं होता। यह उसका ही बनाया हुआ भ्रम होता है। यह तब तक चलता है जब तक उस आगंतुक का वास्तविक जीवन में प्रवेश नहीं हो जाता। मनोवैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि अधिकतर प्रेम कहानियां हताशा की कहानियां होती हैं। इस अवधारणा के समर्थन में तर्क देते हुए वे कहते हैं कि जब आप प्रेम में पड़ते हैं तो अवचेतन में स्वीकार लेते हैं कि आप अब तक हताश थे! आप किसी के इंतजार में थे, आपके जीवन में किसी चीज की कमी थी, जो अब अचानक पूर्ण हो गई है। प्रेम दरअसल, आपके खालीपन की गहराई से आपका साक्षात्कार करा देता है।

प्रेम हो जाने के बाद उसकी नियति तय होने की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। अमूमन दो ही विकल्प होते हैं, जहां प्रेम पहुंचता है। एक, या तो जोड़े हमेशा के लिए बिना शर्त सुखद अनुभवों को गढ़ते हुए जीवन को निखार लेते हैं। दो, या तो प्रेम चूक जाता है या फिर चयनकर्ता उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता और प्रेम काफूर हो जाता है। मोटे तौर पर देखें तो प्रेमियों में उम्र का अंतर, समाज के रोड़े, भिन्न परिवेश, विचारों में मतभिन्नता, आर्थिक हालात इसके बिखरने की मूल वजह बनते हैं। हालांकि इस तथ्य पर कोई ध्यान नहीं देता कि प्रेम का न होना ही इस वियोग की मूल वजह है। शुरुआत में दैहिकता, रूपसौंदर्य, लोकप्रियता, बुद्धिमानी, वाक्पटुता, संपन्नता या ऐसा ही कोई अन्य प्रभावी कारण रूमानी आकर्षण बन कर इस तरह मन-मस्तिष्क पर छा जाता है कि संजीदा लोग भी उसे प्रेम समझने की भूल कर बैठते हैं। फिर उस प्रभावी कारक का प्रभाव मंद होने लगता है और वह तथाकथित प्रेम धीमे-धीमे रिस जाता है। कभी किसी एक का तो कभी एक साथ दोनों ही का!

प्रेम के आरंभ में किसी प्रयोजन का होना- प्रेम न होना ही माना जाएगा। कोई भी प्रयोजन फिर वह भौतिक हो, या मानसिक, एक समय के बाद हासिल हो ही जाता है। फिर प्रेम करने की गुंजाइश भी उसके साथ ही खत्म हो जाती है। लैला-मजनूं हो जाना, शिरी-फरहाद हो जाना या अमृता-इमरोज हो जाना किसी तपस्या से कम नहीं है। यह सार्वभौम सत्य गहरे उतारना जरूरी है। कुछ साल पहले पटना के उम्रदराज प्रोफेसर और उनकी शिष्या के प्रेम प्रसंग को लोग आज तक भूले नहीं हैं। उनके इस संबंध और प्रोफेसर की पत्नी द्वारा शिष्या की पिटाई को देश के एक प्रतिष्ठित समाचार चैनल ने इस प्रमुखता से सनसनीखेज बना दिया था कि गुरु-शिष्या की जोड़ी शाम होने से पहले जानी-मानी हस्ती के रूप में मशहूर हो गई थी। प्रोफेसर को ‘लवगुरु’ की उपाधि से नवाज दिया गया, जो उनके साथ अब तक चिपकी हुई है। अब खबर है कि यह जोड़ा अलग हो चुका है। शिष्या वेस्टइंडीज के किसी मानसिक अस्पताल में अपने अतीत की दुस्साहसिकता पर प्रायश्चित कर रही है। गुजरते समय और धुंधलाती प्रसिद्धि के साथ गुरु-शिष्या के तथाकथित प्रेम की परतें भी उधड़ गईं!

प्रेम सिर्फ प्रेम होता है, जो हर हाल में साथ खड़े होकर अपना संपूर्ण न्योछावर इस शर्त पर करता है कि उसकी (प्रेमी की) निजता पर कोई आंच नहीं आती। किसी उद्देश्य के लिए किया हुआ प्रेम कभी प्रेम हो ही नहीं सकता। न ही उसके होने का ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता होती है। प्रेमियों के लिए बिना वैचारिकता, बिना संवेदनशीलता और बिना विवेक के अनदेखे रास्तों पर चल पड़ना अक्सर दुखद ही रहा है।

बुद्ध, प्लेटो, बर्टेंड रसेल, सार्त्र, सिमोन द बोउवा जैसे कई शताब्दियों और पीढ़ियों पर अपने प्रभाव छोड़ने वाले विचारकों ने रोमांटिक प्रेम के आधुनिक आदर्शों को कैसे आकार दिया और कैसे इसकी मौलिक खामियों को आदर्श के अनुरूप दुरुस्त करने का मार्ग सुझाया है, इसकी समझ हरेक काल में प्रासंगिक है। कम से कम प्रेम के रास्ते पर चल पड़े और चलने का मन बना रहे लोगों के लिए तो बेहद जरूरी है!

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