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दुनिया मेरे आगे: अंधेरे की चमक जुगनू

ह भी पढ़ा है कि पुराने जमाने में लोग जुगनुओं को एक डिब्बे में बंद कर उससे रात में राह देखने की कोशिश की जाती थी और स्त्रियां घर को अंधेरे से मुक्त रखने का काम लेती थीं।

Author June 22, 2019 12:45 AM
अब वे शहर तो क्या, गांव में भी शायद ही नजर आते होंगे!

अंशुमाली रस्तोगी

आखिरी बार जुगनुओं को कब देखा था, मुझे याद नहीं। न ही शायद आपको याद होगा। जुगनू हमारी बचपन की यादों और कहानियों में ही बचे रह गए हैं अब। आज बच्चों से जुगनुओं के बारे में पूछा जाए तो वे इतना भर कह देते हैं- ‘हां, क्लास की किताब में देखा-पढ़ा था लाइट वाले कीड़े के बारे में!’
मुझे खूब याद है कि जब हम छोटे थे, तब कितने ही जुगनुओं को रात के अंधेरे में उड़ते देखते थे। रोशनी जलाते-बुझाते नन्हे-नन्हे जुगनू कितने आकर्षक लगते थे! एकाध दफा तो ऐसा भी किया कि सिर्फ यह जानने के लिए कि जुगनुओं में ये बत्ती-सी जलती कैसे और कहां से है। उन्हें पकड़ कर डिब्बी में बंद कर लिया था। गरमी की उन रातों में सिर्फ उस ‘लाइट वाले कीड़े’ को देखने का मन करता था। तब जुगनू ही हमारे खेल और मनोरंजन का साधन हुआ करते थे। एक साथ कई-कई जुगनुओं को हल्की जलती-बुझती लाइट के साथ देखना बड़ा खूबसूरत लगता था।

देखते ही देखते जुगनू हमारे बीच से ऐसे गायब हुए कि अब वे शहर तो क्या, गांव में भी शायद ही नजर आते होंगे! जुगनुओं को गायब करने के दोषी दरअसल हम ही हैं। निरंतर बढ़ता शहरीकरण, खेतों का खत्म होना, जंगलों-पेड़ों का कटना अकेले जुगनुओं को ही नहीं और भी न जाने कितने जीव-जंतुओं को लील गया है। बढ़ते प्रदूषण ने जब इंसानों का जीना मुहाल कर रखा है, तो जीव-जंतुओं और जानवरों की क्या बिसात। हमने जुगनुओं को नहीं, गौरैया को भी अपने बीच से लगभग गायब कर दिया है। अब जोर लगाया जा रहा है कि गौरैया फिर से लौट आए। आलम यह है कि हर रोज सुबह मीठी तान सुनाने वाले कोयल तक अब कम ही नजर आते हैं। भूले-भटके ही उसकी आवाज कानों में पड़ती है।

प्रकृति और पर्यावरण से छीनने की होड़ यहीं खत्म नहीं हुई है। यह लगातार जारी है। नदियों-तालाबों को पाट कर रोज नई-नई कॉलोनियां और अपार्टमेंट विकसित किए जा रहे हैं। खेतों को खत्म किया जा रहा है। धरती न रहने लायक बची है, न जीने लायक। ऐसे में जुगनुओं का विलुप्त होना अधिक आश्चर्य पैदा नहीं करता। बच्चों को जो बचपन हमें जुगनुओं को देखने, उनके बारे में जानने के लिए देना चाहिए था, उसे हम मोबाइल और कार्टून चैनलों में दे रहे हैं। बच्चे अपना बचपन जी नहीं, बल्कि ढो रहे हैं।

प्रकृति के आचरण को हमने कुछ ऐसा बना और बदल दिया है कि अब यहां कुछ भी सुरक्षित नहीं बचा। यह परिवर्तन जितना खतरनाक इंसानों के स्वास्थ्य के लिए है, उतना ही जानलेवा पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं के जीवन के लिए है। प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की जद में हम इस कदर आ चुके हैं कि आने वाले सालों में धरती के हर प्राणी का जीवन कठिन से कठिनतम होगा।

एक दौर हमारे बचपन का ऐसा भी गुजरा है, जब जुगनुओं को रात में देखना आम बात हुआ करती थी। तब किसी ने कल्पना तक न की होगी कि एक समय ऐसा भी आएगा जब हम इस खूबसूरत जीव को देखने को ही तरस जाएंगे। जो है या जो पीढ़ी आगे आ रही है, उसके लिए तो जुगनू शायद किस्से-कहानियों की बातें ही रह जाएंगी। आज भी जब बच्चे लुप्तप्राय हो चुके जीवों के बारे में पूछते हैं, तब हमारे पास कोई उचित जवाब नहीं होता उन्हें देने के लिए। बाकी इधर-उधर की बातें कर दिल आप उनका कितना ही बहला लीजिए, लेकिन जो हकीकत है, उससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते।

मगर इतना तो तय है कि जुगनू हर उम्र के व्यक्ति के लिए कौतूहल का कारण रह हैं। खासकर उनके भीतर से प्रकाश का निकलना। यह भी पढ़ा है कि पुराने जमाने में लोग जुगनुओं को एक डिब्बे में बंद कर उससे रात में राह देखने की कोशिश की जाती थी और स्त्रियां घर को अंधेरे से मुक्त रखने का काम लेती थीं। जुगनू रात के अंधकार में क्यों चमकते हैं, इसके अपने वैज्ञानिक कारण हैं। पर हमें उनका यों लाइट की मानिंद जलना-बुझना आकर्षित तो करता ही है।
जुगनुओं पर लिखा भी खूब गया है। प्रेमचंद की तो एक कहानी ही है ‘जुगनू की चमक’। हरिवंशराय बच्चन की कविता है ‘जुगनू’। इकबाल की एक कविता ‘जुगनू’ की पंक्तियां हैं- ‘सुनाऊं तुम्हें बात एक रात की/ कि वो रात अंधेरी थी बरसात की/ चमकने से जुगनू के था इक समां/ हवा में उड़े जैसे चिंगारियां/ पड़ी एक बच्चे की उस पर नजर/ पकड़ ही लिया एक को दौड़ कर/ चमकदार कीड़ा जो भाया उसे/ तो टोपी में झटपट छुपाया उसे…!’
जुगनुओं के साथ बीता बचपन यादों में रहेगा हमेशा। अब जबकि जुगनुओं का संसार लगभग विदा ले चुका है शहरों से, तो क्या हमें कुछ ऐसे प्रयास नहीं करने चाहिए कि वे वापस आ सकें हमारे बीच? ताकि हम अपने बच्चों को दिखा सकें कि देखो, ऐसा होता है ‘लाइट वाला कीड़ा’ जुगनू!

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