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दुनिया मेरे आगे: शोक और उत्सव का संगम

त्र मास के नवरात्र की सप्तमी रात्रि और मणिकर्णिका से जुड़ी एक और बहुचर्चित धारणा है कि जलती चिताओं के बीच पूरे साजो-शृंगार और सुर-लय-ताल पर घुंघरू बांधे थिरकतीं नगरवधुएं मोक्ष प्राप्ति की कामना और कलंक से मुक्ति के लिए स्वेच्छा से और खुशी से पूरी रात नृत्य करती हैं।

Author April 2, 2018 4:02 AM
सती के वियोग में शिव ने यहां तांडव नृत्य किया था।

पारुल तोमर

मणिकर्णिका बनारस का एक प्रसिद्ध घाट है। इस घाट के नाम के साथ बहुत ही रोचक और सुंदर कथा जुड़ी हुई है। एक मान्यता के अनुसार, जब आदि शक्ति स्वरूपा पार्वती, पिता से आक्रोशित सती हुई थीं, तब उनके कान का एक कर्णफूल और मणि इस स्थान पर गिर गए थे। फिर सती के वियोग में शिव ने यहां तांडव नृत्य किया था। इसी से इसका नाम मणिकर्णिका पड़ गया। इस घाट के साथ और भी कई मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। यहां मृत शरीर को अंतिम संस्कार के लिए इसलिए लाया जाता है कि माना जाता है कि यहां पर अंतिम संस्कार करने से मृत व्यक्ति को सीधे स्वर्ग में स्थान मिलता है। मणिकर्णिका घाट अनगिनत दुख-दर्द अपने अंतर में समेटे मोक्ष की कामना में दिन-रात जलता रहता है। जन्म और मृत्यु, सृष्टि का शाश्वत काल चक्र है। कोई भी जीव अजर और अमर नहीं है। जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु निश्चित है। मृत्यु से ज्यादा भयावह होता है मृत्यु बोध, जीवन को बहुत अधिक चाहने वालों में इसकी अधिकता अधिक होती है। चैत्र मास के नवरात्र की सप्तमी रात्रि और मणिकर्णिका से जुड़ी एक और बहुचर्चित धारणा है कि जलती चिताओं के बीच पूरे साजो-शृंगार और सुर-लय-ताल पर घुंघरू बांधे थिरकतीं नगरवधुएं मोक्ष प्राप्ति की कामना और कलंक से मुक्ति के लिए स्वेच्छा से और खुशी से पूरी रात नृत्य करती हैं। उस रात्रि उनके नृत्य का उद्देश्य अर्थोपार्जन कदापि नहीं होता है।

बात सत्रहवीं शताब्दी की है। एक बार राजा मानसिंह ने काशी में श्मशान के स्वामी भगवान शिव जो मसाननाथ के नाम से भी जाने जाते हैं, उनके लिए मणिकर्णिका घाट पर एक मंदिर का निर्माण कराया था । चैत्र नवरात्रि की सप्तमी रात्रि को राजा मानसिंह ने मंदिर पर संगीतोत्सव का आयोजन किया तथा उस समय के सभी प्रमुख और प्रसिद्ध संगीत घरानों और कलाकारों को मंदिर में स्वरलहरियां छेड़ने का निमंत्रण भेजा। जब शव और श्मशान के नाम मात्र से ही भय की उत्पत्ति होती है तब ऐसे में जलती चिताओं के बीच कौन और कैसे संगीत की धुनें छेड़ सकता था! अत: संगीत का कोई भी घराना राजा के निमंत्रण को स्वीकार नहीं कर पाया। राजा मानसिंह का मान रखते हुए नगर की समस्त नगरवधुएं उस रात्रि वहां पर उपस्थित हुर्इं। एक तट से दूसरे तट तक बहती गर्म राख की ढेरियां, जगह-जगह झिलमिलाती आग की चिनगारियां मोक्ष प्राप्ति की कामना में दहकती-धधकती चिताओं और मृत्यु की खामोशी के बीच श्मशान घाट पर नगरवधुओं के घुंघरुओं और ढोलक की थापों से गुंजरित वो रात्रि खास हो गई थी। जीवन की अंतिम मंजिल पर चिताओं की चटकती लकड़ियां और नगरवधुओं की स्वर लहरियां एक नई प्रथा को जन्म दे गर्इं। तब से यह परंपरा कायम है। उस दिन से माना जाता है कि चैत्र नवरात्रि की सप्तमी रात्रि को जो नगरवधुएं वहां पूरी रात नृत्य करती हैं, उन्हें अगले जन्म में नगरवधू के कलंक से मुक्ति मिल जाती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

लगभग साढ़े तीन सौ साल पुरानी इस परंपरा में वर्ष 2017 में चैत्र नवरात्रि की सप्तमी को इतिहास में एक कड़ी उस वक्त जुड़ गई, जब काशी कोकिला प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत गायिका ने अपनी उपस्थिति घाट पर दर्ज कराई। मणिकर्णिका घाट के लिए यह पहला अवसर था जब पद्मश्री डॉ सोमा घोष ने अपनी स्वरांजलि मानेश्वर को अर्पित की। डॉ सोमा घोष ने हर हर महादेव की धुनि से अपनी प्रस्तुति शुरू की। इसके बाद काली स्तोत्र, शिव तांडव और महादेव धुनि पर मसानेश्वर को स्वरांजलि अर्पित की। जैसे ही ‘हमरी अटरिया पर आजा रे सवारियां’ बोल डॉ सोमा घोष ने गुनगुनाना शुरू किया वैसे ही नगरवधुओं ने थिरकना शुरू किया। नृत्य और गायन की यह जुगलबंदी पूरी रात चलती रही। बाबा मसानेश्वर को रिझाने और इस नर्क जीवन से मुक्ति पाने की लालसा में नगरवधुएं पूरी रात टूट-टूट कर नाचती रहीं।

डॉ सोमा घोष ने लोकगीत चैती ठुमरी भी गाया। अगले जन्म में इस दुर्गति से मुक्ति मिलेगी इसी विश्वास से नगरवधुएं प्रत्येक वर्ष यहां आती हैं और अपनी नृत्यांजलियां मसानेश्वर को अर्पित करती हैं। इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए देश के अन्य हिस्सों से भी नगरवधुएं यहां आने लगी हैं। विदेशी पर्यटकों के लिए यह दृश्य अद्भुत और अविस्मरणीय रहा; उन्होंने पूरे विश्व में जीवन और मृत्यु का ऐसा अनूठा संगम पहले कभी भी नहीं देखा था। धधकती चिताओं के बीच मणिकर्णिका घाट पर मातम और उत्सव का संगम देख कर विदेशी पर्यटक भी आश्चर्य चकित थे। उनके लिए यह दृश्य किसी अजूबे से कम नहीं था।

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