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दुनिया मेरे आगे: नसीहत के फूल

नसीहतें हमारे जीवन के अंधकार को हटा कर रोशनी करती हैं, सबक लेने का मौका देती हैं और जीवन के रूप-स्वरूप को संवारने-सुधारने में विशेष मदद करती हैं और हमारे व्यक्तित्व को निखारने में बड़ी भूमिका अदा करती हैं।

जिंदगी की हर शाम कुछ तजुर्बे देकर जाती है।

राजेंद्र प्रसाद

हरेक की जिंदगी के समंदर में अनेक उतार-चढ़ाव आते हैं। ऐसे में जब कभी एकांत में जिंदगी के बारे में सोचने-विचारने का अवसर मिलता है तब समझ आता है कि केवल सांस लेने या छोड़ने का नाम जिंदगी नहीं है। ऐसी स्वत: स्फूर्त क्रिया तो निहायत कुदरती उसूल है, जिसे हमें याद नहीं करना पड़ता कि सांस कब लेना या कब छोड़ना है। अगर हम ठीक से जीवन पर विचार करें तो बहुत सारे पहलू और आयाम हमसे जुड़े होते हैं। उदाहरण के लिए एक बच्चा पैदा होने के बाद ज्यों-ज्यों बड़ा होता जाता है त्यों-त्यों खुद को संसार में मोह-माया की केंचुली में निरंतर ऐसा लिपटा हुआ पाता है, जिसमें अपने इर्द-गिर्द के परिवार वाले या संसारवासी समझा-पढ़ा देते हैं कि पढ़ो, पैसा कमाओ और विकास की भूख को शांत करो। इससे ऐसा जरूर लगता है जैसे बचपन में हम खूब पढ़ें, बड़े होकर अच्छा भविष्य बनाएं। अच्छा भविष्य पैसा कमाने से जुड़ा हुआ देखते हैं या गृहस्थी चलाने के लिए अर्थ को प्रधान मान कर विकास की सब क्रियाओं से गुजरते हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि अर्थ के चक्कर में बहुत सारा अनर्थ भी जीवन में कर जाते हैं, जिसकी आपाधापी में इंसान का जीवन कीचड़ में ऐसा सन जाता है कि जीवन का उद्देश्य बहुत सीमित-सा जान पड़ता है।

यों देखें तो जीवन में दुनिया की अच्छी-बुरी बातें कही-सुनी और की जाती है, सिर्फ अमल करना बाकी रह जाता है। सांसारिक चक्र से थोड़ा-सा सोचें तो लगेगा कि जिंदगी के असली और प्राकृतिक आनंद से हम अपने को काफी जुदा पाते हैं। मोटे तौर पर चार तरह के लोग होते हैं- पहले, जो जल्दी से कोई गलती नहीं करते या ठोकर खाने से पहले ही संभले होते हैं; दूसरे, किसी को ठोकर खाकर देखते हुए देख संभल जाते हैं; तीसरे, खुद ठोकर खाकर भविष्य के लिए संभल जाते हैं और चौथे, वे जो ठोकर खाकर भी कभी नहीं संभलते।

बेशक जिंदगी हमें बहुत कुछ सिखाती है। आज दुनिया में कितने लोग हैं जो सही को सही और गलत को गलत जानते हैं। कटु सत्य है कि गलत को गलत और सही को सही पहचानना और कहना आज के युग में असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर है। लगता है कि हम बदलते दौर के ऐसे कालखंड में जी रहे हैं जहां लोग साधारण नहीं, असाधारण से हो गए हैं। सामाजिक नहीं, कुछ असामाजिक हो रहे हैं और इंसानियत को भूल रहे हैं। इसका मतलब ये नहीं कि हम सब गलत हैं। कहीं न कहीं हमारी शिक्षा पद्धति, समाज और परिवारों के सोचने और काम करने का ढंग भी दोषी है। इसलिए संवाद का स्थान विवाद और समाधान का स्थान समस्या ले रही है।

जीवन में जीने के मकसद पर विचार करने की आदत होनी चाहिए। कुछ लोग तो यह भी कह गए हैं- ‘न चादर बड़ी कीजिए, न ख्वाहिशें दफन कीजिए, चार दिन की जिंदगी है, बस चैन से बसर कीजिए।’ जीवन को सही और सार्थक बनाने के लिए अगर हम सीखना चाहें तो संसार में सीखने-करने की बहुत सारी चीजें हैं। उनमें महत्त्वपूर्ण है- नसीहतें, जो चिंतकों-विचारकों और महान लोगों के अनुभवों के खजाने से निकली हैं। नसीहतें हमारे जीवन के अंधकार को हटा कर रोशनी करती हैं, सबक लेने का मौका देती हैं और जीवन के रूप-स्वरूप को संवारने-सुधारने में विशेष मदद करती हैं और हमारे व्यक्तित्व को निखारने में बड़ी भूमिका अदा करती हैं। बानगी के रूप में कुछ नसीहतें गहरे अर्थ वाली भी हैं। मसलन, ‘जीभ सुधर जाए तो जीवन सुधरने में वक्त नहीं लगता’। ‘दीपक इसलिए वंदनीय है कि वह दूसरों के लिए जलता है, दूसरों से नहीं जलता।’ ‘जो दूसरों से मिलजुल कर चलता है, वास्तव में केवल वही जीने की कला जानता है।’ ‘सब्र और सच्चाई एक ऐसी सवारी है जो अपने सवार को कभी गिरने नहीं देती; ना किसी के कदमों में और न किसी की नजरों में।’

इन नसीहतों में जीवन के मूल्य हैं, नैतिकता के सबक और व्यक्तित्व विकास के लिए प्रेरणा है। अपनों को अपना बनाए रखने का चुंबक है और परायों को अपना बनाने के नुस्खे भी। नसीहत के फूल किसी को दें तो उसकी खुशबू खुद भी लेना न भूलें। सब मानते हैं कि दूसरों को नसीहत देना और आलोचना करना सबसे आसान काम है। सबसे मुश्किल काम है चुप रहना और आलोचना सुनना। विरासत में हर बार जागीर और सोना-चांदी नहीं मिलता, कई बार जिम्मेदारियां भी मिलती हैं। अपना अहं त्याग कर शक्तिशाली होने पर भी सरल रहने की जरूरत है। धनी न होने पर भी परिपूर्ण महसूस करना चाहिए। हालांकि जिंदगी में सरल होना आसान है, पर देखा यह गया है कि कठिन होने को लोग सरल मानते हैं और सरल होना फिर खुद-ब-खुद कठिन हो जाता है। जिंदगी की हर सुबह कुछ शर्तें लेकर आती है और जिंदगी की हर शाम कुछ तजुर्बे देकर जाती है।

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