दुनिया मेरे आगे: पर्यावरण के हक में

भारत तीज-त्योहार और उत्सवों का देश है। जगह-जगह मंदिर निर्मित किए गए हैं। इनमें पूजन प्रसाद का वितरण प्लास्टिक की थैलियों, कटोरिया और ग्लासों में किया जाता है। भक्त और दर्शनार्थी इस प्रसाद को श्रद्धापूर्वक ले तो लेते हैं, लेकिन प्रसाद को खाने के बाद लापरवाही से सड़क पर फेंक देते हैं।

प्लास्टिक की थैलियां, बोतलें और डिब्बे अधिकतर घरों में बार-बार धोकर उपयोग में लाए जाते हैं।

राकेश सोहम

एक साहित्यिक विमर्श के दौरान इस बात पर चर्चा हुई कि सड़क के किनारे पन्नी खाती गाय को देख कर ख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने उसे अपने व्यंग्य में उकेरा है। वह स्थिति आज भी उतनी ही गंभीर बनी हुई है। पन्नियां घटी नहीं, बल्कि बढ़ती ही गर्इं और आए दिन शहरों में न जाने कितनी ही गायें पन्नियों को खाकर बीमार होती हैं या फिर मर जाती है। आज इसके खिलाफ की जाने वाली तमाम बातों के बावजूद हालत में कितना बदलाव आया है। मेरे दिवंगत पिता पशु चिकित्सक थे। मुझे याद है कि उन्होंने कितनी ही गायों का आॅपरेशन करके पेट से पन्नियों का ढेर निकाले जाने की चर्चा की थी। आश्चर्य है कि गाय को लेकर आम लोग कई बार हमलावर होने की हद तक संवेदनशील होते हैं, लेकिन पन्नी खाकर उनके मरने को लेकर उन्हें कोई फिक्र नहीं होती। अधिकतर लोग बाजार से खरीदारी करने के बाद सामान के लिए पन्नियों का ही उपयोग करते हैं। हर रोज शाम को हाथ हिलाते हुए बिचरने जाते हैं और लौटते वक्त दोनों हाथों की पांचों अंगुलियों में सब्जियों से भरी पन्नियों की थैलियां घर लाते हैं।

हमारी परंपरा में चीजों के बारंबार उपयोग में विश्वास है। अक्सर ‘यूज एंड थ्रो’ यानी ‘इस्तेमाल करो और फेंक दो’ वाली चीजों का भी हम बार-बार उपयोग करने से नहीं चूकते हैं। प्लास्टिक की थैलियां, बोतलें और डिब्बे अधिकतर घरों में बार-बार धोकर उपयोग में लाए जाते हैं। देश में पॉलिथीन की थैलियों का प्रयोग बढ़ता ही जा रहा है। थोड़ी-सी सुविधा के चलते लोग कपड़े से बने थैलों की अपेक्षा पॉलिथीन की थैलियों को ज्यादा उपयोगी समझ रहे हैं और धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं। पूरे विश्व में प्रति मिनट कितना प्लास्टिक कचरा इकट्ठा होता है, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह तकनीकी जानकारी भी देना उचित नहीं लगता कि कितने माइक्रोन की पॉलिथीन का उपयोग करना चाहिए। दरअसल, उपयोगकर्ता चाहे कितना ही पढ़ा-लिखा क्यों न हो, इतनी निपुणता नहीं रखता कि वह नियत माइक्रोन की पॉलिथीन की बनी थैलियों को चुनाव कर सके। इसलिए प्लास्टिक को पूरी तरह ‘न’ कहा जाए, इस बात पर जोर दिया जाना ज्यादा जरूरी है। अब इसके व्यापक नुकसानों और पर्यावरण पर घातक असर को देखते हुए राजनीतिकों की ओर से भी इस पर पाबंदी की बातें की जाने लगी हैं, लेकिन सच यह है कि पर्यावरणविद लंबे समय से इस बारे में देश और समाज को चेतावनी देते रहे हैं। अगर वक्त रहते देश के राजनीतिक वर्ग और समाज ने इसके प्रति कोई ठोस संकल्प नहीं लिया, तो आने वाले वक्त में इसका भयावह खमियाजा उठाना पड़ सकता है।

कुछ समय पहले एक खबर आई थी कि कचरे के ढेर से अपनी भूख मिटाती गायें अचानक बीमार पड़ गर्इं। खाना-पीना बंद कर दिया था, उनके पेट बुरी तरह फूल गए थे और फिर कई गायों की तड़प-तड़प कर मौत हो गई थी। गायों का जब पोस्टमार्टम किया गया तो पता चला कि उनकी आहार नलिका पॉलिथीन की थैलियों से बुरी तरह अवरुद्ध हो गई थी। आॅपरेशन से जो थैलियों का कचरा आंत से निकाला गया, उनमें से अधिकतर थैलियों में घरों से फेंका गया अतिरिक्त खाना अब भी सुरक्षित था। ऐसा केवल इसलिए हुआ कि लोग घर लाई गई पॉलिथीन की थैलियों को फेंकने के पहले उनमें घर की अतिरिक्त खाद्य सामग्री, फलों या सब्जियों के छिलके आदि को भर कर रख देते हैं। फिर इसको पोटलीनुमा बना कर फेंक देते हैं। कचरे के ढेर से अपनी भूख मिटाते जानवर इन पोटलियों को साबुत निकल जाते हैं।

भारत तीज-त्योहार और उत्सवों का देश है। जगह-जगह मंदिर निर्मित किए गए हैं। इनमें पूजन प्रसाद का वितरण प्लास्टिक की थैलियों, कटोरिया और ग्लासों में किया जाता है। भक्त और दर्शनार्थी इस प्रसाद को श्रद्धापूर्वक ले तो लेते हैं, लेकिन प्रसाद को खाने के बाद लापरवाही से सड़क पर फेंक देते हैं। इनमें बचा हुआ प्रसाद जानवरों को आकर्षित करता है और वे उसे निगल लेते हैं। कमोबेश सभी पर्यटन स्थलों की स्थिति भी ठीक नहीं है। मैं पांच साल मुंबई में पदस्थ था। एक सपना लेकर गया था कि गेटवे आॅफ इंडिया से खूबसूरत नीले समुद्र को निहारूंगा। लेकिन वहां की हालत देख कर सारे सपने टूट गए। मुंबई के अधिकतर समुद्र तट पानी की खाली प्लास्टिक के बोतलों से अटे पड़े थे। ज्यादातर पर्यटक लापरवाही से खाली बोतलें समुद्र में उछाल देते हैं। मुझे किसी फिल्म का एक वीभत्स दृश्य याद आता है, जिसमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के सिर पर पॉलिथीन की थैली इस तरह पहना देता है कि उसकी सांस अवरुद्ध हो जाती है। उखड़ती सांसों के साथ फूलती-पिचकती पॉलिथीन देख कर जी दहल जाता है। तो क्या हम मनुष्यों का जीवन भी इसी तरह प्लास्टिक की पन्नियों के अंधाधुंध प्रयोग से अवरुद्ध हो जाएगा? क्या अब चेतने का समय नहीं आ गया है?

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