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दुनिया मेरे आगे: हरी घास पर कुछ देर

महानगर में रहने वालों को यह हरी घास न मिले तो जरा सोचिए उनका क्या हाल होगा! हरी घास का एक टुकड़ा ही सही, बहुमंजिली सीमेंटी कंक्रीटी इमारतों के बीच आंखों और मन को कुछ सुख तो पहुंचाता ही है।

Author Published on: October 7, 2019 2:34 AM
हरी घास को ठीक ही ‘हरे गलीचे’ की भी संज्ञा दी जाती है।

प्रयाग शुक्ल

जब सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का कविता संग्रह ‘हरी घास पर क्षण भर’ आया तो हिंदी कविता के बहुतेरे नए-पुराने पाठकों ने कुछ चौंक कर यह पहचाना था कि आज की शहरी ‘हरी घास’ भी कविता की एक विषय वस्तु हो सकती है। वह हरी घास, जो वेनु बजाने और धेनु चराने वाले कृष्ण के समय की हरीतिमा से अलग प्रकार की घास है। हां, अज्ञेय की कविता के शीर्षक से ही जो छवि उभरी, वह किसी पार्क की हरी घास की ही छवि हो सकती थी। थी भी वही। और यह जो बागों-उद्यानों, पार्कों और रिहायशी इमारतों के परिसरों या बंगलों के लॉन की हरी घास है, वह आज के शहरातियों के लिए एक विशेष प्रकार का आकर्षण है। उस पर या उसके बीच बैठ कर प्रकृति के साथ होने का कुछ तो एहसास होता ही है।

आमतौर पर उसके आकर्षण में खिंची आकर गिलहरियां भी कुछ उछल-कूद करती हैं। कुछ चिड़ियां अपने पांवों उस पर चलती हैं। सुबह की सैर करने वाले कुछ नागरिक भी अपने जूते या चप्पल उतार कर उस पर कुछ देर चलना पसंद करते हैं। प्रेमी जोड़े उस पर बैठ कर बतियाते हैं। अपना सुख-दुख, प्रेम साझा करते हैं। बच्चे उस पर उछलते-कूदते हैं, खेलते हैं। उनकी मां और उनकी आया भी हरी घास के बीच होने का आनंद उठाती हैं। अच्छी हवा चल रही हो तो यह भी मनाती हैं कि सूरज का प्रकाश उसके डूबने से पहले कुछ देर और थमा रहे, तो कितना अच्छा हो। मन में ही यह कामना भी करती हैं कि प्रकाश थमे, पर हवा न थमे! हरी घास के बीच वाले झूले भी भला किसे अच्छे नहीं लगते! तो हरी घास की यह कामना उस पर ‘क्षण भर’ बैठने की इच्छा, भला किसके भीतर नहीं होती!

यह लिखते हुए मैं अपने रिहायशी परिसर के एक लघु-उद्यानी एरिया में एक बेंच पर बैठा था पेड़ की छाया के नीचे। चंपा के पेड़ों के कुछ सफेद फूल झर कर घास के कुल ‘फ्रेम’ की किनारी पर पड़े हुए थे। सूखे-झरे पत्तों के साथ। एक गिलहरी आ गई और दो पीली तितलियां भी हवा पर सवार एक ओर को चली गर्इं। कुछ बादल के साथ इस मौसम में यह दृश्य कुछ और मनोरम हो उठा। हां, एक चींटी ने घुटने के पास तक चढ़ कर और च्यूंटी काट कर यह भी बता दिया कि घास पर या उसके पास किसी कुर्सी या बेंच पर बैठने का सुख उठाना चाहोगे तो मेरी च्यूंटी भी सहनी ही पड़ेगी, कभी न कभी, क्योंकि तुम्हारी तरह उसे भी बहुत पसंद है हरी घास। वह चींटी तो यहीं घर बना कर रहने भी लगती है।

मैंने सोचा कि नवंबर-दिसंबर में जब दिल्ली एनसीआर में, यानी दिल्ली-नोएडा-गुड़गांव में ठंड पड़ रही होगी तो मैं हरी घास के बीच हर साल की तरह फिर कुर्सी डाल कर या किसी बेंच पर ही बैठ कर लिखा-पढ़ा करूंगा। जब लिखते-पढ़ते-सोचते कुछ देर विराम लूंगा, इधर-उधर देखूंगा और हरी घास के साथ फूलों-तितलियों और धूप के टुकड़ों के साथ भी हो लूंगा। हां, गिलहरियां भी आएंगी ही! पिछले साल तो एक तितली काफी देर तक घास पर जमी रही थी और मैं मोबाइल से उसकी एक तस्वीर खींच कर मित्रों को भेजा भी था।

महानगर में रहने वालों को यह हरी घास न मिले तो जरा सोचिए उनका क्या हाल होगा! हरी घास का एक टुकड़ा ही सही, बहुमंजिली सीमेंटी कंक्रीटी इमारतों के बीच आंखों और मन को कुछ सुख तो पहुंचाता ही है। सो, अचरज नहीं कि जो ‘टेरेस गार्डेन’ में आठवीं-दसवीं मंजिल की छत पर घास उगा लेने का साधन रखते हैं, वे वहां हरी घास उगा लेते हैं। फिर वह नकली हरी घास भी तो है ही, जो घास का भ्रम देने के लिए उगा ली जाती है कि आंखें को कुछ राहत मिले।

हरी घास को ठीक ही ‘हरे गलीचे’ की भी संज्ञा दी जाती है। पर एक दिन यह देख कर अचरज भी कम नहीं हुआ कि हमारी सोसायटी के पास की एक और सोसायटी की हरी घास को हटा कर वहां सीमेंटी फर्श बिछाया जा रहा है, क्योंकि हरी घास वाला मिट्टी का इलाका बारिश में कीचड़ पैदा करता है। कितनी विडंबनाएं है शहरी जीवन की। कुछ हमने खुद रच डाली हैं। अब देखिए न, बिना माटी के तो हरी घास उग नहीं सकती है! बिना बारिश के भी हम रह नहीं सकते हैं! हमें हरी घास की भी चाह हो! पर वह बिना माटी और जल के उगे भी तो कैसे! जो हो, महानगरों और शहरों में विशेष रूप से हमें हरी घास के ‘दर्शन’ चाहिए। फिर दोहरा दूं कि चाहे वह छोटे-से टुकड़े में ही क्यों न मिले! किसी फुटपाथ में किसी किनारी की तरह ही बसी हुई क्यों न हो! किसी चारदिवारी से लग कर बारिश में ही क्यों न उग आई हो, वह हो, वह हो, वह हो। बनी रहे।

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