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दुनिया मेरे आगे: दिखावे की जुबान

लोगों को तरह-तरह के शौक होते हैं। किसी तरह अंग्रेजी बोलना भी उनमें से एक है। कुछ लोग हैं जिन्हें अंग्रेजी का ज्ञान न होते हुए भी गाहे-ब-गाहे टूटी-फूटी अंग्रेजी में बात करने का चस्का लगा रहता है।

प्रतीकात्मक फोटो

लोगों को तरह-तरह के शौक होते हैं। किसी तरह अंग्रेजी बोलना भी उनमें से एक है। कुछ लोग हैं जिन्हें अंग्रेजी का ज्ञान न होते हुए भी गाहे-ब-गाहे टूटी-फूटी अंग्रेजी में बात करने का चस्का लगा रहता है। उन्हें इस बात की रत्ती भर भी फिक्र नहीं होती कि वे जिस अंग्रेजी में बोल रहे हैं, उसमें वाक्य शुद्ध है या नहीं या और उसका कोई अर्थ निकलता है या नहीं। बस अंग्रेजी के नाम पर कुछ शब्दों का प्रयोग जरूर हो। मुझे बरबस किसी पुरानी फिल्म का वह दृश्य याद आता है जब एक व्यक्ति गांव में काम न पाने की वजह से विदेश चला गया, लेकिन कुछ ही माह बाद वापस आ गया। लौट कर उसने विदेशी कपड़ों में गांव वालों के सामने टूटी-फूटी अंग्रेजी में रौब झाड़ना शुरू किया और अनपढ़ लोग उससे प्रभावित होकर उसे घूरने और विस्मित होने लगे। हालांकि गांव वालों को दो-चार शब्दों की अंग्रेजी भी बहुत लगती थी।

ऐसे ही एक अंग्रेजीदां शख्स थे, जिन्हें लोग नवाब साहब कहते थे। वे हमेशा ही अच्छे कपड़े पहने दिखते थे। वे भी इसी तरह अंग्रेजी के ऐसे शब्दों का प्रयोग करते थे, जिनका अर्थ बस वही जानते थे और वे ही समझा सकते थे। एक शब्द था ‘गोल्डनमैन’, जो वे किसी की तारीफ में कहते थे। पूछने पर पता चलता था कि वह शब्द वे किसी के अच्छे दिल का आदमी होने के लिए कह रहे हैं। ठिगने आदमी को वे ‘पॉकेट मैन’, लंबे को ‘लैडर मैन’ कहते थे और गोरे को ‘बटर मैन’। आस-पड़ोस के लोग उसके इस अंग्रेजी ज्ञान से हतप्रद और आश्चर्यचकित थे। क्या इन ‘ईजाद किए गए’ शब्दों का उनका अंग्रेजी में योगदान माना जाना चाहिए? एक अन्य सज्जन थे जो बंबई गए और वहां लगी एक अंग्रेजी फिल्म ‘सेम्सन ऐंड डिलाइला’ देखने गए। वहां जाकर बोले- ‘टू टिकिट डाउन फैन।’ लोगों ने कहा कि हॉल वातानुकूलित है और पंखा नहीं है। वे अड़े रहे, लेकिन आखिर भीतर गए। बाद में जब फिल्म खत्म हुई तो वे बोले- ‘वेरी टेस्टी मूवी… ‘समोसा एंड दही बड़ा’ टेस्टी मूवी।’ यानी ‘सेम्सन ऐंड डिलाइला’ अच्छी फिल्म है। लेकिन अर्थ जानने के लिए उन्हीं से पूछना पड़ा कि वे क्या कह रहे हैं?

जाहिर है, गलत अंग्रेजी उच्चारण के अलावा शब्दों का ज्ञान न होने की वजह से भी गलतियां सामने आती हैं। ऐसा नहीं है कि केवल अंग्रेजी में ही यह समस्या है। सभी भाषाओं में गलतियां नजर आती हैं। उर्दू बोलने के शौक में लोग कई शब्दों में फर्क नहीं करते हैं और महज एक नुक्ते की वजह से उसका अर्थ कुछ और निकल जा सकता है। हिंदी में भी लोग वर्तनी की गलतियां तो करते ही हैं, बोलचाल में भी अक्सर कह देते हैं कि आजकल मैं और मेरी पत्नी अकेली ही है। जब आप दो हैं, फिर अकेले कैसे हैं! ऐसे प्रयोग गलतियों में कम और स्थानीय प्रभाव में ज्यादा होते हैं। बिहार के लोग बिहारी प्रभाव में, उत्तर प्रदेश के लोग ब्रज के प्रभाव में और मध्यप्रदेश के लोग मालवी और बुंदेलखंडी प्रभाव में हिंदी लिखते और बोलते हैं। मराठी भाषी, खासकर पुणे के लोग भी शिकायत करते हैं कि उनकी भाषा की शुद्धता प्रभावित हो रही है।

भाषा की गलतियां कई तरह से सामने आती हैं। उच्चारण का दोष, शब्द ज्ञान का अभाव, क्रिया, कर्म, काल, विशेषण की जानकारी न होना और सही वाक्य न बना पाने की कमजोरी प्रमुख रूप से गलत भाषा का कारण होते हैं। दरअसल, आम आदमी की भाषा अलग रही है और विशिष्ट कहे जाने वाले संभ्रांत और पढ़े-लिखे लोगों की भाषा अलग। ऐसा अमूनन हर देश में हो रहा है। कभी इंग्लैंड में भी बोलचाल और आमजन की भाषा अंग्रेजी, फैशनेबल लोगों की भाषा फ्रेंच और बुद्धिजीवियों की भाषा ग्रीक व लैटिन थी। भारत में आज वही स्थिति अंग्रेजी की है। कहीं भी जाएं, अगर आप अंग्रेजी में बोलते हैं तो असर पड़ता है। भले वह अंग्रेजी गलत या कैसी भी हो। इंदौर के पास एक जगह है महू। इसका नाम द्वितीय महायुद्ध के दौरान अंग्रेज सैनिकों के लिए ‘मिलिट्री हेड क्वार्टर आॅफ वार’ के रूप में जाना गया था। वहां जो अंग्रेज और थोड़े बहुत आंग्ल भारतीय थे, उनकी सोहबत में जरूरत और मजबूरी में सब्जी बेचने वाले लोग भी टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलने लगे थे।

भाषा का ज्ञान एक सहज प्रेरित और पोषित प्रक्रिया है। इसकी शुरुआत घर से ही होती है। इसलिए हम घर पर ही बच्चों को ऐसा वातावरण दें कि वे भाषा के प्रति सचेत और जागरूक हों। अगर वे गलत देखेंगे और सुनेंगे तो गलत ही सीखेंगे। स्मार्टफोन के इस जमाने में जब एसएमएस और ट्वीट का जोर बढ़ रहा हो तो किसी भी भाषा की शुद्धता कायम रह पाना मुश्किल है। महज प्रभाव जमाने के लिए अंग्रेजी के शब्दों का जबरन प्रयोग करना जरूरी नहीं है। इससे कई बार हास्यास्पद स्थितियां ही पैदा होंगी।

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