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दुनिया मेरे आगे: पढ़े-लिखे लोग

पढ़े-लिखे लोग आमतौर पर कम पढ़े-लिखे और अनपढ़ लोगों को हेय दृष्टि से देखते हैं, गंवार और अनपढ़ कह कर उनका मखौल भी उड़ाते हैं। कहीं किसी लाइन में खड़े होकर अपना काम कराना या अपनी बारी का इंतजार करना अपनी बेइज्जती समझते हैं।

Author March 16, 2019 3:31 AM
वे डिग्रियां बेकार हैं जो तहजीब नहीं सिखा सकतीं। (फोटो सोर्स : Thinkstock)

वर्षा

पढ़े-लिखे लोग, और उनमें भी वे अगर उच्च शिक्षा प्राप्त हों तो उन्हें और भी ज्यादा गर्व होता है अपने शिक्षित होने पर। जाहिर-सी बात है कि अपने पढ़े-लिखे होने पर खुश होना भी चाहिए, क्योंकि यह सब हासिल करना कोई आसान काम नहीं है। इसके पीछे दिन-रात की मेहनत, लगन और कठिन परिश्रम का हाथ होता है। जिस समय को काम की पढ़ाई नहीं कर पाने वाले लोगों ने किन्हीं वजहों से खेलकूद या फिर मौज-मस्ती में गुजारा होगा, वह समय अच्छी पढ़ाई करने वालों ने किताबों में माथापच्ची करते हुए गुजारा होगा। हालांकि यह हो सकता है कि उनके भीतर भी कहीं न कहीं मलाल रहता होगा मौजमस्ती नहीं कर पाने का। खैर, पढ़े-लिखे लोग अपने कठिन परिश्रम से वह सब हासिल कर लेते हैं, जिसकी उन्हें चाह होती है। वे ज्ञानीजन कहलाने लगते हैं या इस रूप में जाने जाते हैं। इसलिए समाज भी उन्हें सम्मान की नजरों से देखता है और उनसे उम्मीद करता है कि वे नियमों का पालन करेंगे, उनमें स्वार्थ नहीं होगा, उनकी सोच और आदर्श ऊंचे होंगे और उनका आचरण अनुकरणीय होगा।

लेकिन कई बार यह भी देखने में आता है कि पढ़ने-लिखने का चरित्र और सोच पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता। ऐसा तब महसूस होता है, जब कुछ पढे लिखे लोग नियमों को सिर्फ अपनी स्वार्थ की पूर्ति के लिए मानने से इनकार कर देते हैं। पढ़े-लिखे लोग आमतौर पर कम पढ़े-लिखे और अनपढ़ लोगों को हेय दृष्टि से देखते हैं, गंवार और अनपढ़ कह कर उनका मखौल भी उड़ाते हैं। कहीं किसी लाइन में खड़े होकर अपना काम कराना या अपनी बारी का इंतजार करना अपनी बेइज्जती समझते हैं। ऐसे लोग हर जगह खुद को विशेष तवज्जो दिए जाने की ख्वाहिश रखते हैं। इनकी दुनिया मैं, मैं और सिर्फ मैं तक सीमित रह जाती है। खुद से आगे ये कुछ नहीं सोच पाते।

ऐसे दृश्य आम हैं जिनमें बड़ी-बड़ी और लक्जरी गाड़ियों में बैठे सूट-बूट पहने लोग खिड़की का शीशा नीचे करके कचरा फेंकते हुए जरा भी नहीं झिझकते। अगर कोई इस पर सवाल उठाए तो उल्टे उस पर धौंस भी जमाने लगते हैं। खुद को सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा मानने वाले कुछ लोग कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ लोगों से खुद को श्रेष्ठ मानते हैं और उन्हें अपने पास तक नहीं फटकने देते, लेकिन खास नस्ल के कुत्ते पालना उनका शौक होता है और इसके लिए भी वे खुद को बाकी के मुकाबले श्रेष्ठ वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में पेश करते हैं। दूसरी ओर, सुबह-शाम उन कुत्तों को लेकर बाहर निकलते हैं तो पार्क या शहर की गलियों को गंदा कराते हुए नहीं हिचकते हैं।

इनमें से कुछ लोग अपने घर के सामने पार्किंग की जगह को पार्क या फूल लगाए जाने की जगह में तब्दील कर देते हैं और फिर अपनी कई गाड़ियों को दूसरे लोगों के पार्किंग क्षेत्र में खड़ी कर आते हैं। अगर कोई विरोध करे तो वे उन पर गुर्राते हैं। इन पर कोई फर्क नहीं पड़ता है जब इनका स्वार्थपूर्ण व्यवहार दूसरों के लिए तकलीफ का सबब बन जाता है। नियमों का हवाला देने पर ये उसकी धज्जियां उड़ा कर मानने से इनकार कर देते हैं। सड़क पर कहीं कोई दुर्घटना हो जाए तो कई बार ऐसे लोग अनदेखा करके गुजर जाते हैं, जबकि वहां से गुजर रहे कुछ वैसे लोग सब कुछ भूल कर मदद के लिए दौड़ पड़ते हैं, जिन्हें कम पढ़ा या अनपढ़ माना जाता है। पीड़ितों की सहायता करने से पहले वे एक पल के लिए नहीं सोचते कि वे किसी झमेले फंस सकते हैं। ऐसा इसलिए कि उनके भीतर मानवता होती है।

अक्सर मन में ये सवाल भी उठते हैं कि क्या उच्च शिक्षा और किसी जाति विशेष में जन्म लेना ही कुलीनता और सभ्य होने का पैमाना है? मैं ऐसा नहीं मानती। अगर किसी की शिक्षा उसे स्वार्थी होने से नहीं बचाती और नियम-कायदों का पालन करना नहीं सिखाती, उसके भीतर मानवीय गुणों का विकास नहीं करती है तो उस शिक्षित से भले वे अनपढ़ कहे जाने वाले लोग हैं जो स्वार्थहीन होते हैं, जिनकी सोच संकीर्ण नहीं होती है, उनके भीतर अहंकार नहीं होता। अगर किसी व्यक्ति की जाति उसकी सोच के दायरे को छोटा कर देती है तो वह व्यक्ति कमतर माना जाना चाहिए।

पढ़े-लिखे होने का एक सबूत यह होना चाहिए कि हमारी बोलचाल की भाषा शालीन और सभ्य हो। मगर कई बार पढ़े-लिखे कुछ लोगों की भाषा सुन कर कानों पर हाथ बरबस ही चला जाता है और आंखों में हैरानी के भाव उमड़ आते हैं। इस तरह के पढ़े-लिखे लोगों के बारे में खयाल आाता है तो कई बार सोचती हूं कि इन्होंने दुनिया को कुछ दिया होगा, लेकिन उससे बहुत कुछ ले भी लिया है। दरअसल, इंसान की शिक्षा उसके व्यवहार का आईना होती है। वे डिग्रियां बेकार हैं जो तहजीब नहीं सिखा सकतीं। वे डिग्रियां सिर्फ हमें पैसा दे सकती हैं, हमें सभ्य इंसान नहीं बना सकतीं।

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