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दुनिया मेरे आगे: उत्सव के रंग

कठफोड़वा आम के पेड़ में अपनी कारीगरी से बना रहा है अपना कोटर और हरियल तोतों की बारात पहले ही आ बैठी है बागों में। बहार ने अपना डेरा जमा लिया है गुलाब की क्यारी में। पपीहा बहक रहा है और पीहू-पीहू की रट लगाए ऋतु को दे रहा है प्यार की पहचान।

Author March 21, 2019 1:44 AM
फागुन का समापन धूमधाम से होता है होली के रंगों से।

फागुन बौरा रहा है और मस्ती में इठला रहा है। यह शोख जो कर दिखाए, वह कम है। पलाश वनों में आग लगा दी है इसने। हवा चलती है तो नश्तर-सा चुभो देती है। वन-उपवन एक मादक गंध से भरे हुए हैं। वह चांदी की धार वाली नदी इतराती भाग रही है और कोयल की मीठी बोली आम्रकुंजों में गूंज रही है। यह फागुन ही है, जिसने नया उल्लास और उमंग भर दिया है मानव मन में। पपीहा का राग प्रेम का प्रतीक बन कर हल्की हंसी बिखेर देता है सबके होंठों पर। फागुन मानो चिकोटी काट जाता है। सरसों पूरी की पूरी पीत रंग से भर गई है और खेत-खलिहानों में सनसनाता है अठखेलियां करता फागुनी राग। मनुहार की बेला को साथ लाया है मधुमास। कहीं दूर कोई अलगोजे पर गा रहा है फागुनी गीत और आसमान से उतर रहा है इस मौसम का संगीत।

वह कौन फूल या कली है, जो इसे छूकर खिल न गई हो! सुगंध से सराबोर हो गए हैं गांव के गांव और ढप की थाप ने दिया है चौपालों को नया रंग। इसी का कमाल है कि माधवी और मोगरे की जुगलबंदी देखते ही बनती है और मौलश्री झर रही है अपने आप। अचेतन पहाड़ी में भर उठा है नया उच्छवास। आम बौरा रहा है और नए पत्तों की पांत जरा-सी हवा से भी हिल-डुल जाती है। प्रेम का पहाड़ा याद करने की उम्र ने लहलहाते खेतों के द्वार पर दस्तक दी है। फागुन कहां नहीं है, कोई कह नहीं सकता। गोचर-अगोचर को भर लिया है इस मनोहरी फागुन ने अपने पाश में और कोंपलों में फूटा है नया लावण्य। खुशबू के मेले लग गए हैं गांव के गालियारों में, क्योंकि जो हवा यहां आई है वह फूलों के रस से नहाकर सीधी चली आई है।

कठफोड़वा आम के पेड़ में अपनी कारीगरी से बना रहा है अपना कोटर और हरियल तोतों की बारात पहले ही आ बैठी है बागों में। बहार ने अपना डेरा जमा लिया है गुलाब की क्यारी में। पपीहा बहक रहा है और पीहू-पीहू की रट लगाए ऋतु को दे रहा है प्यार की पहचान। वनिता बिहंसती हुई टेसू के रंग तैयार कर रही है। उसे पता है फगुनवा में होली है। उत्सव का राग। मोर ने नाचने की बदहवासी में सब कुछ भुला दिया है। पहाड़ों की बर्फ पिघल गई है और झरने का मधुर संगीत कर्णप्रिय बन कर नैनों में साकार है। कहीं दूर किसी बैरागी ने अपने मन की आवाज को सुन कर प्रेम का नया तराना छेड़ा है। बच्चे हों या युवा या बुजुर्ग, रंगों से भरी पिचकारी से रंग रहा है हर कोई। कौन गाता है यह रोज-रोज प्रेम से पगे गीत और कौन भरता है नए से नया रंग गमलों की पांतों में।

फागुन का समापन धूमधाम से होता है होली के रंगों से। होली और फागुन का रंग एक-सा है। ‘फागुन में होली है’ -रोज गाता है खलिहान। फागुन को पता है उसका साथी चैत भी लग जाएगा उसके साथ ही। होली रंग-बिरंगी है। ऐसे गहरे प्यारे रंग जो जम जाते हैं दिलों पर। छुड़ाए नहीं छूटते रंगों के निशान। होली के रंग न्यारे और नवीन हैं। मन न तो थकता है और ऊबता है। वह बौराया-सा रहता है। मीठे स्वाद से भरी होली की पदचाप फागुन के लगते ही पहचान लेता है हर किसी का मन। गाने दिया जाए मन को कोई प्रेम गीत और आने दिया जाए फगुनौटी को घर के द्वारे। सज गए हैं घर-बार वंदनवारों से।

होली के रंग से कौन बचा है! हर कोई भीग रहा है और उतर आया है ठिठोली के बीच। मन को पढ़ लेने की उम्र है युवाओं की, इसीलिए तो वे खिलखिलाते हुए गुलाल उड़ाते हैं। गुलाल, लाल-पीले-हरे-गुलाबी कई रंगों में और चेहरे पुत गए हैं इन्हीं रंगों में। सांसों में घुल गया है मौसम का शर्बत और प्यार का खुमार टूटे नहीं टूटता। अंधा है होली वाला रंग। बिना किसी भेदभाव के रंग डालता है छोटे-बड़े और हमउम्र को।

फागुन का रंग है होली और उसकी पहचान है होली। रंगों की मार और वस्त्रों में झांकता है होली का सतरंगी स्वरूप। मन माने नहीं मानता और खेलता है मनभावन रंगीली होली। फगुनवा में होली है, नहीं भूलता चेतन मन। मनुहार की इस बेला में प्रेम की होली खेलते हैं सब। रात को चांदनी के गीत गाता है रूपहला चितेरा बहुरूपिया फागुन। यही फागुन वाला राग अलापा है फूलों के दल पर भंवरों ने। प्रकृति और मानव मन का अटूट बंधन है फागुन और होली। वसंत यहां तक चला आया है अपना मदनोत्सव रूप लेकर। फाग और होली गाते हुए थकता नहीं है फागुन का सुहाना मौसम। दूरियां मिट गई हैं और सब एक-दूसरे के आसपास महसूस कर रहे हैं अपनापन। मन यही तो गाएगा- ‘फगुनवा में होली है।’

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