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दुनिया मेरे आगे: नशे की राह

संवेदनाएं और उनकी अभिव्यक्ति मनुष्यता और पशुता की विभाजन रेखा है। हमारे आज के युवाओं के अंदर आत्मविश्वास है, पर धैर्य नहीं। किसी भी काम में तुरंत और मनोनुकूल परिणाम की आकांक्षा ने जीवन के संघर्ष की परिभाषा बदल दी है।

Author June 14, 2019 1:18 AM
बीते दिनों छापेमारी के दौरान फार्म हाउस में रेव पार्टी कर रहे 161 लड़के और 31 लड़कियां पकड़ी गईं। ( प्रतीकात्मक तस्वीर)

वंदना तिवारी

महानगरीय सभ्यता और संस्कृति धीरे-धीरे इतनी डरावनी और विकृत हो रही है कि मनुष्यता का दम घुट जाए। किसी भी समाज का भविष्य वहां के युवा होते हैं। आज युवाओं के बीच नशे का प्रचलन आम है। यह तब और भी दुखद हो जाता है जब इस तरह के नशे के केंद्र विश्वविद्यालय या शैक्षणिक संस्थान भी पाए जाते हैं। पिछले करीब दस सालों के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर के आसपास शराबखाने, बीयर बार, हुक्का बार आदि की काफी दुकानें खुल चुकी हैं। यह फैशनपरस्ती का नया मुकाम है। तेज आवाज, जिसे शोर कहना ज्यादा सही होगा। कम कपड़ों को आधुनिकता मान कर नशे में झूमते शरीर और भटकते मन अक्सर इन जगहों पर दिखाई देते हैं। स्कूल और कॉलेज में विद्यार्थियों के भीतर भविष्य के सुनहरे रंग भरे जाते हैं। लेकिन आजकल स्कूल और कॉलेज के छात्र और छात्राओं की ऐसी बड़ी तादाद है जो नशे के दलदल में फंसती जा रही है।

नशा शब्द की उत्पत्ति ‘नाश’ शब्द से हुई है। इस अर्थ की सापेक्षता में हम अंदाजा लगा सकते हैं कि इसका कुप्रभाव कितना गहरा और भयानक होगा। नशे के प्रति युवाओं का आकर्षण सहज न होकर कई बार फैशन के रूप में सामने आता है। शुरुआत में हम नकल करते हुए किसी नशे का स्वाद लेने की कोशिश करते हैं। उसमें दिलचस्पी जगने के बाद हम अक्सर उसका इस्तेमाल करने लगते हैं। धीरे-धीरे वह हमारी आदत में शुमार हो जाता है। संबंधों का अपनापन युवाओं में कमतर हो रहा है। तकनीकी वस्तुओं पर आधारित संवेदनाओं का आदान-प्रदान हमें मानवीय नहीं, मशीनी जीवन में परिवर्तित कर देता है।

संवेदनाएं और उनकी अभिव्यक्ति मनुष्यता और पशुता की विभाजन रेखा है। हमारे आज के युवाओं के अंदर आत्मविश्वास है, पर धैर्य नहीं। किसी भी काम में तुरंत और मनोनुकूल परिणाम की आकांक्षा ने जीवन के संघर्ष की परिभाषा बदल दी है। संबंध बनते हैं, पर टिकते नहीं, क्योंकि संबंध तो हैं, पर उनमें न संवेदना है और न समर्पण। अगर कुछ है तो सिर्फ समीकरण। इन सबका नतीजा है निजता का संकट और संवेदनात्मक असुरक्षा। इन परिस्थितियों में कभी किसी मामूली नशे की संगत में आते हैं और बाद में वही लत में तब्दील हो जाता है और धीरे-धीरे वह नशा हमें सुकून देने लगता है। नशा जीवन की मुख्यधारा से हमें विलग कर तात्कालिक रूप से भौतिक सुखों से जोड़ देता है। लेकिन उस सुख की प्रतिक्रिया बेहद नकारात्मक होती है।

पहले गांव में बड़े-बुजुर्ग के बीच हुक्के का प्रचलन था। इधर के कुछ वर्षों में फिर से हुक्के की आधुनिक शक्ल सामने आई है। इसकी जद में आए युवा हुक्के में नशीले पदार्थों को मिला कर धुएं के छल्लों में अपनी अमूल्य जिंदगी को तलाशते हैं। यह सोच और व्यवहार के बीच पसरा भ्रम ही है कि नशा मस्ती और खुशहाली के रूप में संज्ञापित होने लगा है। लेकिन सच यह है कि जीवन के संघर्षों से पलायन का नाम है नशा। यह हमें एक काल्पनिक लोक में ले जाता है जो यथार्थ से अलग होता है और मानवीय चिंताओं से दूर कर धीरे-धीरे हमारे आत्मविश्वास को निगल लेता है।

नशे में डूबते युवा वर्ग और उसके नतीजों के बेलगाम फैलाव को देखते हुए तो यही लगता है कि इसमें सरकार की मूक भागीदारी है। दरअसल, बाजार का अपना व्याकरण और समाजशास्त्र है। बाजार सिर्फ लाभ के अनुशासन को स्वीकार करता है। नशे के लिए बेची जाने वाले कई वस्तुएं बाजार के लिए काफी लाभप्रद हैं। सस्ती चीजों को आकर्षक रूप में परोस कर युवा पीढ़ी को लुभाना बाजार बेहतर तरीके से जानता है। अगर खुले शब्दों में कहें तो नशे से सबंधित चीजों का अचानक उभार युवाओं के बीच बाजार का एक प्रयोग जैसा है। लेकिन प्रश्न सिर्फ बाजार का नहीं है, हमारे सामाजिक और सरकारी उत्तरदायित्व का भी है। सरकार के न जाने कितने संस्थान और संगठन हैं, जो नशा मुक्ति के कार्यों में संलग्न हैं, लेकिन परिणाम चिंताजनक हैं। बिना सरकार की सहमति से खुलेआम नशे को प्रतिष्ठित नहीं किया जा सकता।

हैरानी तब होती है, जब स्वयंसेवी संगठनों का रुख भी सरकारी संस्थानों जैसा होता जा रहा है। विरोध की जगह सिर्फ खानापूर्ति है। क्या सचमुच हम ऐसे समय और समाज में जी रहे हैं, जहां नैतिक मूल्यों का ह्रास ही हमारी प्रगति का परिचायक बनता जा रहा है? ऐसा लगता है कि समाज किंकर्तव्यविमूढ़ है। न कोई विरोध, न स्पंदन, न हलचल! सबके सब लगभग निर्जीव की तरह व्यवहार शून्य। क्या आने वाली पीढ़ी हमें माफ करेगी? हम उनके लिए कैसा भविष्य बुन रहे हैं? कुछ समय पहले तक नशे के सार्वजनिक प्रदर्शन से युवा परहेज करते थे, लेकिन आजकल नशा सामग्री की सहज उपलब्धता और बेलगाम उपयोग ने सामाजिक डर को खत्म कर दिया है। परिवार, समाज और सरकार की संयुक्त भागीदारी से ही हम इस संकट से युवा पीढ़ी को बचा सकते हैं।

 

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