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दुनिया मेरे आगे: किसान का दुख

गाय के आस्था से जुड़ जाने की वजह से दिनोंदिन समस्या और जटिल होती जा रही है। सड़कों पर घूमते पशुओं के कारण दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। किसानों की फसलें नष्ट हो रही हैं।

Author Updated: August 26, 2019 4:55 AM
पुलिस की तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

कमल कुमार

उस दिन सड़क पर गाड़ी चलाते हुए ड्राइवर ने अचानक ब्रेक लगाया था और मैं उछल कर आगे की सीट से टकराई थी। मैंने पूछा कि क्या हुआ तो पता चला कि अचानक एक गाय सड़क के किनारे से बीच में आ गई थी। खिड़की से देखा तो आसपास से लेकर बीच सड़क पर और इधर-उधर कई गाय बैठी या घूमती नजर आ रही थीं, जो सड़कों पर यातायात के लिए मुसीबत बनी हुई थी। ड्राइवर बता रहा था कि इनकी वजह से सड़कों पर होने वाले हादसे बढ़ गए हैं। मुख्य मार्गों पर और यहां तक कि बाड़ लगाने के बावजूद एक्सप्रेस-वे पर भी कई बार गायों के झुंड कब सामने आ जाएं, पता ही नहीं होता, जहां गाड़ियां सौ या इससे भी ज्यादा की रफ्तार से जा रही हैं। ऐसे में अचानक ब्रेक लगाने से क्या होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है। सवाल है कि इतनी गाय सड़कों पर क्यों दिखने लगी हैं।

दरअसल, आमतौर पर जब गाय दूध देना बंद कर देती है तो उन्हें उनके पालक ऐसे ही इधर-इधर छोड़ देते हैं। ऐसे में उनके खाने का खर्च कौन उठाएगा! ग्रामीण इलाकों में और ज्यादा बुरा हाल है। लावारिस गायों के झुंड खेतों में घुस कर पूरी फसल नष्ट कर देते हैं। किसान क्या करेगा! जिनके खेत छोटे हैं, वे किसी तरह कंटीली बाड़ लगा लेते हैं, लेकिन जिनके पास सौ बीघा या उससे ज्यादा जमीन है, वे क्या करें! किसान घबरा कर इन्हें हांक कर कभी स्कूल में छोड़ आते हैं, कभी अस्पताल में भेज देते हैं। यहां तक कि कई बार कलक्टर के दफ्तर की ओर भी हांक देते हैं।

गाय अगर बछिया देती है तो ठीक है, लेकिन बछड़ा देती है तो मुसीबत, क्योंकि अब किसान भी खेतों में बैल से हल नहीं चलाते! किराए पर ट्रैक्टर ले लेते हैं। नतीजतन, इन बछड़ों से भी छुटकारा पाना है। इसलिए किसी तरह उन्हें ट्रक में लाद कर गांव से आठ-दस किलोमीटर दूर छोड़ आते हैं। गोहत्या से संबंधित कानूनों की वजह से इनकी ब्रिकी भी नहीं होती। फिर गौरक्षकों के भय से इन्हें एक जगह से दूसरी जगह नहीं लाया या ले जाया जा सकता। गौशालाएं पर्याप्त नहीं हैं। जो हैं, उनका प्रबंध ठीक नहीं है। वे कभी गंदगी के कारण बीमारी से मरती हैं, तो कभी पूरा दाना-पानी न मिलने से मर जाती है। इस सबके मद्देनजर गौशाला अभ्यारण्य भी बनाया गया। पर जंगल में उनकी देखभाल कैसे हो। वहां से गायों के गायब होने की भी खबरें आर्इं। कहां गर्इं, किसी को पता नहीं चला।

इस मसले पर जिम्मेदारी पुलिस को भी जिम्मेवारी सौंपी गई और जिला कलक्टर को उत्तरदायी बनाया गया। जिस पुलिस को कानून व्यवस्था संभालनी थी, वह गायों के पीछे भागने को मजबूर होती है। हमारा देश कृषि प्रधान रहा है। कृषि मुख्य कारोबार है और हाल तक पशुपालन सहायक कारोबार होता था। गांवों में गाय, बैल, हल, तालाब पूरी खेती का आधार थे। बैल खेतों में हल चलाते थे। अनाज बैलगाड़ियों में मंडी तक ले जाया जाता था। बैलगाड़ी यातायात व्यवस्था का एक जरूरी हिस्सा थी। गाय सिर्फ दूध के लिए ही नहीं, बल्कि उसके गोबर से उपले बना कर र्इंधन के रूप में उपयोग होता था। गोबर घर के फर्श की पुताई के काम आता। पता नहीं, आम लोग भैंस और बैल के गोबर के बारे में क्या राय रखते हैं! लेकिन गायों को घर के एक सदस्य के तौर पर देखा जाता रहा है।

मगर अब समय और परिवेश बदल गया है। कल तक जो हमारे लिए महत्त्वपूर्ण था और जिस पर जीवन निर्भर था, आज उसका महत्त्व नहीं रहा। खेत की जुताई के लिए बैलों की जरूरत नहीं रही। इसलिए बछड़े नहीं चाहिए। गाय दूध देना बंद कर दे तो उसे रखने की मुसीबत! उसका खर्च किसान कैसे उठाएं? गौरक्षा कानून और गोरक्षकों के भय से एक वर्ग का धंधा बिल्कुल चौपट हो गया। दूसरी तरफ बेकार पशुओं की संख्या गांवों में बढ़ती जा रही है, जो अब एक आपदा का रूप लेने लगी है। पशुओं के झुंड के झुंड खेतों में घुस कर फसल नष्ट कर देते हैं और किसान हताश होने के सिवा कुछ नहीं कर पाता।

इस समस्या का समाधान क्या हो, यह दूर-दूर तक नजर नहीं आता। गाय के आस्था से जुड़ जाने की वजह से दिनोंदिन समस्या और जटिल होती जा रही है। सड़कों पर घूमते पशुओं के कारण दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। किसानों की फसलें नष्ट हो रही है। प्रकृति में सदैव एक संतुलन रहता है। सामाजिक व्यवस्था भी इस संतुलन पर निर्भर करती है। जब किन्हीं कारणों से धार्मिक या सामाजिक संतुलन बिगड़ता है तो समाज की समरसता नष्ट हो जाती है। बढ़ती जा रही बेकार पशुओं की आबादी इस समस्या को दर्शा रही है। पर इसका समाधान क्या होगा, कैसे होगा, यह एक अबूझ पहेली बन गया है।

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