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दुनिया मेरे आगे: रटना बनाम सीखना

पढ़ने-लिखने को हमने एक यांत्रिक प्रक्रिया समझ रखा है। रटते हुए बच्चे अगली कक्षाओं तक पहुंच तो जाते हैं, मगर उनमें पढ़ने का हुनर विकसित नहीं हो पाता। बच्चों को वर्णमाला के इन अक्षरों में कोई अर्थ नहीं दिखता।

Author November 3, 2018 2:52 AM
प्रतीकात्मक चित्र

कालू राम शर्मा

जब मैं स्कूलों में जाता हूं तो अहसास होता है कि बच्चों के साथ शिक्षा जगत का दृष्टिकोण तोते जैसा होता है। इसलिए कि बच्चे कक्षाओं में वर्णमाला, गिनती-पहाड़े तोते की तरह रटते दिखते हैं। एक कहानी है। एक साधु ने अपने आश्रम में कुछ तोते पाले थे। साधु ने तोतों को पढ़ाया था कि ‘शिकारी आएगा, जाल फैलाएगा, दाना डालेगा, दाना खाना नहीं और जाल में फंसना नहीं।’ सभी तोते यही दोहराते। एक दिन साधु ने देखा कि उसके सारे तोते शिकारी के जाल में फंसे हुए हैं और वही दोहरा रहे हैं जो साधु ने सिखाया था। स्कूली व्यवस्था में हमारे बच्चों को भी शुरुआत से ही वर्णमाला, गिनती-पहाड़े रटने को बाध्य किया जाता है, लेकिन सीखना नदारद है। शिक्षक और पालक इस पर गर्व करते दिखते हैं। अगर आपका भरोसा निजी स्कूलों में अधिक है तो यह तय मान लीजिए कि वहां भी बच्चे इसी निरर्थक प्रक्रिया में लगे हुए हैं।

दरअसल, स्कूल समाज के सामने एक ऐसे स्थान के रूप में हैं जहां बच्चे सायास पढ़ना-लिखना, गणित, विज्ञान समाजशास्त्र वगैरह सीखेंगे और इससे भी ऊपर उन मूल्यों को आत्मसात करेंगे जो लोकतंत्र को पोषित करे और फिर वह समाज में प्रतिबिंबित होंगे। प्रारंभिक स्कूली शिक्षा का जोर इस पर होना चाहिए कि बच्चों को बुनियादी हुनर पढ़ने-लिखने आदि के लिए तैयार किया जा सके, जिनके दम पर आगे की शिक्षा की व्यूह-रचना की जाती है। लेकिन बच्चों में पढ़ने-लिखने की ललक पैदा नहीं हो पा रही है। स्कूल में बच्चों के साथ तोते की तरह वर्णमाला के नीरस और उबाऊ अक्षरों को रटने और उन्हें कॉपी में उतारने जैसी अर्थहीन प्रक्रियाएं चलती रहती हैं। इसके चलते बच्चे पढ़ने में अपेक्षित दक्षता हासिल नहीं कर पाते। फिर हमारे शिक्षा जगत में नवाचार की बांसुरी बजाई जाती है। वर्णमाला के अक्षरों पर आधारित गीत, पैरोडी बना कर नाच-गाना किया जाता है। सवाल इस बात का है कि क्या वर्णमाला के अक्षरों के गीत बना देने से या उन गीतों के हाव-भाव के साथ प्रदर्शन से बच्चे पढ़ना सीख जाएंगे?

एक अध्ययन के हवाले से बताया गया कि हमारे देश में तीसरी कक्षा के पच्चीस फीसद बच्चे ही छोटी कहानी पढ़ और समझ सकते हैं। ऐसे अध्ययन अक्सर होते रहते हैं और शीर्ष माने जाने वाले शिक्षा संस्थान इनका संज्ञान लेते हुए योजना बनाते हैं, फिर शिक्षकों के सिर पर उन योजनाओं को मढ़ देते हैं। शिक्षकों से अपेक्षा की जाती है कि वे चंद महीनों में बच्चों को पढ़ना सिखा कर मूल्यांकन रिपोर्ट पेश कर दें। जबकि राज्य की शीर्ष संस्थाएं जिलों और विकास खंडों में जितनी ऊर्जा स्कूलों में शिक्षकों को पढ़ना-लिखना आदि सिखाने को लेकर समर्थन नहीं देतीं, उससे कई गुना निगरानी और मूल्यांकन पर अपनी ऊर्जा जाया करती रहती हैं।

पढ़ने-लिखने को हमने एक यांत्रिक प्रक्रिया समझ रखा है। रटते हुए बच्चे अगली कक्षाओं तक पहुंच तो जाते हैं, मगर उनमें पढ़ने का हुनर विकसित नहीं हो पाता। बच्चों को वर्णमाला के इन अक्षरों में कोई अर्थ नहीं दिखता। हमारे शिक्षा जगत में यह बात व्यापक विमर्श में लानी होगी कि हमारा दिमाग अर्थपूर्ण चीजों को ही ग्रहण करता है। बच्चों को अनेक चीजें वे याद रहती हैं जो उन्हें रुचिकर लगती हैं। गली-मोहल्लों के रास्ते और यहां तक कि पेड़-पौधों की पत्तियों, फूलों, फलों और जीव-जंतुओं को लेकर भी बच्चों को अनेक बातें याद रहती हैं और वे उन्हें पहचान पाते हैं। स्कूली दायरे में बच्चों को हम अर्थहीन और उबाऊ प्रक्रियाओं में धकेल देते हैं। इसके चलते उनका सीखने से भी मन उचट जाता है। दरअसल, बच्चों को यह अहसास कराए बिना ही पढ़ने की प्रक्रिया में धकेल दिया जाता है कि क्यों पढ़ा जाए! ऐसा क्यों नहीं होता कि पढ़ने की जरूरत जगाई जाए। मसलन, कहानियों, कविताओं आदि में रचे-बसे रोमांच का आनंद कहानी से मिलता है। शुरुआती तौर पर कहानियां सुनाई जाएं, फिर उन्हें इस ओर अग्रसर होने दिया जाए। अगर यह बात बच्चों के दिलो-दिमाग में बस जाए और उन्हें पढ़ने के अवसर और संसाधन उपलब्ध करा दिए जाएं तो बेशक बच्चे पढ़ना सीखेंगे। पढ़ने की प्रक्रिया को बोझिल बना देने से बच्चे न केवल कक्षाओं में, बल्कि जीवन में भी पढ़ने से विमुख हो जाते हैं।

स्कूली बच्चों के पास केवल एक पाठ्यपुस्तक और चंद कॉपियों के अलावा और कोई साधन नहीं होते। बच्चों को पढ़ना सिखाने के लिए बाल साहित्य की व्यवस्था स्कूलों में करना और शिक्षकों को इसके लिए तैयार करना अगला कदम होना चाहिए। हमारे यहां स्कूलों में कक्षा पुस्तकालय की ओर बहुत ही कम ध्यान दिया गया है। मुझे याद आ रही है वह घटना जिसमें सडबरी वैली स्कूल के बच्चों को कभी किसी शिक्षक ने पढ़ने के लिए बाध्य नहीं किया। बल्कि बच्चों को पढ़ने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए गए। स्कूल में माहौल कुछ इस तरह का बनाया गया कि हर बच्चा उस स्कूल से पढ़ना सीख कर ही बाहर निकला।

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