ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: मानवीय तकाजा

एक स्त्री, जिसका बच्चा अभी उसी के दूध पर आश्रित है, उसके लिए सार्वजनिक जगह पर कोई ऐसा इंतजाम नहीं है, जहां वह अपने बच्चे को दूध पिला सके। जबकि बच्चे के भूख से परेशान होने पर मां को तुरंत दूध पिलाना जरूरी होता है।

Author July 9, 2019 1:42 AM
महिलाएं दो स्तर पर संघर्षरत रहती हैं।

कौशलेंद्र प्रपन्न

महिलाएं दो स्तर पर संघर्षरत रहती हैं। उन्हें बाहर दफ्तर जाना होता है, दूसरी ओर बच्चा भी पालना होता है। घर पर या तो पति रुकता है या फिर ऐसे ही अन्य विकल्पों की तलाश करनी पड़ती है। दो फांक में बंटी हमारी महिलाएं दफ्तरी काम किया करती हैं। बच्चा बढ़ना नहीं रोक सकता। वह अपने समय और आयु के मुताबिक ध्यान भी मांगता है। ऐसे में नौकरी छोड़ने के उदाहरण पहले पक्ष से ही पाए जाते हैं। पति नौकरी पर जाता है। महिलाएं नौकरी छोड़ कर बच्चा पालती हैं। जब बच्चा एक या डेढ़ साल का होता है, तब उसका कहीं ठहरने का इंतजाम कर मां नौकरी करती है। वह भी अगर बची है तब। वरना नई नौकरी की तलाश।

अभिभावक तो रुक सकते हैं, लेकिन बच्चा किसी भी चीज के लिए इंतजार नहीं कर सकता। शिक्षा, भूख, सुरक्षा, जीवन आदि की आवश्यकताएं बच्चे को समय पर ही चाहिए। मसलन, अगर बच्चे को अभी भूख लगी है तो वह इंतजार नहीं कर सकता कि जहां जगह मिलेगी, वहां खाएगा। योजनाएं, नीतियां तो बनती रहेंगी, लेकिन बच्चे को जिस समय शिक्षा से लेकर सुरक्षा तक की आवश्यकता है तो उसे उसी वक्त मिलनी चाहिए। हमारे समाज में ऐसे लाखों बच्चे हैं, जो समय पर सुरक्षा और सहायता न मिल पाने की वजह से समाज की मुख्यधारा से कट जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अधिवेशन, 1989 में बच्चों के पांच अधिकारों की बात उठाई गई थी। उन पांच अधिकारों में सुरक्षा, विकास, सहभागिता आदि प्रमुखता से इंगित हैं। आंकड़े बताते हैं कि हर दिन बहुत सारे बच्चे नागर समाज के भूगोल से गुम हो जाते हैं। उनमें से बहुत कम बच्चे अपने घर वापस आ पाते हैं। बच्चे गुम होने के बाद जाते कहां हैं, कभी मंथन नहीं किया जाता। मां-बाप रोते-बिलखते रहते हैं। बच्चे कहीं काम पर होते हैं या फिर गलत गिरोह के हाथ लग जाते हैं।

लड़का-लड़की की समानता और सहभागिता की बात हमारा नागर समाज प्रमुखता से उठाता रहा है। तमाम दस्तावेज इसकी वकालत भी करते हैं। सतत विकास लक्ष्य से लेकर सहस्राब्दी विकास लक्ष्य में भी जेंडर समानता और सहभागिता की मांग और उसका लक्ष्य तय किया गया था। वह लैंगिक समानता सिर्फ शिक्षा नहीं, बल्कि समाज के हर मोड़ पर सुनिश्चित करनी होगी। बुनियादी मानवीय अधिकारों को भी शामिल करना होगा। इसमें शौचालय, पीने का पानी, शिक्षा आदि तो शामिल हैं ही, इसमें बच्चे को दूध पिलाने की जगह भी जोड़ना चाहिए। लड़के कितने आजाद होते हैं इस मायने में कि लड़कों को जब और जहां भी पेशाब करने की जरूरत महसूस होती है, वे किसी किनारे खड़े होकर कर सकते हैं। लेकिन इस मामले में घर या दफ्तर से बाहर लड़कियों की तकलीफ सिर्फ वही समझ सकती हैं। शायद ही कोई जगह महिलाओं के लिए अनुकूल है। इसका खमियाजा लड़कियों को भुगतना पड़ता है। उनके स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता है।

दूसरा मसला भी कम गंभीर नहीं है। एक स्त्री, जिसका बच्चा अभी उसी के दूध पर आश्रित है, उसके लिए सार्वजनिक जगह पर कोई ऐसा इंतजाम नहीं है, जहां वह अपने बच्चे को दूध पिला सके। जबकि बच्चे के भूख से परेशान होने पर मां को तुरंत दूध पिलाना जरूरी होता है। लेकिन उन मांओं के प्रति हम नागर समाज कितने संवेदनशील हैं, यह छिपा नहीं है। गौरतलब है कि कुछ महीने पहले एक मॉल में मैनेजर ने एक महिला को अपने बच्चों को दूध पिलाने से रोका था। उसने तो यहां तक कह दिया था कि जब बच्चा संभलता नहीं, दूध पीता है तो क्या घूमने आना जरूरी है? घर पर क्यों नहीं रहते? यह खबर सामने आने पर इस पर काफी बहस हुई थी। यह दीगर बात है कि वह घटना भी अन्य घटनाओं की तरह बिसरा दी गई।

लोग और राजनेता आदि क्या नहीं बेचते हैं! सपने, आंखें, रोजगार आदि। लेकिन आम जनता को जिन चीजों की आवश्यकता है, वे उनकी प्राथमिकता सूची में बाद में आती हैं। शहरों-महानगरों में बड़ी-बड़ी दुकानें, मॉल आदि बनाने में तेजी दिखाई जाती है, लेकिन बच्चे को दूध पिलाने की जगह बनाना जरूरी नहीं लगता। सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति सब जानते हैं। वहां की गंदगी महिलाओं की सेहत के लिहाज से जोखिम से भरी होती है। हालांकि इस मसले पर अदालत का आदेश आ चुका है कि शौचालयों का इस्तेमाल करने से कोई रोक नहीं सकता, वह चाहे पांच सितारा होटल हो या फिर कोई रेस्टोरेंट। मगर हकीकत कुछ अलग है। बाजार, दफ्तर या घूमने की तमाम जगहों पर जहां भी महिलाओं के आने-जाने की संभावना हों, वहां न केवल शौचालय, बल्कि बच्चों को दूध पिलाने की जगह भी होनी चाहिए। यह एक सभ्य समाज की कसौटी और मानवीय तकाजा है। किसी भी समाज और व्यवस्था में इसके लिए अपनी ओर से पहल की जरूरत है।

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App