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भाषा में हम

हम कौन हैं, यह इससे पता चलता है कि हम क्या सोचते हैं। और हम क्या सोचते हैं, यह हमारी अभिव्यक्ति से पता चलता है, जिसका एक बहुत महत्त्वपूर्ण जरिया भाषा है। अब हमारी भाषा में क्या शब्द हैं, उनकी कैसी ध्वनि है या वाक्यों का व्याकरण क्या है, यहां मेरा मकसद इन सब सवालों पर विचार करना नहीं है। मेरी निगाह में चिंता का विषय है, बोली जाने वाली भाषा के भाव, अर्थ और निहितार्थ।

Author December 25, 2018 3:57 AM
प्रतीकात्मक फोटो

आरती मंगल

हम कौन हैं, यह इससे पता चलता है कि हम क्या सोचते हैं। और हम क्या सोचते हैं, यह हमारी अभिव्यक्ति से पता चलता है, जिसका एक बहुत महत्त्वपूर्ण जरिया भाषा है। अब हमारी भाषा में क्या शब्द हैं, उनकी कैसी ध्वनि है या वाक्यों का व्याकरण क्या है, यहां मेरा मकसद इन सब सवालों पर विचार करना नहीं है। मेरी निगाह में चिंता का विषय है, बोली जाने वाली भाषा के भाव, अर्थ और निहितार्थ। बहुत से लोग कहते हैं कि अगर आपसी रिश्तों में भी बहुत सोच कर बोलना पड़े तो रिश्ते का क्या फायदा! लेकिन हम जो बोलते हैं, क्या वह हमारे मानस से बाहर की बातें होती हैं? बिना सोचे-समझे बोली जाने वाली बातें भी हमारे मानस में ही कहीं छिपी रहती हैं। इसीलिए वह जबान तक आ पाती हैं। इसीलिए चाहे हम संभल कर बोल रहे हैं या फिर बेझिझक, दोनों ही सूरत में यह हमारे विचार, दृष्टिकोण और व्यक्तित्व को दर्शाता है। अक्सर मुझे यह बात परेशान करती है कि हम बोली जाने वाली भाषा को इतने हल्के में क्यों लेते हैं। जबकि इसके जरिए लोगों पर होने वाले प्रभाव बहुत ही बड़े और कई बार गंभीर होते हैं। हम जिसे बिना सोचे-समझे बोली जाने वाली भाषा कहते हैं, अगर गौर देखा जाए तो उसमें बहुत-सी संकीर्णताओं और भेदभाव वाले विचार देखने को मिल जाएंगे।

हाल ही में मुझे एक छात्र ने बताया कि किस तरह उसने कुछ दूसरे छात्रों को बात करते हुए सुना था, जिसमें समाज में दलित तबके में आने वाली कुछ जातियों के नाम लेकर उनके प्रति उपेक्षा का भाव दर्शाया गया था। जाहिर है, उसमें उन जातियों के प्रति कमतर करने और एक तरह से नफरत या हिकारत का भाव था। बातचीत में उपेक्षा दर्शाने के लिए आने वाले दलित जातियों के नाम दरअसल अति जातिवादी और नकारात्मक हैं। ऐसी बात करने वाले वे छात्र उच्च शिक्षण संस्थानों से थे। अगर उन्हीं छात्रों से पूछा जाए कि क्या जाति के आधार पर भेदभाव होता है, तो वे कहेंगे कि अब ऐसा नहीं है। लेकिन उनकी बातचीत की भाषा कुछ और ही दिखा देती है। इसी तरह स्त्रियों को लक्षित करके किए गए मजाक लोगों के बीच बहुत प्रचलित होते हैं। न सिर्फ मजाक, बल्कि लिंग आधारित गालियां। अक्सर मुझे ऐसी गालियां सुनाई पड़ जाती है जो मां, बेटी या बहन को निशाने पर लिए होती हैं। फिर चाहे मैं सड़क पर चल रही हूं या फिर किसी शिक्षण संस्थान में। लिंग आधारित मजाक करने या गालियां देने वाले लोग आमतौर पर आपको स्त्रियों की मुक्ति और उसके अस्तित्व की बात करते हुए मिल जाएंगे। अगर शिक्षण संस्थानों की ही बात करें तो मैंने खुद ऐसी जगहों पर भाषा में वर्ग आधारित भेदभाव का अनुभव किया है। मसलन, किसी प्रोफेसर का यह कहना कि मुक्त विश्वविद्यालय या मुक्त प्रोग्राम से आने वाले विद्यार्थी ‘कूड़ा-कचरा’ हैं। इसके अलावा, विद्यार्थियों को ‘प्रोडक्ट’ कह कर उन पर ठप्पे लगाना।

भले ही इन सब उदाहरणों को यह कह कर नकारा जा सकता है कि ये बहुत ही मामूली चीजें हैं और ऐसा होता रहता है। लेकिन कुछ खास जातियों, एक खास लिंग, कुछ एक समुदाय या कुछ वर्गों को लेकर किसी खास तरह के मजाक और भाषा का प्रयोग हमारी गड़बड़ सोच का नतीजा हैं। यह खुद को प्रगतिशील बोलने के बाद भी हमारे मानस में कहीं छिपा हुआ है और जो इन्हीं मजाकों, इन्हीं प्रतीकों के जरिए दिखाई दे जाता है। भले ही इस तरह की भाषा बहुत आम लगे और कभी-कभी ‘बिना सोचे-समझे निकल जाने वाली’ लगे, लेकिन इन्हीं प्रतीकों के द्वारा किसी खास तरीके के विचारों को बल मिलता है। दुख की बात यह है कि पढ़े-लिखे लोगों द्वारा भी इस तरह की भाषा का उपयोग घटने के बजाय बढ़ने लगा है। वे यह अच्छे से जानते हैं कि जो वे कह रहे हैं, उसके क्या मायने हैं।

फिर भी वे उसी भाषा का इस्तेमाल करेंगे। क्या इसलिए कि ऐसी भाषा के आशय से उन्हें चोट नहीं लगती है? मुझे लगता है कि आजकल लोगों पर खुद को मजाकिया दिखाने और अपने दोस्तों द्वारा पसंद किए जाने का दबाव इस कदर छा गया है कि सब कुछ जानते हुए भी वे ऐसी भाषा का प्रयोग और ज्यादा करने लगे हैं। वे यह नहीं जानते कि ऐसी भाषा का प्रयोग करके वे खुद को अपने दोस्तों की एक भीड़ में शामिल कर लेंगे, लेकिन उस भीड़ में वे लोग नहीं मिल पाएंगे, जिनका वे मजाक बना रहे हैं। इस तरह सामाजिक भेदभाव की दीवारें ध्वस्त होने की जगह बढ़ती ही चली जाएंगी। भाषा हमें लगातार बनाती है। इसलिए जरूरी है कि धारणाएं बदलने के लिए अपनी भाषा में भी बदलाव किया जाए। कन्फ्यूशियस ने भी कहा है कि भाषा चीजों की सच्चाई के अनुरूप ही होनी चाहिए, वरना हमें उन चीजों से जुड़े हुए कार्यों में सफलता नहीं प्राप्त हो सकती। जाहिर है, धारणाएं बदलने के लिए हमारी भाषा का बदलना बहुत जरूरी है।

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