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दुनिया मेरे आगे: सपनों से आगे

ऐसी स्थिति में अक्सर लड़की की पढ़ाई छुड़वा दी जाती है, लेकिन दिल्ली में रहने वाले इस परिवार के रास्ते में दो बाधाएं और हैं। इसमें पहली बाधा है आस-पड़ोस से प्रतिस्पर्धा और दूसरी, एक मजबूरी खुद को आधुनिक दर्शाने की है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

देवेश

उसने बारहवीं अच्छे नंबरों से पास कर ली है। बारहवीं से आगे पढ़ना कभी उसका सपना नहीं रहा। पहले कभी कहती थी कि बस बारहवीं तक ही पढ़ेगी। मगर अब इस मुकाम तक पहुंच कर इच्छाएं बढ़ गई हैं। उसका मन है कि अब और पढ़ना है। पर क्या पढ़ना है और कैसे, इसमें अब भी उलझन है। यों उसे बहुत कुछ नहीं पता, लेकिन वह इतना जरूर जानती है कि उसे शिक्षिका बनना है। पता नहीं, यह शिक्षिका बनने की इच्छा उसके भीतर क्यों और कैसे पनपी! जबकि वह आमतौर पर अपनी शिक्षिका की खूब बुराइयां करती है। इस लड़की का परिवार आर्थिक रूप से सशक्त परिवार है। वह पढ़ाई का खर्च आराम से उठा सकता है। मगर परिवार इसे पढ़ाना नहीं चाह रहा। असल में उसके परिवार का एक पुरुष सदस्य उसे रोक रहा है। विचित्र बात यह है कि इस परिवार में सबसे अधिक यही व्यक्ति पढ़ा-लिखा है। तब वह क्यों लड़की को पढ़ने से रोक रहा है? क्या वह शिक्षा के महत्त्व को नहीं जानता? क्या जेंडर के नजरिए से ही इस स्थिति को समझा जा सकता है?

यहां एक सवाल यह भी बनता है कि परिवार की महिलाएं इस बारे में क्या सोचती हैं। उनके नजरिए से लड़की को आगे पढ़ना चाहिए या नहीं? एक सवाल तो यह भी है कि परिवार में उनकी चलती कितनी है! खैर… यहां लड़की की मां एक अजीब उलझन में फंसी हुई है। वह लड़की को ‘तीसमार खां’ बनाना चाहती है, पर घर से बाहर नहीं निकलने देना चाहती। परिवार की बाकी तीन स्त्रियों में से दो को कोई फर्क नहीं पड़ता, फिर भी वे एक लड़की की जड़ काटने में लगी रहती हैं। परिवार की यह राजनीति भी लड़की के भविष्य पर अपना प्रभाव छोड़ेगी। इस परिवार की औरतों के दृष्टिकोण को समझने पर पता लगेगा कि यह असल में उनका दृष्टिकोण है ही नहीं। बस घर की इन महिलाओं में लड़की के प्रति संवेदनशीलता थोड़ी अधिक है। वह भी शायद इसलिए कि लड़की उनके साथ अधिक समय बिताती है। इस तरह कुल मिला कर यह लड़की एक समय के लिए परिवार के लिए चिंता का विषय बन जाती है।

ऐसी स्थिति में अक्सर लड़की की पढ़ाई छुड़वा दी जाती है, लेकिन दिल्ली में रहने वाले इस परिवार के रास्ते में दो बाधाएं और हैं। इसमें पहली बाधा है आस-पड़ोस से प्रतिस्पर्धा और दूसरी, एक मजबूरी खुद को आधुनिक दर्शाने की है। अब अगर लड़की की पढ़ाई छुड़वा दी गई तो लोग सवाल करेंगे और अगर पढ़ाई इसी तरह तरह जारी रखी गई तो हो सकता है कि लड़की खुद अपने अधिकारों के लिए सवाल करने लगेगी। अब ऐसी स्थिति में फंसा परिवार बीच का रास्ता निकलता है। वह लड़की को पढ़ाएगा, पर ‘ओपेन’ यानी पत्राचार से। ऐसे में सवालों से भी बचा जाएगा और लड़की पर अपना आधिपत्य भी बना रहेगा। लेकिन यह स्थिति केवल इतनी नहीं है। इसके पीछे परिवार के मनोविज्ञान की और भी कई परतें हैं।

‘कहीं लड़की सवाल न करने लगे’ एक बड़ा सवाल है। हालांकि इससे भी बड़े-बड़े डर परिवार पर छाए रहते हैं। पहला तो लड़की की सुरक्षा को लेकर। यह एक हद तक जायज भी है। जायज इसलिए कि महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में इजाफा होता गया है। लेकिन इससे बचने के लिए न तो परिवार लड़की को सुरक्षित रहने के तरीकों तक पहुंच बनाने में मदद करेगा और न ही अपने परिवार के लड़कों को यह सिखाएगा कि लड़कियों से कैसे सामान्य रूप से पेश आना चाहिए। पर बात इससे आगे की है। परिवार को एक डर यह भी लगा रहता है कि लड़की कहीं प्रेम न कर बैठे। खासकर गैर-धर्म और गैर-जाति के लड़के से।

इससे अगला डर यह है कि कहीं लड़की कोई गलती न कर बैठे। यहां गलती का अर्थ वही है, जो आप समझ रहे हैं। अब भले ही वह ‘गलती’ इच्छा से ही क्यों न हुई हो, पर मानी गलती ही जाएगी। यानी सूई घूम कर लड़की की शुचिता पर आ ही जाती है। शुचिता के इस सवाल में लड़की की इच्छाएं, सपने, संभावनाएं, संघर्ष कुछ भी नहीं है। उसका संपूर्ण अस्तित्व केवल उसके शरीर पर आकर ठहर जाता है। परिवार खुद के गढ़े भय के माहौल में जीने लगता है। अब परिवार इन सवालों से डरते-डराते क्या चुनता है, यह उसी पर निर्भर करता है। पर यह बात सही मानी जा सकती है कि एक परिवार इन सभी सवालों से गुजर कर ही लड़की को पढ़ने भेजता है या पढ़ाई छुड़वा देता है। खैर, इस लड़की ने पत्राचार में दाखिला ले लिया है। अब वह भी हफ्ते में दो दिन दोपहर तक घर से बरी रहा करेगी। महीने के इन आठ दिनों में थोड़ी-थोड़ी आजादी महसूसा करेगी। इन्हीं दिनों में वह सपने देखा करेगी या जी भरके सोया करेगी। इन्हीं कुछ दिनों में वह प्रेम करेगी और अपनी दुनिया रचेगी।

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