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दुनिया मेरे आगे: वर्चस्व की संस्कृति

इस समाज में ऐसी संरचनाओं को तोड़ने की जरूरत है, जिनमें दूसरे लोगों पर नियंत्रण और वर्चस्व का भाव निहित होता है। इसकी शुरुआत बुनियादी परवरिश से भी की जानी चाहिए। घर एक ऐसी संस्था है, जिसे एक ‘पवित्र संस्था’ की उपाधि दी गई है।

Author July 16, 2019 1:51 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

आरती मंगल

कई बातें ऊपर से देखने पर बिल्कुल साधारण लगती हैं, लेकिन अपने अंदर अनेक निहितार्थ लिए होती हैं। उनकी कल्पना और उनका विश्लेषण सामाजिक विकारों में तोड़फोड़ मचाने के लिए जरूरी है। ऐसे ही कुछ सामाजिक विकार या फिर सामाजिक हिंसा माता-पिता के व्यवहारों से परोक्ष संबंध रखते हैं। हमारे समाज में माता-पिता के अपने बच्चों पर आधिपत्य के भाव को अच्छे संस्कार के रूप में देखा जाता है और आदर्श बच्चे का मतलब माता-पिता के निर्देशों का बिना सवाल किए चुपचाप पालन करना है। अक्सर माता-पिता को अपनी तारीफ में यह कहते हुए सुना जा सकता है कि हमारा बच्चा फलां जगह जाना चाहता था, फलां विषय पढ़ना चाहता था, यह बनना चाहता था, फलां कपड़े पहनना चाहता था, मगर हमने तो एकदम मना कर दिया और मजाल कि वह अपने पापा-मम्मी या बड़े भाई-बहन की बात टाले या उनके कहे के खिलाफ कुछ भी करे!

इसके अलावा, ऐसी बातों में धीरे-धीरे शामिल होने लगती हैं कुछ ऐसी बातें भी- मेरे बच्चे ने ऐसा किया होता तो सूली पर टांग देता, पैर तोड़ देता, खाल उधेड़ देता, घर से निकाल देता वगैरह। अपने ही बच्चों की वाजिब हसरतों का गला सिर्फ इसलिए घोंट देना कि वे इस समाज में एक ‘आदर्श माता-पिता’ के रूप में बाकी अभिभावकों के सामने अपनी हैसियत ऊंची बना सकें, एक जुर्म तो है ही, साथ ही बेहद मतलबी और क्रूर व्यवहार है। ऐसा व्यवहार दूसरे माता-पिता पर भी वैसा ही करने का दबाव बनाता है। यह हैरानी की बात नहीं है कि कई बार ऐसी क्रूरता को भी बच्चे के हित में तो कभी बच्चे पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए या फिर बच्चे की बौद्धिक क्षमताओं पर शक के तौर पर सही ठहरा दिया जाता है। इस व्यवहार को सही ठहराने के लिए कई उदाहरण धर्मग्रथों से भी दिए जाते हैं। जबकि धर्मग्रंथों में अगर कभी किसी पुत्र या पुत्री के माता-पिता से विद्रोह के उदाहरण सामने आते हैं तो न सिर्फ उन पर चर्चा नहीं होती, बल्कि उन्हें क्रूर पुत्र या पुत्री के तौर पर देखा जाता है।

बहरहाल, अगर हमारे समाज में माता-पिता के ऐसे व्यवहारों को प्रेरणास्रोत के रूप में पेश किया जाता है तो मां-बाप द्वारा बच्चों को अंतरजातीय प्रेम या विवाह करने पर मार डालने पर या फिर बच्चों के आत्महत्या कर लेने पर जो शोर उठता है, वह दिखावे से ज्यादा और कुछ नहीं हो सकता। इस तरह का व्यवहार मानसिक हिंसा से शुरू होकर शारीरिक हिंसा तक कब पहुंच जाता है, पता भी नहीं चलता। इसके अलावा, बच्चों पर नियंत्रण और आधिपत्य जमाने का व्यवहार कब उनके बच्चों द्वारा भी सीख लिया जाता है, यह तब भी पता नहीं चलता जब दहेज हत्या, घरेलू हिंसा और बलात्कार जैसी घटनाएं रोज सामने आती हैं।

दरअसल, शारीरिक तौर पर किसी को अपने से कमजोर समझ कर उस पर नियंत्रण करने और आधिपत्य जमाने की मानसिकता ऐसे अपराधों का आधार होती है। मनोवैज्ञानिक शोधों में भी पाया गया है कि ऐसे लोग जो खुद धौंस का शिकार हुए होते हैं, उनके अपने जीवन काल में दूसरों पर धौंस जमाने की संभावना दुगनी से भी ज्यादा होती है। इसके साथ ही अपनी इच्छाओं को लगातार दबाते रहने से व्यक्तित्व में कोई न कोई विकार पैदा हो जाता है जो आगे चल कर या तो दूसरों के लिए या फिर अपने लिए ही खतरनाक साबित होता है।

नियंत्रण और बिना कुछ सोचे पूरी तरह आज्ञा का पालन बौद्धिक विकास की नजर से भी रुकावटें पैदा करता है। ऐसे में सामाजिक बदलाव लाने की संभावना भी जाती रहती है। बच्चे और किशोर वही सीखते हैं जो हमारा समाज सिखाता है। इसका पहला चरण माता-पिता स्थापित करते हैं। यह सीखना शब्दों से नहीं, व्यवहार से होता है और एक बच्चा भी इसके फर्क को अच्छे से समझ पाता है। विडंबना यह है कि इंसानों से प्रेम करना और उन्हें अपने बराबर समझना अभिभावकों द्वारा बच्चों को सिखाने वाली सूची में मुश्किल से ही शामिल हो पाता है।

इस समाज में ऐसी संरचनाओं को तोड़ने की जरूरत है, जिनमें दूसरे लोगों पर नियंत्रण और वर्चस्व का भाव निहित होता है। इसकी शुरुआत बुनियादी परवरिश से भी की जानी चाहिए। घर एक ऐसी संस्था है, जिसे एक ‘पवित्र संस्था’ की उपाधि दी गई है। इसी वजह से इसे सामाजिक शिक्षण से अलग कर दिया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि आधे से अधिक जुर्म न केवल घर की बंद दीवारों में किए जाते हैं, बल्कि अधिकतर घर से लेकर बाहर होने वाले अपराधों की जमीन भी यहीं पर तैयार होती है। माता पिता या अभिभावकों को सोचना चाहिए कि उनके बच्चे उनके गुलाम नहीं हैं और न ही उनकी हसरतों को गर्व हासिल करने का कोई जरिया मानना चाहिए। बच्चे भी एक जीवन हैं, उनकी अपनी इच्छाएं हैं, अपने सपने हैं। वे भी उतने ही मनुष्य हैं, जितने उनके माता-पिता। इसलिए उन्हें भी अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीने का हक है।

 

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