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दुनिया मेरे आगे: अंधेरी राहें

ष्मावकाश में कुछ स्कूल और स्वयंसेवी संस्थाएं बच्चों और किशोरों के लिए ‘हॉबी क्लासेज’ यानी पसंद की कक्षाएं भी लगाती हैं। हालांकि इनका उद्देश्य अपनी संस्था का प्रचार-प्रसार करना अधिक और बच्चों में कलात्मक या खेलकूद संबंधी अभिरुचियों का विकास करना कम होता है।

Author Published on: June 19, 2019 1:34 AM
हमारे बच्चे हैरानी से ताकते हैं कि ऐसा भी होता था?

अतुल चतुर्वेदी

गरमी की छुट्टियां होते ही बच्चे शिकायत करने लगते हैं कि कहीं बाहर घूमने चलें। यह दर्द मित्रों और परिजनों के सोशल मीडिया पर निरंतर आती सूचनाओं, मनोहारी चित्रों और वर्णनों को देख कर और बढ़ जाता है। ऐसे में अगर आपके मोहल्ले और पड़ोस का कोई परिवार पहाड़ों पर जा रहा हो तो इस दुख के सागर की कल्पना ही की जा सकती है। दरअसल, पहले गरमी की छुट्टियां होते ही नानी के घर जाने का रिवाज-सा था। लेकिन पिछले कुछ दशकों में स्थितियां बदली हैं। अव्वल तो नानी के घर देश या परदेश में रहने के कारण इतने दूर हो गए हैं कि वहां जाना इतना आसान नहीं है। दूसरे, नानी के घरों में अब वे बातें और रोमांच नहीं रहा, जैसा पहले था।

खगोलीकरण ने सब घरों को लगभग एक जैसा बना दिया है। न नानी के घर में वैसे आम के बाग हैं, जहां अलसुबह उठ कर बच्चों के झुंड के साथ निकल जाया जाए और दिन भर आम तोड़ा जाए। वहां के कुएं पर नहाएं और फिर दोपहर चढ़ते तक लौटें। न वहां पर घर के बरामदे या आंगन में पड़े हुए झूले हैं और न छतों पर पानी छिड़क कर बिछावन पर रात में सोने का सुख। सच कहें तो आज की नानी खुद एक हद तक टीवी धारावाहिक और सोशल मीडिया के मोहपाश में जकड़ी हैं। उनके पास अपने बच्चों को सुनाने के लिए अनुभव और परियों की कहानियां भी नहीं हैं।

ज्यादा शिकायत करने पर बच्चों को मोबाइल, कंप्यूटर और टीवी के आगे कार्टून चैनल लगा कर बैठा दिया जाता है। लेकिन ऐसी सुविधाएं उनके अपने घर में भी मौजूद हैं। लिहाजा नानी के घर जाने का आकर्षण क्षीण हो रहा है। उसमें छिपा हुआ अनूठा अनुभव समाप्त हो रहा है। नानी के यहां जाने पर न तो बड़ के पत्ते पर मटके में कुल्फी बेचने वाला आता है, न दोपहर में चुस्की और फालसे बेचने वाला। सब जगह वही आइसक्रीम और बेकरी की दुकानें।

ग्रीष्मावकाश में कुछ स्कूल और स्वयंसेवी संस्थाएं बच्चों और किशोरों के लिए ‘हॉबी क्लासेज’ यानी पसंद की कक्षाएं भी लगाती हैं। हालांकि इनका उद्देश्य अपनी संस्था का प्रचार-प्रसार करना अधिक और बच्चों में कलात्मक या खेलकूद संबंधी अभिरुचियों का विकास करना कम होता है। आमतौर पर एक सप्ताह से दस दिन की इन कक्षाओं में न तो इतने उच्च स्तरीय प्रशिक्षक बुलाए जाते हैं और न ही विधा के बारे में व्यापक और गंभीर जानकारी दी जाती है। घूम-फिर कर बच्चों के सामने समस्या मुंह बाए खड़ी रहती है कि कहां जाएं और क्या करें!

कुछ स्कूल इतने सख्त होते हैं और परस्पर प्रतिस्पर्धा के चलते वे छुट्टियों के दिन के लिए भी इतना होमवर्क बच्चों को सौंप देते हैं कि अभिभावकों तक के माथे पर पसीना आ जाता है। इस चिंता और भाग-दौड़ में छुट्टियां कहां व्यतीत हो जाती हैं, पता भी नहीं चलता। जितना बड़ा शैक्षणिक संस्थान, उतना ज्यादा बच्चों पर काम का बोझ। असल में बच्चे हमारी प्राथमिकता सूची में कभी आए ही नहीं हैं, न आज कोई राजनेता नेहरूजी की तरह बच्चों से अनुराग रखने वाला बचा है।

बच्चों के व्यक्तित्व के ठोस विकास के लिए न कभी महिला एवं बाल विकास विभाग ने पुख्ता योजनाएं बनार्इं, न उन्हें इतनी फुर्सत है। बच्चों के मनोविज्ञान को समझने और उनकी अभिरुचियों को तराशने के लिए हमारे स्कूलों और स्वयंसेवी संस्थाओं के पास कोई स्पष्ट दृष्टि नहीं है। वे आज के सामाजिक, व्यावसायिक और राजनीतिक ढांचे के वैचारिक प्रदूषण को ग्रहण करते हुए बड़े हो रहे हैं। पढ़ने की आदत तो अब बड़ों में भी नहीं बची है तो बच्चों से अपेक्षा करना व्यर्थ है। मुझे याद है, पहले शहरों में बाल पुस्तकालय होते थे। गरमी के मौसम में बाल पत्रिकाओं ‘पराग’, ‘नंदन’ और ‘लोटपोट’ आदि के विशेषांकों की भारी मांग बच्चों के बीच रहती थी। पढ़ने से एक संस्कार और संवेदनाओं का विस्तार होता था।

आज सब कुछ ‘गूगल बाबा’ के हवाले है। इस आपाधापी में हम अपने अंतर्मन को खोजना शायद भूल गए हैं। हम भूल गए हैं कि हर बच्चे के अंदर भविष्य का एक कलाकार, लेखक या खिलाड़ी छिपा है, लेकिन हम उसकी अभिरुचियों को न तो पहचान रहे हैं और न विकास के लिए कोई मंच तैयार कर रहे हैं। वे ऊंचे नंबर तो ला रहे हैं, मगर एक जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक या बेटा या बेटी नहीं बन पा रहे। नानी और नाना के जरिए आती हुई अनौपचारिक शिक्षा का सूत्र भी अब बिखरा-बिखरा-सा लगता है। उस पगडंडी पर चलने की जहमत और धैर्य कितनों के पास बचा है और उस शानदार परंपरा को निभाने वाले व्यक्तित्व भी अब कहां हैं! अपने इतिहास के बारे में अज्ञान हमारी दुर्गति के लिए जिम्मेदार है, जिसके कारण हमारा समाज एक स्वार्थी, क्रूर और हिंसक समाज में तब्दील होता जा रहा है।

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