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दुनिया मेरे आगेः सांध्य वेला में

महानगरों में बच्चों की बेहद महंगी शिक्षा के बोझ से लदे कामकाजी दंपतियों के लिए अपने छोटे-से फ्लैट में वृद्ध मां-बाप को साथ रखना एक कठिन परीक्षा बन जाता है।

Author Published on: March 28, 2020 12:48 AM
अफसोस कि वृद्धाश्रमों में रहना अभी भी सहानुभूति जगाता है।

अरुणेंद्र नाथ वर्मा

समय के साथ कदम मिला कर चलना समझदारी है या समझौता, यह प्रश्न समाज के बदलते हुए मूल्यों से व्यथित लोगों को अक्सर परेशान करता है। हमारी संस्कृति के शाश्वत मूल्य बहते जल में तन कर खड़ी हुई किसी चट्टान की तरह हमारे बदलते हुए लोकाचार में प्रश्नचिह्न बन कर सिर उठाए रखने का प्रयत्न तो करते हैं, लेकिन वैश्वीकरण की तेज धारा में भारतीय संस्कृति की स्थापित मान्यताओं का क्षरण रुक नहीं पाता। पलायनवाद या बदलाव से उपजे आक्रोश का सामूहिक रुदन में बदलना कोई सार्थक कदम नहीं। वैश्वीकरण की प्रतिक्रिया के रूप में हर नए मानक, नई व्यवस्था और नई सोच का बिना सोचे-समझे विरोध किया जाने लगा है। पर बदलती हुई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के आगे पुरातन संस्थाओं और परंपराओं का ढह जाना इतना बुरा भी नहीं कि हमेशा आंख बंद कर उसका विरोध किया ही जाए। समझदारी इसमें है कि जो बदलाव रोका नहीं जा सकता, उसे स्वीकार किया जाए, पर यथासंभव उसे अपनी सुविधा के अनुसार स्थानीय सांचे में ढाल कर। कई बदलाव थोड़ी-सी खुशियों के साथ ढेर सारी समस्याएं लेकर आते हैं, लेकिन अपरिहार्य होते हैं। उन्हें स्वीकार कर लेने के अलावा और कोई चारा नहीं। कई ऐसी बातों को लेकर हमारे समाज में बहुत-सी आशंकाएं हैं। उदाहरण के लिए तेजी से बढ़ता हुआ शहरीकरण, हमारी आर्थिक व्यवस्था में खेती किसानी की जगह औद्योगीकरण, संयुक्त परिवार का विस्थापन और एकल परिवार का प्रचलन।

भले ये सारी नई व्यवस्थाएं स्वागत के योग्य नहीं हों, पर पुराने की याद में ठंडी आहें भरने से बेहतर यह होगा कि चुनौतियों और समस्याओं को नए परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, उनसे निपटने के नए तरीके अपनाए जाएं। स्थानीय आकांक्षाओं के अनुसार थोड़ी बहुत फेर-बदल के साथ कुछ नई व्यवस्थाओं को अपना लेना बेहतर विकल्प होगा। ऐसी ही एक संस्था है वृद्धाश्रम, जिसे लेकर हमारा समाज अभी काफी हद तक असहज है। खासे समझदार लोग भी किसी वृद्ध दंपति, विधवा या विधुर को किसी वृद्धाश्रम में रहते देख कर उनकी संतान (या संतानों) की हृदयहीनता की बात करने लगते हैं। अधिकतर लोगों की पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि किसी वृद्धाश्रम में वह स्नेह, सेवा और आत्मीयता नहीं मिल सकती जो इन बुजुर्गों को अपने परिवार और स्वजनों से मिल सकती है। हर व्यक्ति या परिवार की अपनी मजबूरियां होती हैं। लेकिन उनकी गहराई में गए बिना किसी वृद्ध व्यक्ति को वृद्धाश्रम में रहते देख कर ज्यादातर लोग सहानुभूति दर्शाने लगते हैं।

एकाध मातृसत्तात्मक जनजातियों की बात और है, लेकिन उन्हें छोड़ कर अधिकतर परिवारों की मानसिकता अभी इतनी आधुनिक नहीं हुई है कि बेटे के रहते हुए लोग वृद्ध जनों का बेटी, विशेषकर विवाहित बेटी के साथ रहना सहजता से स्वीकार से कर लें। जबकि पाश्चात्य देशों में अकेली विधवा मां आमतौर पर बेटी-दामाद के साथ रहती है। इसलिए जिनकी संतान केवल विवाहित कन्या हो, उनके वृद्धाश्रम में रहने पर कटु टिप्पणियां नहीं की जाती हैं। लेकिन बेटे के रहते जिन्हें वृद्धाश्रम में रहना पड़े, उनके लिए दुख से कहा जाता है कि उन्हें वृद्धाश्रम में ‘छोड़ कर’ या ‘पटक कर’ बेटे ने अपना पिंड छुडा लिया है! लेकिन जब परिवारों में बुजुर्गों के साथ बुरा बर्ताव होता है या उनकी अनदेखी जाती है तब लोग इतनी ही गंभीरता से शिकायती नजर नहीं रखते। जबकि अलग-अलग शक्ल में ऐसे ‘सामाजिक’ दृश्य आम होते हैं।

जहां योग, पूजा, सत्संग जैसे सामूहिक धार्मिक आयोजनों से लेकर बुजुर्गों के मनोरंजन के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन करने और उनमें भाग लेने की सुविधा उपलब्ध हो। पर अब देश में मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग की बढ़ती संख्या और उनकी आर्थिक स्थिति में आती मजबूती के कारण लगातार ऐसे स्तरीय वृद्धाश्रम बनाए जा रहे हैं, जिनमे रहना सहानुभूति नहीं, बल्कि ईर्ष्या का विषय बन सकता है। हालांकि अभी उच्चस्तरीय वृद्धाश्रम गिने-चुने हैं, वह भी केवल महानगरों में। काश कि कस्बों में भी ऐसे वृद्धाश्रम होते, जिनमें रहती ‘बूढ़ी काकी’ घर में पकते पकवानों की कल्पना से परेशान होने के बजाय निस्संकोच भोजनालय से अपने लिए कचौड़ी मंगा पाती! अफसोस कि वृद्धाश्रमों में रहना अभी भी सहानुभूति जगाता है।

महानगरों में बच्चों की बेहद महंगी शिक्षा के बोझ से लदे कामकाजी दंपतियों के लिए अपने छोटे-से फ्लैट में वृद्ध मां-बाप को साथ रखना एक कठिन परीक्षा बन जाता है। हां, यह सही है कि वृद्धाश्रम में बेटे-बेटियों के बच्चों के साथ का सुख अवश्य नहीं मिलता। लेकिन उन नाती-पोतों को बूढ़े दादा-नाना की तो छोड़िए, अपने समवयस्क दोस्तों और वाट्सऐप ग्रुप को छोड़ कर अपने कार्यकलापों पर नजर रखने वाले मां-बाप का संग-साथ कितना सुहाता है, यह आज की परिस्थितियों में एक खुला रहस्य है।

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