ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः कोरोना कालीन कविता

कवि-लेखक का क्या धर्म होता है, यह कोई महाप्राण निराला से सीख सकता है। बेहद विपन्न हालत में रहने वाले इस महान कवि से जब इलाहाबाद में एक असहाय वृद्धा ने मदद मांगी, तो उन्होंने उसे ‘राम की शक्ति पूजा’ नहीं सुनाई, बल्कि उसे सारी रकम दे दी, जो एक प्रकाशक ने उन्हें दी थी।

कवि-लेखक का क्या धर्म होता है, यह कोई महाप्राण निराला से सीख सकता है।

प्रमोद द्विवेदी

एक मशहूर कविता की पंक्ति है- ‘किसी के घर की आग किसी की रोशनी होती है।’ फिर यह आग कैसी भी हो। अब पूरे देश में कोरोना की आग लगी है, तो कई नए-पुराने कवियों, गीतकारों तक काव्य-प्रकाश पहुंच गया है। फटाफट ऑडियो-वीडियो बन गए हैं। आवाज के नवीन अमीन सायनी सरगर्म हो गए हैं। फेसबुक पोस्टें लहलहा रही हैं। तारीफ में कमेंट पढ़ कर प्रतीत हो रहा है कि कोरोना और दुखदायी विस्थापन-बंदी को लेकर हुकूमत से ज्यादा चिंता इन शब्दसिद्ध प्राणियों को है। लग तो ऐसा रहा है कि पीड़ितों को राहत सामग्री से ज्यादा इन भाव भरी कविताओं की जरूरत है। यानी जब तारीख में जिक्रे-कोरोना होगा, इन आह से उपजी कविताओं को भी याद किया जाएगा। वैसे, अभी तक यह पता नहीं लग पाया है कि महामारी से मर्माहत इन कवियों और लेखकों ने इमदाद के नाम पर जेब से कुछ मुद्रा भी निकाली है, या फिर रचनाओं का फरहरा लहरा कर कह दिया है कि कवि-लेखक से पैसे की बात नहीं करो। शब्द उनकी अनमोल पूंजी है, यह चाहे जितनी लुटवा लो।

हालांकि यह सही है कि किसी भी आपदा पर कवि-कलाकार खामोश नहीं रह पाता। पर यह भी परम सत्य है कि जब जरूरत असहायों की मदद की हो, तो कविता और कला नहीं, सक्रिय मानवीय भूमिका काम आती है। बहुतों को, खासतौर पर सजग पत्रकारों को पुलित्जर से सम्मानित दक्षिण अफ्रीकी फोटोग्राफर केविन कार्टर की वह दिल दहलाने वाली तस्वीर जरूर याद होगी, जिसमें अकाल पीड़ित एक निरीह सूडानी बच्ची के पीछे गिद्ध घात लगाए चल रहा है। इस तस्वीर को पूरी दुनिया के अखबारों ने छापा था। नायाब छायाकार को पुलित्जर पुरस्कार मिला और अपार शोहरत भी। लेकिन यह ग्लानि उसे खाए जा रही थी कि वह शायद बच्ची को नहीं बचा पाया। अवश्य उस गिद्ध ने उसे खा लिया होगा। इस पछतावे के बाद उसने आत्महत्या कर ली। तब उसकी उम्र सिर्फ तैंतीस साल की थी।

कार्टर की मौत के बाद से यह सवाल लोगों को मथता रहा है कि पेशेवराना और लेखकीय प्राथमिकता के फेर में इतनी बेदिली और बेनियाजी कैसे आ जाती है। जब पीड़ित और आपदाग्रस्त जन को आपकी वास्तविक मदद की जरूरत होती है, तो आप महज फेसबुकिया आंदोलनकारी, कवि-लेखक और प्रवचनिया बन कर कैसे रह पाते हैं। अरे भई, वाकई उस परेशान इंसान को जरूरत आपके कुछ धन और जरूरी सामान की है। और आप मान लिए हैं कि हमने तो शब्द-धर्म निभा दिया। बाकी काम काव्य-कला-संगीत से विहीन जन करें।

हो सकता है, इन बातों से सच्ची-मुच्ची के कवि-लेखक और मित्रगण बिदक जाएं। पर यह लिखने की नौबत इसलिए आई कि इस त्रासद दौर में जब हमने अपनी संपन्न सोसाइटी में एक सहायता कोष बना कर दुखी लोगों की मदद का अभियान चलाया तो सहृदय नागरिकों ने बहुत निराश किया। हम चार लोग सिर्फ दस हजार रुपए जमा कर पाए, जबकि जिस वाट्सऐप समूहों से दान की अपील की गई, उससे सैकड़ों लोग जुड़े हैं। ये वे लोग थे, जो खानपान की एक सूचना पर सपरिवार उमड़ पड़ते थे। ये वही लोग थे, जिन्होंने राष्ट्र के लिए थालियां बजाई थीं। दीप जला कर अपने नागरिक धर्म की गवाही दी थी।
जाहिर है, इनमें फनकार, कलमकार से लेकर लेखाकार और तकनीक के माहिर लोग भी हैं। मदद के नाम पर इन्होंने एक ही काम किया। सबने पीड़ितों के दर्द से जुड़े दुर्लभ वीडियो ढूंढ़ निकाले। वाट्सऐप की महान फारवर्डिया धारा बहा दी। पर टेंट ढीली नहीं की। हमारा पेटीएम नंबर दानवीरों का इंतजार करता रहा।

सर्वव्यापी फेसबुक जगत ने तो कमाल कर रखा था। रहमतदारों को नजीर बना कर पेश करने वाले वीडियो भरे पड़े थे। फुरसतिया चिंतकों की नायाब टिप्पणियां सरकार को बता रही थीं कि उसने कहां चूक कर डाली। हिंदू-मुसलिम भी दनादन चल रहा था। दुनिया भर की महामारियों की कहानी बताई जा रही थी। अल्बेयर काबू के ‘प्लेग’ के अंश लोगों को पढ़ाए जा रहे थे। पर कोई यह नहीं बता रहा था कि परेशानहाल लोगों की मदद के लिए खुद उसने क्या किया।

कवि-लेखक का क्या धर्म होता है, यह कोई महाप्राण निराला से सीख सकता है। बेहद विपन्न हालत में रहने वाले इस महान कवि से जब इलाहाबाद में एक असहाय वृद्धा ने मदद मांगी, तो उन्होंने उसे ‘राम की शक्ति पूजा’ नहीं सुनाई, बल्कि उसे सारी रकम दे दी, जो एक प्रकाशक ने उन्हें दी थी।

खैर, अब न तो निराला जैसे योद्धा कवि-कलमकार हैं, न जनता के दुख-दर्द में बिना प्रचार के शरीक होने वाले खरे मानव। लेकिन आह-उत्प्रेरित कवि, लेखक इतना तो कर सकते हैं कि आज के भड़भड़िया और अगंभीर प्रचार मंच पर अपनी प्रतिभा की बेहया नुमाइश कुछ दिनों के लिए मुल्तवी कर दें। प्रतिभा दिखाने के लिए पूरा साल पड़ा है। हो सके, तो कुछ पैसा दान कर दें उन बेचारों के नाम, जिन पर उनकी कविताएं निछावर हो रही हैं।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: पत्ता पत्ता बूटा बूटा 
2 दुनिया मेरे आगे: इस अनुशासन पर्व में
3 दुनिया मेरे आगे: सहजीवन की दस्तक
ये पढ़ा क्या?
X