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दुनिया मेरे आगे: बदलता परिवेश

आज की पीढ़ी के सामने सबसे बड़ा संकट उस प्रकाश स्तंभ की अनुपस्थिति है, जिसमें ऊर्जा देने की क्षमता हो। परिवार, परिवेश, समाज, राजनीतिक नेतृत्व, रक्षा तंत्र, प्रशासन या न्याय-व्यवस्था, कोई भी संस्था यह दावा करने की स्थिति में नहीं है कि वह बच्चों की राह रोशन करेगी।

Author September 24, 2018 3:59 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

भगवान अटलानी

लगभग पच्चीस वर्ष पुरानी बात होगी। एक नजदीकी मित्र के साथ कुरुक्षेत्र स्थित एक स्कूल में जाने का मौका मिला। उन्होेंने दसवीं कक्षा की पढ़ाई वहां के छात्रावास में रह कर पूरी की थी। विद्यालय और छात्रावास का वातावरण, अध्यापकों का आत्मीय और प्रेरक दिशा-निर्देश, कक्षा में साथ पढ़ने वाले और छात्रावास में साथ रहने वाले छात्रों का बंधुत्व भाव अक्सर उन्हें खींच कर अतीत में ले जाता था। ऐसा कौन-सा आकर्षण था उस स्कूल की यादों में जो मित्र को अपने व्यस्त जीवन में से दो दिन चुरा कर कुरुश्रेत्र ले गया? कौन-सा बंधन था, जिससे मुक्त नहीं कर पा रहे थे वे खुद को? कौन-सी ललक थी जो पुराने संदर्भों को जीवित करने के लिए ज्वार बन कर उन्हें आप्लावित कर रही थी? शायद व्यक्तित्व निर्माण, चरित्र गठन, आदर्श आचार और जीवन में प्रेरक तत्त्वों के समावेश की दृष्टि से वह कालखंड मित्र के मस्तिष्क में प्रस्तर उत्कीर्ण चित्र की तरह अखंडित रूप से विद्यमान था।

बीस-पच्चीस वर्षों के बाद पुराने विद्यार्थियों के मिलन समारोह अक्सर यहां-वहां आयोजित किए जाते हैं। उस दौर में की गई शरारतोें और चुहलबाजियों को याद करके पूर्व सहपाठी भी आनंदित होते हैं और अपने परिवार के सदस्यों को भी विस्मित करते हैं। बच्चों को नैतिकता, सद्चरित्र, सद्विचार, आदर्शोन्मुखी संस्कार और उच्चतर मूल्यों में आस्था के समाजपरक बीज परिवार, परिवेश और शिक्षा संस्थान से मिलते हैं। एकल परिवारों ने ऐसी सभी संभावनाओं पर कुठाराघात किया है। पड़ोस, मित्र समुदाय और सोहबत के रूप में जो परिवेश बच्चों को मिलता है, समय के साथ वह प्रदूषित ही नहीं, बल्कि घातक होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में केवल विद्यालय की ओर आशा की दृष्टि से देखना क्या संभव है? यह दुखद है कि सर्व धर्म सद्भाव के बरक्स नैतिक शिक्षा से देश के विद्यालय कटते चले गए हैं। माता-पिता और महिलाओं को सम्मान, मूल्यों का महत्त्व, महापुरुषों की जीवनियां, प्रेरक प्रसंग और विवेक के स्वर अब विद्यालयों के विषय नहीं हैं। माता-पिता और परिवेश की तरह शिक्षा संस्थान भी बच्चों के सामने आदर्श प्रस्तुत करने की स्थिति में नहीं हैं। कभी स्कूली जीवन के आरंभिक वर्षों में बच्चे अपने गुरु को आदर्श मान कर वैसा ही बनने की कामना करते थे। कालांतर में भले ही सोच की दिशा बदलती थी, लेकिन जो देखा और सीखा था और जो संस्कार के रूप में अंदर गया था, उसके बूते सुरभित-सुवासित-समर्थ जीवन का उपहार नींव का काम करता था।

आज की पीढ़ी के सामने सबसे बड़ा संकट उस प्रकाश स्तंभ की अनुपस्थिति है, जिसमें ऊर्जा देने की क्षमता हो। परिवार, परिवेश, समाज, राजनीतिक नेतृत्व, रक्षा तंत्र, प्रशासन या न्याय-व्यवस्था, कोई भी संस्था यह दावा करने की स्थिति में नहीं है कि वह बच्चों की राह रोशन करेगी। सही अर्थों में ऐसे व्यक्तित्वों का मानो अकाल पड़ गया है, जिन्हें आदर्श बना कर बच्चे आगे बढ़ सकें। विद्यालय प्रेरणास्रोत हुआ करते थे। अब वहां भी वातावरण बदल गया है। उपभोक्तावाद ने शिक्षातंत्र को पूरी तरह ग्रस लिया है। सरकारी विद्यालयों का वातावरण, स्तर, व्यवस्थाएं और सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। निजी विद्यालयों में सब कुछ अर्थकेंद्रित है। शिक्षार्थी उपभोक्ता या ग्राहक और शिक्षा संस्थान सेवा प्रदाता या दुकानदार हो गया है। विद्यार्थी के लिए शिक्षक गुरु नहीं, वेतनभोगी है। शिक्षक के लिए विद्यार्थी देश का भाग्य नहीं, मोटी कमाई कराने वाला कोई पात्र है। शुल्क के झगड़ों और विवादों का कारण है। अदालतों और आयोगों के द्वार खटखटाए जाते हैं, फिर भी माकूल समाधान नहीं निकलता। शिक्षा के केंद्र दिशा और दृष्टि बदल कर विद्यालयों कोे मोटी कमाई के साधन के रूप में देखते हैं।

भारतीय संस्कृति कर्तव्य की पूर्ति को अधिकारों का स्वाभाविक सृजक मानती है। इस सिद्धांत को उलट कर, कर्तव्यों को भुला कर अधिकार प्राप्ति की होड़ मची है। पाठ्यक्रम के अतिरिक्त नैतिक शिक्षा या फिर किसी गतिविधि में व्यवस्था की रुचि नहीं है। शारीरिक विकास के मामले में स्कूली स्तर पर कोई नीति बनाने के प्रति सरकार पूरी तरह उदासीन है। अभिरुचि संवर्द्धन की दृष्टि से विद्यालयों को मंच बनाने की सोच नहीं है। विद्यालय नियंताओं और कार्यरत अध्यापकों के बीच अघोषित वर्ग संघर्ष का माहौल है। समाज और देश हित पर स्वहित हावी है। शिक्षा का उद्देश्य बौद्धिक विकास, व्यक्तित्व निर्माण और बेहतर विचारों से लैस करना वांछित है। व्यवहार में प्रमाण-पत्रों और डिग्रियों में उलझ कर हमारी शिक्षा व्यवस्था भारत और विश्व के लिए नौकर तैयार कर रही है। नैतिकता, मूल्य, आत्म-विकास जैसे तत्त्व पर्दे के पीछे चले गए हैं। भौतिकता बेशर्म हो गई है। साक्षरता ही शिक्षा का पर्याय बन गई है। सब चाहते हैं कि भ्रष्टाचार समाप्त होना चाहिए। सबकी इच्छा है कि नई पीढ़ी को सभ्य और सुसंस्कृत होना चाहिए। दुराचार और बलात्कार की घटनाएं सबको पीड़ा पहुंचाती हैं। जरूरी है कि मानवीय मूल्यों की ओर ध्यान दिया जाए। विद्यालय नैतिक पाठ पढ़ाएंगे, मूल्यों की महत्ता समझाएंगे, सद्गुणों से परिपूरित करेंगे तो कोई कारण नहीं है कि विकराल होती समस्याएं बौनी न पड़ जाएं।

 

 

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