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दुनिया मेरे आगे: मुक्ति की चाह

कभी ढाई साल की तो कभी सात साल की मासूम बच्चियां, सभी कमजोर तबकों की, जिनकी हत्या या बलात्कार के वक्त कुछ भी सोचना जरूरी नहीं समझा जाता। ठिकाना कोई भी हो सकता है- धार्मिक स्थान के रूप में मंदिर तो कहीं कचरा फेंकने की जगह।

Author July 2, 2019 1:26 AM
अलीगढ़ में ढाई साल की मासूम के मर्डर केस को लकर कैंडल मार्च में शामिल लखनऊ विश्वविद्यालय के विद्यार्थी। (फोटोः पीटीआई)

राजकुमारी

हट्टे-कट्टे, मरियल लोगों या नाबालिगों की हिंसा का मर्दाना और विकृत होना- यह सब मिल कर दिनोंदिन इंसानों को हैवानियत की तरफ धकेल रहा है। जन्म से ही समूची स्त्री जाति के अपकर्ष का नवीन इतिहास रोज रचा जाता है। स्त्रियों के खिलाफ हो रहे शारीरिक शोषण, बोलचाल तक में भद्दे और स्त्रीलिंग से जुड़े अपमानजनक अपशब्द कुल मिला कर महिलाओं को हीन भाव से ग्रस्त करते हैं। कानून के जरिए मुस्टंडे, आवारा लोगों का इलाज किया जा रहा है, लेकिन मुश्किल यह भी है कि कई बार स्त्रियां इस हालात में विरोध नहीं कर पाती हैं। इससे इतर, अगर औरतें पुरुषों से इसके विरोध की पहल की बाट जोह रही हैं, तो वे भ्रामक स्थिति में हैं।

दरअसल, यह या हमारा समूचा सामाजिक व्यवहार और दिमागी खेल पितृसत्तात्मक व्यवस्था में पले-बढ़े मनोविज्ञान की देन है। महिलाओं के खिलाफ बलात्कार जैसे अपराध संक्रमणशील बीमारी की तरह बन कर समाज के शरीर में तेजी से फैल रहे हैं। नतीजतन, यौन कुंठाओं से उपजे और संचालित उन्माद, जाति और धर्म के चलते बदले की भावना, महिलाओं पर छींटाकशी, पुरुष का स्त्री के प्रति भोग्या और अवमानना का भाव तेजी से बढ़ रहा है। आज हालत यह है कि स्त्री के लिए पुरुष गैरभरोसेमंद होता जा रहा है। लैंगिक निवृत्ति के कारण वासना में अंधे अपराधी पागलों की तरह बिना उम्र देखे बियाबान में कुत्तों की तरह बेटियों की बोटियां नोच डालते हैं। बर्बरता की कथाओं का अंत होने का नाम ही नहीं ले रहा। सच यह है कि हमें इसके पीछे सांप्रदायिकता की साजिशें भी नजर नहीं आतीं।

कभी ढाई साल की तो कभी सात साल की मासूम बच्चियां, सभी कमजोर तबकों की, जिनकी हत्या या बलात्कार के वक्त कुछ भी सोचना जरूरी नहीं समझा जाता। ठिकाना कोई भी हो सकता है- धार्मिक स्थान के रूप में मंदिर तो कहीं कचरा फेंकने की जगह। अपराधी कोई भी हो सकता है- पंडित और मौलवी भी। कई बार ऐसा लगता है कि धार्मिक भावनाओं और सांप्रदायिकता को किसी ज्वलनशील पदार्थ की तरह प्रयोग में लाया जा रहा है। हो सकता कि हम गलत हों, लेकिन इन गंभीर मसलों को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। कारण कुछ भी हो, लेकिन बलि का बकरा स्त्रियां और यहां तक कि मासूम बच्चियां भी क्यों? रोज ही ऐसे समाचार सुन और पढ़ रहे हैं। कभी-कभार समाज में आक्रोश और उबाल दिखता है, लेकिन फिर वही ठंडापन। अब खुद महिलाओं को आगे बढ़ कर नफरत और हिंसक परिवेश को खारिज करना चाहिए। आक्रामकता की प्रतिस्पर्धा ने स्त्री के दमन के हालात ही पैदा किए हैं। अगल-बगल की खामोश नजरों के अवलोकन, सार्वजानिक कटाक्ष करने वाले बीमार मानसिकता वाले लोगों के बीच महिलाओं की घनीभूत पीड़ा और उसके संघर्षों का कोई अंत नहीं दिखता।

समाज किसी स्त्री के महिमामंडन में तो अक्सर देर कर देता है, लेकिन चरित्रहीनता का तमगा देने में वह जरा भी वक्त नहीं लगाता। कुदृष्टि, गाली-गलौज, अपमानित और व्यक्तित्व को खंडित करने वाले अपशब्द समाज की भाषा में घुले हुए हैं और इनका सहज प्रवाह कई बार महिलाओं के भीतर खुद ही खुद से घृणा-भाव पैदा कर देता है। प्रेम पूरी तरह खलास हो गया दिखता है। बहुत सारी महिलाओं के मन के मरुस्थल में मर्द जाति के लिए कैक्टस और कंटीली झाड़ियों के जंगल में नफरत की तल्ख भावना उभरती है। जीवन के रास्ते में उगी भावनाओं के दामन को उलझ कर रोकने वाली ये झाड़ियां जिन पुरुषों की बदौलत मिली होती हैं, उनका मार्ग अवरुद्ध क्यों नहीं करतीं? क्यों नहीं उमड़ता ये वेदना का समुद्र? क्यों उमड़ कर आत्महत्या की लहरों में अस्तित्व खो बैठते हैं? दरअसल, पुरुषों ने स्त्रियों के शोषण के शस्त्र बना रखे हैं। इस अचूक शस्त्र से स्त्रियों को हमेशा भयभीत रखा जाता है।

इसी तरह की यातनाओं के क्रम में औरतों का खून ग्लेशियरों-सा हो गया है। अब पिघलाना पड़ेगा इन ग्लेशियरों को, अन्यथा स्त्रियों को पेड़ों के तने से लटका दिया जाएगा या कहीं दफ्न कर दिया जाएगा। जरूरत इस बात की है कि स्त्रियां अपने जेहन से देवदासियों वाला युग भी धूमिल न होने दें। गौर से देखें तो पता चलता है कि अब राह चलती औरतों की चौकन्नी आंखों में भय तैरता रहता है। हर समय असुरक्षित होने का एहसास, अस्पष्ट बुदबुदाते वाक्यों को अनसुना करके और भद्दे, गंदी जेहनियत वाले पुरुष को अनदेखा कर उनका तेज गति से कदम बढ़ाना। यही सब चल रहा है। यह किसी के जीवन का दैनिक संघर्ष भी हो सकता है। क्या गुजरती होगी उन महिलाओं पर, यह सोच कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बलात्कार का शिकार होकर पहले कोई महिला दिमागी रूप से भयभीत होती है, फिर पुरुष आक्रांता से खौफ खाने लगती है। अब स्त्रियों यह समझना होगा कि जीना है तो लड़ना सीखो… बटोर लो अपनी आत्मशक्ति को! उसे संगठित कर खुद को महफूज करने के रास्ते तुम्हें खुद ही खोजने होंगे। अब दागदार मनसूबे वाले लोगों को रोकना होगा। आंखों में आंखें डाल कर, चुप्पी तोड़ कर अब मुंहतोड़ जवाब देने होंगे।

 

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