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दुनिया मेरे आगे: प्रकृति के लिए

इन सब चीजों का उपयोग सीमित हो या फिर अति आवश्यकता पर ही हो।

Author Published on: September 3, 2019 3:35 AM
चारों ओर हम वही होता देख रहे हैं, जो मनुष्य को नहीं करना चाहिए।

विकेश कुमार बडोला

मनुष्य जीवन अलग-अलग समय में अनेक परिवर्तनों से गुजरा, लेकिन दुनिया का पिछले पंद्रह वर्ष का परिवर्तन बेहद विचित्र है। ‘दुनिया का परिवर्तन’ से तात्पर्य व्यक्ति, परिवार, गांव, शहर, रिश्ते-नाते, दोस्ती-यारी, पर्व-त्योहार मनाने के उत्साह-उमंग में परिवर्तन से है। पिछले डेढ़ दशक के दौरान आदमी का जीवन, आदमी के मूल जीवन जैसा नहीं रहा। जो कुछ है, जैसा है, सब रफ्तार के हवाले है। लोगों को वाकई सांस लेने की फुर्सत भी नहीं। किसी से अपनापन, प्यार-प्रेम और संवेदना मिलने की उम्मीद तो अब बेमानी ही लगती है। धरती के एक छोर पर रह रहा आज का मनुष्य धरती के दूसरे कोने पर अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से किसी भी वक्त आसानी से संपर्क कर सकता है। इसके लिए उसके पास बहुत से संचार साधन मौजूद हैं। मोबाइल फोन, स्मार्टफोन से लेकर कंप्यूटर तक पर वीडियो कॉल, सोशल मीडिया के कई मंचों के माध्यम से सीधे संपर्क में रहने की सुविधाएं उपलब्ध हैं। पैसा है, सुविधाएं हैं, ऐश और आराम है, सब कुछ है। फिर भी एक बेचैनी है। एक विचित्र अस्थिरता है। अपनी भावनाओं को संभालने में बाधक कड़वे अनुभवों का संघर्ष है।

यह सब कुछ व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के साथ आत्मीयता से संवाद नहीं करने दे रहा। न चाहते हुए भी लोग ऐसी अंधेरी-संकरी गुफा में घुसते जा रहे हैं, जहां से एक आदर्श मानव के रूप में वापस आना उनके लिए असंभव जैसा हो चुका है। चारों ओर हम वही होता देख रहे हैं, जो मनुष्य को नहीं करना चाहिए। मनुष्य का दंभ इतना अधिक है कि वह अमर प्राकृतिक प्रतीकों- सूरज, चांद, सितारों, पृथ्वी और इसके वन-वनस्पतियों के प्रति भी विनम्र नहीं है। अपने होने, सांस लेने, जीवन में मौजूद होने और जिंदा रहने के इन प्राकृतिक कारकों के लिए मनुष्य के मन में मान-सम्मान नहीं। जहां उसका आधा जीवन इन प्राकृतिक घटकों की सुंदरता, विचित्रता, विडंबना पर विचार करते हुए व्यतीत होना चाहिए था, वहां उसका जीवन कीड़ों से भी बदतर स्थिति में रेंग रहा है।

ऐसी स्थिति में आखिर जीवन किस तरह आधुनिक हो रहा है! क्या आधुनिकता यही है कि तरह-बेतरह की चीजों का उपभोग करके धरती को प्लास्टिक के कूड़े के ढेर में बदल दिया जाए? फिर उचित निपटान न होने पर उस कूड़े में आग लगा दी जाए और आग से उठने वाले भारी, सड़े, तमाम दुर्गंधों से दम घोंट रहे धुंए में जीवन को घुटते हुए देखा जाए? निम्न स्तरीय राजनीति, मूर्ख राजनेताओं, भ्रष्ट-दुष्ट कर्मचारियों और विचारशून्य लोगों वाले किसी देश-समाज में जीवन भला ठीक हो भी कैसे सकता है! ऐसे वातावरण में अच्छा सोचने और अच्छा काम करने वाले हैं ही कितने, जो उनकी प्रेरणा से सब ठीक हो जाएगा! जिधर देखिए, उधर लालची नजरें पसरी हुई हैं। किसी को शांति, संतुष्टि नहीं चाहिए। सभी को भागना है। यहां से वहां, वहां से यहां। अंतिम उद्देश्य क्या है, यह जाने बिना, बस भागना है। इसलिए सब भागे जा रहे हैं।

हमें खुद को देखना होगा और आत्मपरीक्षण करना होगा। अपने मानसिक स्वास्थ्य के बारे में सोचना होगा। क्या हम खतरनाक तरीके से कुंठित और अव्यवस्थित नहीं हो चुके हैं? कई बार ऐसा लगता है कि हमारी सोचने की शक्ति बिलकुल नहीं बचीं! कुछ सोचने से पहले ही हम गुस्से में बोलने लगते हैं। बल्कि अपना बोला गया हमें भी याद नहीं रहता। यह प्रतिदिनि का एक अभ्यास हो गया है कि हमें गुस्से में कुछ बोलना है। यह सब इसलिए हो रहा है कि हमने अपने प्राकृतिक जीवन को आधुनिक रंग में रंग लिया है। मोबाइल, मोटरसाइकिल, टेलीविजन के व्यर्थ नाटकों से खुद को चिपका दिया है। आधुनिक जीवन का दुरुपयोग दो देशों के बीच परमाणु युद्ध होने और प्राकृतिक आपदाओं के रूप में तो बाद में होगा, पर मोबाइल, मोटरसाइकिल, टेलीविजन, कंप्यूटर और इंटरनेट के आगे खुद को समर्पित कर देने के रूप में यह पिछले आठ-दस वर्षों से खतरनाक तरीके से हो ही रहा है।

अभी भी समय है। एक उपाय है जिससे हमारा जीवन सरल, शांत और प्राकृतिक तरीके से बचा रह सकता है। हमें आधुनिक उपकरणों और सुविधाओं पर निर्भर रहने की अपनी आदतें धीरे-धीरे कम करते हुए एक दिन पूरी तरह खत्म करनी होंगी। इसके लिए हमारा मार्गदर्शन देश, नेता, पूंजीपति, व्यवसायी, संस्थान, विद्यालय या हमारे महत्त्वाकांक्षी माता-पिता नहीं करेंगे। ये लोग इसलिए मार्गदर्शन नहीं करेंगे कि आधुनिक उपकरणों और सुविधाओं पर हमारे निर्भर रहने से इनके आर्थिक-सामाजिक स्वार्थ जुड़े हैं। जो कुछ करना है हमें खुद करना है। जिन लोगों की मजबूरी है, उनका तो समझ आता है, पर जिन्हें मोबाइल, मोटरसाइकिल, टेलीविजन, इंटरनेट आदि वस्तुओं-सेवाओं से कोई काम नहीं, वे क्यों इन्हें अपने गले की फांस बना रहे हैं, यह समझ से बाहर है। इन सब चीजों का उपयोग सीमित हो या फिर अति आवश्यकता पर ही हो। जब ऐसा होगा, तभी हम अपने-अपने जीवन को प्राकृतिक व्यवस्था के अनुरूप जी सकेंगे और साथ ही प्रकृति को बचाने में भी अपना सहयोग दे सकेंगे।

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