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दुनिया मेरे आगे: भूले-बिसरे फल

अपनी बदरंग दाढी-मूंछनुमा बनावट का मारा हुआ बेचारा कसेरू भी है जो ताल-तलैयों में अपनी घास जैसी देह में सुपारी के आकार के फल छिपाए रहता है। उनमें कच्चे नारियल जैसी मिठास और शीतलता होती है।

Author Published on: June 20, 2019 1:01 AM
हापुसवंशी हुआ तो सैकड़ों रुपए दर्जन में उसका मोल आंका जाता है

अरुणेंद्र नाथ वर्मा

कोयल की कूक में ‘बा-अदब बा-मुलाहिजा होशियार’ सुन पाना सबके बस की बात नहीं। लेकिन आम के प्रेमियों के लिए उसमें फलों के राजा के आगमन की अग्रिम खबर होती है। इधर कोयल ने बावरी होकर कूकना शुरू किया, उधर आम बौराया। आम्रमंजरी पहले खट्टी अमियां बनती है, फिर धीरे-धीरे मदमाती मिठास से भरपूर होने लगती है। अंत में जब पीले, सिंदूरी रंगों से शृंगार करके वह आम से खास बन जाती है तो पेड़ों की डालियों से ससम्मान उतार कर, गर्वोन्मत्त आम को ठेस लगने से बचाते हुए बाजारों में लाकर फलों के राजा के रूप में सिंहासनारूढ़ कर दिया जाता है। हापुसवंशी हुआ तो सैकड़ों रुपए दर्जन में उसका मोल आंका जाता है और दशहरी, केसर, नीलम, बंगनपल्ली जैसे किसी सुपरिचित नाम से हुआ तो भी बाजार यथासंभव आम आदमी से उसकी दूरी बनाए रखता है। ‘कुलीन’ वंशों में जन्मीं, लेकिन लू लगने से जरा खराब हो गर्इं, आंधियों के प्रकोप से परिवार से बिछुड़ गर्इं या फिर समृद्ध महानगरों से दूर ही फले-फूले आमों की सवारी देहात की पगडंडियों में उलझ कर शहरों में सिंहासनारूढ़ होने पहुंच ही न सकीं, वे खास के बजाय आम बन कर आम आदमी के काम आती हैं।

ऐसे में मन द्रवित हो उठता है फलों के समाज को आहत करती भेदभाव और बंटवारे की बीमारी को देख कर। मिठास के बावजूद केवल तराशी गई शक्ल-सूरत वाले आमों जैसा नहीं होने के कारण बेचारे कई फल अपने समाज के हाशिये पर रह जाते हैं। स्वाद, रूप, गंध- हर तरह की जन्मजात ‘कुलीनता’ पर खुद ही रीझे हुए आम, सेब, अंगूर, नाशपाती जैसे फलों की पांत में स्ट्रॉबेरी और अनार जैसे फल भी अपनी रक्ताभ सुंदरता का गरूर छलकाते हुए बैठ जाते हैं। उधर किवी फ्रूट, पर्सिमोन, ड्रैगन फ्रूट जैसे विदेशी फल अपनी पाश्चात्य और आयातित छवि के कारण ऐसे अति-अभिजात मालूम होते हैं जैसे फलों के बीच आभिजात्य या एलीट तबके जैसा कुछ हो। ऐसे में याद आते हैं वे बेचारे बाजार की दौड़ में पिछड़ गए फल, जिन्होंने बाजार की चमक-दमक के आगे लज्जित होकर विस्मृति की चादर में अपना मुंह छिपा लिया। कुछ को हाशिये के बाहर कर दिया गया, लेकिन वे अब भी जीवित हैं, पेड़ों से टपक कर धरती के ममतामय आंचल में सांत्वना तलाशते हैं। बहुत हुआ तो गांव-गंवई के बच्चों, चरवाहों की हथेली में आकर टिक जाते हैं। आगे जाने का दुस्साहस करते भी हैं तो देहात के हाट के आगे नहीं। शहरों की युवा पीढ़ी उन्हें क्या जानेगी!

कटहल को सब्जी के अतिरिक्त एक सुस्वादु फल के रूप में भी बहुत से लोग जानते हैं। बेचारा पका हुआ कटहल, अनन्नास या पाइनएपल जैसी सुगंध और स्वाद के बावजूद अभिजात फलों की पंगत में नहीं बैठ पाता। पर मुझे कटहल की नहीं, फिलहाल बड़हल की याद आ रही है। पके कटहल से कुछ हद तक मिलते स्वाद वाले इस बेचारे फल को इसकी बेडौल आकृति और उभरे-फूले बाहरी हिस्से ने कहीं का न छोड़ा। शायद शक्ल-सूरत की कमजोरी ने बड़हल को बदहाल बना दिया है। अब तो वह देहातों में भी कम ही दिखता है। इस बदहाली में उसके साथ एक और गरीब है। उसके गोल-मोल आकार से भ्रमित होकर उसे जंगल-जलेबी का नाम देने वाले उसमें जलेबी की मिठास ढूंढ़ने लगें तो उसकी क्या गलती! इस बेचारी जलेबी को अच्छे दिनों में भी किसी ने पैसे खर्च करके नहीं खाया होगा। बच्चों के ढेलों-पत्थरों से आहत होकर धराशायी हो जाना ही हमेशा से उसकी नियति थी!

अपनी बदरंग दाढी-मूंछनुमा बनावट का मारा हुआ बेचारा कसेरू भी है जो ताल-तलैयों में अपनी घास जैसी देह में सुपारी के आकार के फल छिपाए रहता है। उनमें कच्चे नारियल जैसी मिठास और शीतलता होती है। अब न रहे ताल-तलैया, न रहा कसेरू। उधर पहाड़ों की गर्वीली ऊंचाइयों को भी इंसान ने खोद फेंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन उन्हें पूरी तरह मिटा नहीं पाया। अच्छा हुआ! वरना कहां जाता शहतूत जैसी मिठास और शक्ल वाला काफल, जो पहाड़ों में अपने सगोत्रीय और पड़ोसी अंजीरनुमा बेडू को बारहों मास मुस्कराने देता है, पर खुद केवल चैत में पकता है। इन दोनों ने उत्तराखंड को अपने स्वाद से भी बढ़ कर मीठा लोकगीत दिया है- ‘बेडू पाको बारामासा, नरण काफल पाको चइता मेरी छैला..!’

जंगल-जलेबी, बड़हल, कसेरू, काफल, बेडू सब निरायास उगते हैं। मासूम आंखों से अपना गुण-ग्राहक तलाशते हैं। अंत में चुपचाप इर्द-गिर्द फैली अपनी जैसी गरीबी पर कुर्बान हो जाते हैं। विस्मृति के गर्भ में खो गए या खोते हुए ये बेचारे फल अपने समाज के हाशिये पर ही रह गए। पर सबसे ज्यादा दुखी है बेचारा गूलर, जिसके नसीब में फूल बन कर इठलाना भी नहीं लिखा था। हाल में एक खबर पर नजर गई और वह अगर सच है तो गूलर को अपवित्र मान कर कांवरिया यात्रियों के रास्तों के किनारे से हटा देने के बारे में सोचा जा रहा है। क्या इन बेचारों को भी फल मानने वाली आखिरी पीढ़ी मेरी ही पीढ़ी रह जाएगी?

 

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